केंद्र सरकार का अग्निपथ योजना में बदलाव करने का फैसला—जिसके तहत अग्निवीरों का कार्यकाल चार साल से बढ़ाकर छह साल किया जा रहा है और उन्हें स्थायी रूप से शामिल होने का एक और मौका दिया जा रहा है—अप्रत्यक्ष रूप से यह स्वीकार करता है कि मूल योजना पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया था। चार साल पहले शुरू की गई इस योजना की रक्षा विशेषज्ञों ने आलोचना की थी। उन्होंने इसके तर्क पर सवाल उठाए और चेतावनी दी कि इसे हितधारकों, विशेष रूप से सशस्त्र बलों और उनके कर्मियों के साथ पर्याप्त परामर्श किए बिना तैयार किया गया था। इसमें सबसे बड़ी कमी यह थी कि यह योजना भारतीय सशस्त्र बलों के स्थायी स्वरूप के विपरीत थी। एक पेशेवर सेना इस धारणा पर नहीं बनाई जा सकती कि अधिकांश कर्मी थोड़े समय के बाद नौकरी छोड़ देंगे। अधिकारियों के लिए 'शॉर्ट-सर्विस कमीशन' कोई नई बात नहीं थी, लेकिन उनका उद्देश्य अलग था, उनका कार्यकाल लंबा होता था, और उनकी शर्तें काफी हद तक नियमित अधिकारियों के समान ही होती थीं। इसके विपरीत, अग्निवीरों को केवल चार साल के रोजगार की गारंटी दी गई थी।
मूल व्यवस्था के तहत, हर बैच के 25 प्रतिशत कर्मियों को नियमित सेवा में शामिल किया जाना था। बाकी 75 प्रतिशत को नागरिक जीवन में वापस लौटना था, जिन्हें 12 लाख रुपये से कम का 'सेवरेंस पैकेज' (विदाई पैकेज) मिलना था और पुलिस तथा अर्धसैनिक बलों की भर्तियों में प्राथमिकता देने का वादा किया गया था। ताजा फैसले के तहत, बाकी 75 प्रतिशत कर्मियों को दो साल का अतिरिक्त समय और बेहतर वेतन दिया जाएगा। इस अवधि के अंत में, उन्हें नियमित भर्ती के लिए विचार किया जाएगा। इस रास्ते से शामिल होने वालों की वरिष्ठता (सीनियरिटी) पहले 25 प्रतिशत कर्मियों की तुलना में कम होगी। इस तरह सरकार ने एक दूसरा रास्ता तो बना दिया है, लेकिन योजना में अनिश्चितता अभी भी बनी हुई है। सरकार का तर्क है कि ये बदलाव अग्निवीरों की फिटनेस, प्रेरणा और तकनीकी चीजों को जल्दी सीखने की क्षमता पर मिले सकारात्मक फीडबैक के आधार पर किए गए हैं। लेकिन केवल शारीरिक फिटनेस और तकनीकी कौशल से कोई व्यक्ति पेशेवर सैनिक नहीं बन जाता। सैन्य प्रभावशीलता अनुभव, संस्थागत स्मृति, यूनिट के भीतर आपसी तालमेल और वर्षों की सेवा के दौरान विकसित भरोसे के संबंधों पर भी निर्भर करती है। कर्मियों का बार-बार बदलना इन खूबियों को कमजोर कर सकता है। भारतीय सशस्त्र बलों ने अपनी पेशेवर कार्यक्षमता, अनुशासन और ऑपरेशनल दक्षता के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है।
किसी भी भर्ती नीति को इन खूबियों को सुरक्षित रखना चाहिए, न कि एक युवा सेना बनाने की कोशिश में इनसे समझौता करना चाहिए। इसके अलावा, यह सवाल भी बना हुआ है कि जो लोग अंततः सैन्य सेवा छोड़ देंगे, उनका क्या होगा? जो युवा देशभक्ति के जज्बे और पेशेवर महत्वाकांक्षाओं के साथ सेना में शामिल होते हैं, उनके लिए फैक्ट्रियों, रिहायशी इलाकों और व्यावसायिक परिसरों में सुरक्षा गार्ड के तौर पर काम करने के विचार को अपनाना मुश्किल हो सकता है। सैन्य प्रशिक्षण को बेहतर पहचान मिलनी चाहिए। एक और चिंताजनक पहलू यह है कि अल्पसंख्यकों के बीच इस योजना को लेकर बहुत कम उत्साह है। सशस्त्र बलों में उनकी भागीदारी पहले से ही चिंता का विषय है। सशस्त्र बलों जैसे राष्ट्रीय संस्थान को सभी समुदायों के बीच भरोसा जगाना चाहिए। सशस्त्र बल केवल रोजगार देने वाली कोई संस्था नहीं हैं; उन पर देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी होती है। उनकी कार्मिक नीति मुख्य रूप से परिचालन संबंधी जरूरतों, पेशेवर उत्कृष्टता और सेवा करने वालों के कल्याण पर आधारित होनी चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा एक अत्यंत गंभीर विषय है, जिसे जनशक्ति प्रबंधन (मैनपावर मैनेजमेंट) के किसी प्रयोग की तरह नहीं देखा जा सकता।
Tags: