भारत का डेमोग्राफिक डिविडेंड (जनसांख्यिकीय लाभांश) उतना ही मज़बूत है जितनी उसकी धमनियां। वर्ल्ड हार्ट डे पर एक ही संकल्प है: अपनी धड़कन न चूकें, और देश को भी पीछे न रहने दें।
हर साल 29 सितंबर को, वर्ल्ड हार्ट डे दुनिया से उस अंग की बात सुनने को कहता है जिस पर हम तभी ध्यान देते हैं जब वह ठीक से काम नहीं करता। साल 2000 में वर्ल्ड हार्ट फ़ेडरेशन और WHO ने मिलकर इस दिन की शुरुआत की थी। यह दिन आज भी उतना ही अहम है क्योंकि इसका संदेश कभी पुराना नहीं होता: दिल की बीमारी दुनिया में मौत की सबसे बड़ी वजह है, जिससे हर साल लगभग 2 करोड़ लोगों की जान जाती है। इनमें से पांच में से चार से ज़्यादा मौतें हार्ट अटैक और स्ट्रोक से होती हैं, और इनमें से एक-तिहाई मामले 70 साल से कम उम्र के लोगों में देखे जाते हैं। इस साल का कैंपेन, "डोंट मिस ए बीट" (धड़कन न चूकें), इस बीमारी की सबसे खतरनाक बात पर फोकस करता है: अक्सर इसके कोई लक्षण तब तक नहीं दिखते जब तक बहुत देर नहीं हो जाती।
बुढ़ापे की बीमारी जवानी की महामारी कैसे बन गई? क्योंकि आज की जीवनशैली ने हर जोखिम वाले कारक को बड़े पैमाने पर बढ़ा दिया है। अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फ़ूड, नमक, चीनी और ट्रांस फ़ैट ने घर के खाने की जगह ले ली है। खेतों की जगह डेस्क ने ले ली है। तंबाकू का इस्तेमाल जारी है, हवा का प्रदूषण हमारे शहरों का दम घोंट रहा है, और नींद न आना कामयाबी की निशानी माना जाने लगा है।
2017 में भारत में होने वाली कुल मौतों में से 26.6 प्रतिशत मौतें दिल की बीमारी से हुईं, जबकि 1990 में यह आंकड़ा 15 प्रतिशत था। परिवार का पेट पालने वाले 30 से 50 साल के लोगों में हार्ट अटैक के मामले सबसे ज़्यादा हैं। केरल, पंजाब और तमिलनाडु इस मामले में सबसे आगे हैं। अनुमान है कि 31.5 करोड़ भारतीय हाई ब्लड प्रेशर (हाइपरटेंशन) से जूझ रहे हैं, लेकिन सिर्फ़ 28 प्रतिशत लोगों को ही इसके बारे में पता है, और मुश्किल से आठ में से एक व्यक्ति का ब्लड प्रेशर कंट्रोल में है। इसके अलावा, 13.6 करोड़ लोगों को प्री-डायबिटीज है। यह महामारी छिपी हुई नहीं है। बस हम ही इस पर ध्यान नहीं दे रहे हैं।
इससे बचने का तरीका न तो अनोखा है और न ही महंगा। पहला, बीमारी का जल्दी पता लगाना। ब्लड प्रेशर, शुगर और कोलेस्ट्रॉल की जांच मोबाइल रिचार्ज की तरह ही आम बात होनी चाहिए, जो हर हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर पर उपलब्ध हो। दूसरा, सस्ता और लगातार इलाज। 'इंडिया हाइपरटेंशन कंट्रोल इनिशिएटिव' साबित करता है कि यह तरीका काम करता है: नौ ज़िलों में, 2018-19 और 2023-24 के बीच ब्लड प्रेशर कंट्रोल 37% से बढ़कर 48% हो गया, जबकि मरीज़ों का अपनी जेब से दवा पर होने वाला खर्च 47% से घटकर 9% रह गया। यह मॉडल हर ज़िले में अपनाया जाना चाहिए।
एक देश के तौर पर, हमें ऐसे फ़ैसले लेने होंगे—सेहतमंद फ़ैसले—जो भारत को फिर से फ़िट बना सकें। इसमें कोई शक नहीं कि सेहतमंद रहने के लिए योग एक बेहतरीन ज़रिया है, लेकिन इसके साथ-साथ सही जीवनशैली, सही खान-पान, सही नींद और तीन बड़ी दिक्कतों—जल्दबाज़ी, चिंता और मसालेदार खाना (करी)—पर काबू पाना भी ज़रूरी है। बाज़ार में ऐसी बहुत सी चीज़ें हैं जो हमें बीमार बना सकती हैं। नमक और ट्रांस-फ़ैट की मात्रा, तंबाकू, शराब और ज़्यादा प्रोसेस्ड फ़ूड के सेवन को कम करने की ज़रूरत है। इसके अलावा, साफ़ हवा और रोज़ाना टहलने से भी बहुत फ़र्क पड़ सकता है। साथ ही, इमरजेंसी की स्थिति आने से पहले ही उसके लिए तैयारी करना बहुत ज़रूरी है। सीने में दबाव, सांस लेने में तकलीफ़ और जबड़े या हाथ तक फैलने वाले दर्द के लिए घर पर इलाज करने के बजाय अस्पताल जाना चाहिए, और हर स्कूल व ऑफ़िस में CPR सिखाया जाना चाहिए। 'वर्ल्ड हार्ट डे' हमें याद दिलाता है कि दिल सिर्फ़ हमें ज़िंदा रखने वाला एक अंग नहीं है, बल्कि यह हमारी शारीरिक सेहत का केंद्र है जो हर पल चुपचाप अपना काम करता रहता है।
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