23 अक्टूबर की सुबह, अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सियांग जिले में यिंगकियोंग के मुख्य बाजार में, बंद दुकानों के बाहर कुछ लोग बैठे आम बातें कर रहे थे, जबकि सियांग घाटी में हालात बिल्कुल भी सामान्य नहीं थे। 'सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट' (SUMP) को लेकर कई हफ्तों से चल रहे विरोध-प्रदर्शनों के कारण बाजार में पूरी तरह सन्नाटा था। सड़कों पर हथियारों से लैस सुरक्षाकर्मी गश्त कर रहे थे और दोपहर तक पूरे जिले में इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई थी।
यिंगकियोंग के पास स्थित गोसांग गांव के रहने वाले 44 वर्षीय किसान कटिन बुरंग, जो उस दिन बाजार में मौजूद थे, ने कहा, "ऐसा लग रहा है जैसे हमारे खिलाफ जबरन सशस्त्र बलों को तैनात किया गया हो; जैसे सीमा पर किसी दुश्मन से लड़ा जा रहा हो। यही बदलाव आया है।"
14 सितंबर से ही इस इलाके में सैकड़ों पुलिसकर्मी और अर्धसैनिक बलों को तैनात कर दिया गया था। उस दिन स्थानीय लोगों ने SUMP से जुड़ी सभी 'प्री-फिजिबिलिटी स्टडी' (PFR) को रोकने की मांग की थी। यह एक बहुत बड़ा जलविद्युत और बाढ़ नियंत्रण बांध है, जिससे लगभग 11,200 मेगावाट बिजली पैदा होने का अनुमान है।
अक्टूबर की शुरुआत में तनाव तब और बढ़ गया, जब चार प्रदर्शनकारियों को 'अरुणाचल प्रदेश गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 2014' के तहत हिरासत में ले लिया गया। 23 अक्टूबर को उनकी रिहाई की मांग को लेकर निकाला गया विरोध मार्च हिंसक हो गया। इस दौरान दो विधायकों के घरों में तोड़फोड़ की गई और प्रोजेक्ट डेवलपर NHPC के दफ्तर में आग लगा दी गई। इसके बाद पुलिस की कार्रवाई और तेज हो गई।
पुलिस ने इस हिंसा के सिलसिले में कम से कम आठ मामले दर्ज किए हैं और 26 लोगों को गिरफ्तार किया है। पासीघाट के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट से युवा नेताओं ओतुल जेरांग और ताजोंग तालोम, उनके वकील सनी तायेंग, और एक समाचार प्रकाशन 'द अरुणाचल टाइम्स' की डिप्टी एडिटर टोंगाम रीना के खिलाफ सर्च वारंट लिए गए। 'अरुणाचल प्रदेश यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स' और 'अरुणाचल प्रेस क्लब' ने एक संयुक्त बयान में रीना के खिलाफ की गई इस कार्रवाई को "बेहद चिंताजनक और प्रेस की स्वतंत्रता के लिए एक गंभीर खतरा" बताया है। उन्होंने कहा कि इससे यह गंभीर सवाल उठता है कि कहीं जांच एजेंसियों की शक्तियों का गलत इस्तेमाल उन पत्रकारों को डराने-धमकाने के लिए तो नहीं किया जा रहा, जो सार्वजनिक महत्व के विवादित मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं। सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम यूथ विंग के कानूनी सलाहकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता एबो मिली ने युवा नेता जेरांग के साथ पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। उन्होंने उम्मीद जताई कि इससे प्रदर्शन कर रहे युवाओं को शांति बनाए रखने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा।
स्थानीय निवासियों और प्रदर्शनकारी समूहों की एक मुख्य मांग पुलिस द्वारा हिरासत में लिए गए लोगों की रिहाई है। गेकू गांव के रहने वाले और अंचल समिति (स्थानीय स्वशासन निकाय) के पूर्व सदस्य ओपेक ताकू ने कहा, "हम बंदूक की नोक पर शांति वार्ता नहीं कर सकते।"
'राष्ट्रीय सुरक्षा' के लिए एक बांध
हालांकि SUMP (सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट) को राष्ट्रीय महत्व और सुरक्षा से जुड़ी परियोजना के रूप में पेश किया गया है - क्योंकि चीन भी सियांग नदी के ऊपरी हिस्से में अपनी जलविद्युत परियोजना बनाने की योजना बना रहा है - लेकिन स्थानीय आदि जनजाति के लोगों ने इस परियोजना को आगे बढ़ाने की हर कोशिश का विरोध किया है। भारत के सबसे अधिक जैव विविधता वाले क्षेत्रों में से एक में स्थित इस बांध से 27 गांवों पर असर पड़ने की आशंका है।
राज्य सरकार ने इस परियोजना का बचाव करते हुए कहा है कि यह चीन के बांध का "जवाब" है। सरकार का तर्क है कि अगर चीन भारत के खिलाफ कोई "वॉटर बॉम्ब" (पानी का बम) छोड़ता है, तो यह परियोजना इस क्षेत्र की रक्षा करेगी।
आदि बाने केबांग यूनाइटेड (ABKU), SUMP प्रभावित क्षेत्र युवा संघ (SAAYA), सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम यूथ विंग (SIFFYW) और आदि गैलो वेलफेयर सोसाइटी जैसे समूहों ने मिलकर इस परियोजना के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू किया है।
ABKU के पूर्व अध्यक्ष थॉमस बोरंग ने पिछले महीने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि चीन की तरफ से "वॉटर बॉम्ब" का खतरा तभी हो सकता है जब उनका बांध टूट जाए, कोई भूकंप आए, युद्ध में मिसाइल का इस्तेमाल हो, या फिर 100 साल बाद बांध का कंक्रीट-सीमेंट गलने लगे। उन्होंने आगे कहा, "अगर हम खुद 11,000 मेगावाट का बांध बनाते हैं, तो क्या इससे नुकसान दोगुना नहीं हो जाएगा? हमें यह जोखिम क्यों उठाना चाहिए?"
चीन और अरुणाचल प्रदेश, दोनों ही जगहों पर प्रस्तावित ये बांध एक ऐसे क्षेत्र में हैं जो भूकंप के लिहाज से बेहद संवेदनशील (high seismic zone) है, जहां भूकंप से भारी तबाही का खतरा बना रहता है।
2024 के आखिर में SUMP के खिलाफ विरोध तब और तेज हो गया, जब राज्य सरकार ने NHPC की सर्वे टीमों को सुरक्षा देने के लिए केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों को तैनात करने का कदम उठाया। इस साल सितंबर में, मुख्यमंत्री पेमा खांडू के दौरे के दौरान गेकू गांव में - जो उन गांवों में से एक है जिनके पूरी तरह डूबने की आशंका है - स्थानीय निवासियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़प हो गई।
तब से, हिरासत में लिए गए लोगों की रिहाई और परियोजना की 'प्री-फिजिबिलिटी स्टडी' (प्रारंभिक व्यवहार्यता अध्ययन) को रद्द करने की मांग को लेकर राजधानी ईटानगर और यहां तक कि नई दिल्ली में भी रैलियां निकाली गई हैं। नई दिल्ली में प्रदर्शनकारियों को अरुणाचल भवन के बाहर हिरासत में लिया गया था। अरुणाचल प्रदेश में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई झड़पों में दोनों पक्षों के लोग घायल हुए हैं।
3 नवंबर को, मुख्यमंत्री कार्यालय ने आंदोलनकारी संगठनों को पत्र लिखकर 'सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट' से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करने के लिए 5 से 7 नवंबर के बीच ईटानगर में एक बैठक का प्रस्ताव दिया।
एक महीने के भीतर यह इस तरह का दूसरा निमंत्रण था। यह निमंत्रण मुख्यमंत्री की एक सार्वजनिक अपील के बाद आया, जिसमें उन्होंने कहा था, "बंद, नाकेबंदी और हमलों से कोई समाधान नहीं निकलता, बल्कि इससे हमारे अपने लोगों को ही परेशानी होती है।"
SAAYA के महासचिव गेनी नांगकर ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि जब तक APUAPA के तहत हिरासत में लिए गए और अन्य मामलों में गिरफ्तार किए गए लोगों को रिहा नहीं किया जाता, तब तक उनका संगठन मुख्यमंत्री की बैठक में शामिल नहीं होगा। उन्होंने कहा, "हमारा अंतिम फैसला यही है कि जब तक हमारी मांगें पूरी नहीं हो जातीं, हम मुख्यमंत्री से मुलाकात नहीं करेंगे।"
SIFF के कानूनी सलाहकार और प्रवक्ता तागोरी मिज़े ने कहा कि हिरासत में लिए गए लोगों की रिहाई का मामला सिर्फ अदालतों तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा, "यह सरकार के अधिकार क्षेत्र में है, माननीय मुख्यमंत्री के अधिकार में है। अगर वे चाहें, तो आज रात ही वे लोग बाहर आ सकते हैं। इसके लिए बस राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है।" उन्होंने कहा कि SIFF का रुख यह है कि सबसे पहले हिरासत में लिए गए लोगों को रिहा किया जाए।
30 अक्टूबर को, APUAPA के तहत हिरासत के ये मामले एक सलाहकार बोर्ड के पास भेजे गए थे, जिसकी अध्यक्षता हाई कोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश कर रहे हैं, लेकिन इस पर कोई फैसला नहीं लिया जा सका। मिज़े ने बताया कि इस मामले से जुड़ी एक रिट याचिका पर हाई कोर्ट में 10 नवंबर को सुनवाई होगी।
सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ी
'प्री-फिजिबिलिटी रिपोर्ट' (PFR) तैयार करने के लिए पुलिस और सैन्य बलों की भारी तैनाती की SIFF और अन्य 'आदि' (Adi) संगठनों ने आलोचना की है। इन संगठनों की मांगों में केंद्रीय बलों को वापस बुलाना भी शामिल है।
PFR के तहत, किसी इलाके में परियोजना की व्यावहारिकता (viability) जांचने के लिए 30 से 40 मीटर की गहराई तक खुदाई की जाती है और वहां से नमूने (samples) लेकर प्रयोगशाला में भेजे जाते हैं। फिलहाल, सियांग घाटी में तीन ऐसी जगहों पर विचार किया जा रहा है, जहां SUMP जलाशय बनाया जा सकता है।
खांडू ने अपने एक खुले पत्र में वादा किया था कि निर्माण कार्य को लेकर कोई भी फैसला "विस्तृत सार्वजनिक परामर्श और लोगों की सहमति" के बिना नहीं लिया जाएगा, जैसा कि कानूनी रूप से भी अनिवार्य है। उन्होंने इससे पहले 13 अक्टूबर को सुरक्षा बलों की तैनाती कम करने का भी वादा किया था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
अपर सियांग के उपायुक्त अशोक ताजो ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि 22 अक्टूबर तक जिले में सुरक्षा बलों की सात कंपनियां तैनात थीं। उन्होंने कहा कि 3 नवंबर तक, 'डाइट डाइमे' (Dite Dime) में हिंसा भड़कने के बाद, यह संख्या बढ़कर "लगभग 10 से 12 कंपनियां" हो गई। उन्होंने आगे कहा कि ये सुरक्षा बल वहां PFR (प्रारंभिक व्यवहार्यता रिपोर्ट) से जुड़े उपकरणों की सुरक्षा के लिए तैनात किए गए थे।
खबरों के अनुसार, पासीघाट में हुई तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाओं के बाद, भारत के गृह मंत्रालय ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) की 'रैपिड एक्शन फोर्स' (RAF) के 250 जवानों को वहां भेजा है।
राज्य सरकार ने बताया है कि 2025 के मध्य से, उसने सियांग और अपर सियांग जिलों के कम से कम दो दर्जन गांवों और बस्तियों के साथ समझौता ज्ञापनों (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। कई गांवों में परिवारों ने अलग-अलग चरणों में इन समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। एक सरकारी अधिकारी के अनुसार, जानबो, रामसिंह और लिकोर जैसे कुछ गांवों में लगभग आधे परिवारों ने इन समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। 'मोंगाबे-इंडिया' (Mongabay-India) द्वारा देखे गए एक MoU की प्रति में लिखा है कि PFR के लिए सहयोग को "स्वयं में SUMP (सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट) के निर्माण के लिए कोई समझौता नहीं माना जाएगा।" इसके साथ जुड़े सहमति पत्र में कहा गया है कि हस्ताक्षर करने वाले अपनी "अपरिवर्तनीय सहमति" (irrevocable consent) दे रहे हैं, जो "केवल और केवल PFR अध्ययनों के उद्देश्य से" है।
SIFF के टैगोरी माइज़ ने कहा कि 'भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013' के अनुसार, सहमति लेने की प्रक्रिया में सार्वजनिक अधिसूचना, सामाजिक प्रभाव का आकलन और जनसुनवाई शामिल होती है। उन्होंने बताया कि कानून में PFR के लिए किसी MoU का कोई प्रावधान नहीं है। उन्होंने कहा, "PFR के लिए MoU का प्रावधान? मैंने तो ऐसा कभी नहीं सुना।"
23 अक्टूबर के बंद के आयोजकों में से एक, 'आदि गैलो वेलफेयर सोसाइटी' (Adi Galo Welfare Society) वर्तमान में 300 किलोमीटर की पदयात्रा कर रही है। उनकी मांगों में हिरासत में लिए गए लोगों की रिहाई, निर्माण कार्य शुरू होने से पहले बातचीत, निलंबन आदेशों को रद्द करना और केंद्रीय बलों को वापस बुलाना शामिल है।
MoU के अलावा, सरकार ने प्रभावित 27 गांवों के लिए एक आजीविका योजना भी शुरू की है। ताजो के अनुसार, यह केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय द्वारा वित्त पोषित एक योजना है, जिसके तहत परिवारों को सीधे लाभ हस्तांतरित (Direct Benefit Transfer) किया जाता है। उन्होंने बताया कि सितंबर से अब तक 322 परिवारों को लगभग 8.05 करोड़ रुपये मिल चुके हैं। ताजो का कहना है कि यह भुगतान PFR गतिविधियों से जुड़ा नहीं है, लेकिन स्थानीय निवासी इसे लेकर संदेह में हैं। गोसांग गांव के निवासी बुरंग ने आरोप लगाया कि 'केबांग' (पारंपरिक ग्राम परिषद) को दरकिनार करके हस्ताक्षर लिए गए, जबकि इस परिषद के बहुमत का फैसला सभी पर बाध्यकारी होता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि MoU (समझौता ज्ञापन) पर हस्ताक्षर करने के लिए निवासियों को 2.5 लाख रुपये देने की पेशकश की गई थी, लेकिन मोंगाबे-इंडिया स्वतंत्र रूप से इस दावे की पुष्टि नहीं कर सका।
पूछे जाने पर, ताजो ने कहा कि वह गलत तरीके से लिए गए हस्ताक्षरों के आरोपों की "जरूर" जांच करेंगे। उन्होंने कहा, "ये सभी योजनाएं प्रभावित गांवों के हर परिवार के लिए हैं, न कि केवल कुछ चुनिंदा लोगों के लिए।"