उत्तर प्रदेश : पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी कर चल रहे ईंट-भट्ठों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने बिना आवश्यक पर्यावरणीय मंजूरी के संचालित हो रहे ईंट-भट्ठों के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार और संबंधित विभागों से जवाब तलब किया है। अदालत ने सभी पक्षों को जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है।
कोर्ट के इस कदम के बाद उन ईंट-भट्ठा संचालकों में चिंता बढ़ गई है, जो कथित तौर पर जरूरी पर्यावरणीय अनुमति के बिना संचालन कर रहे हैं। वहीं पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों ने अदालत के रुख का स्वागत किया है।
बिना मंजूरी चल रहे भट्ठों पर उठे सवाल
यह मामला मेरठ निवासी नितिश कुमार और अन्य लोगों की ओर से दाखिल याचिका से जुड़ा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि उत्तर प्रदेश में कई ईंट-भट्ठे राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (SEIAA) से जरूरी पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी लिए बिना संचालित किए जा रहे हैं।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ईंट निर्माण के लिए मिट्टी की खुदाई और बड़े स्तर पर ईंधन के इस्तेमाल से पर्यावरण पर सीधा असर पड़ता है। इसलिए ऐसे उद्योगों का संचालन पर्यावरणीय नियमों के दायरे में आना चाहिए।
उन्होंने अदालत से मांग की है कि राज्य में चल रहे सभी ईंट-भट्ठों का सर्वे कराया जाए और जिन इकाइयों के पास वैध पर्यावरणीय मंजूरी नहीं है, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए।
हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब
इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि पर्यावरणीय मंजूरी के बिना ईंट-भट्ठों के संचालन को लेकर उठाई गई शिकायतों पर विचार किया जाना जरूरी है।
अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार समेत सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब सरकार और संबंधित विभागों को यह बताना होगा कि राज्य में ईंट-भट्ठों के संचालन को लेकर नियमों का कितना पालन किया जा रहा है और बिना अनुमति चल रही इकाइयों पर क्या कार्रवाई की गई है।
प्रदूषण को लेकर पहले भी उठते रहे हैं सवाल
ईंट-भट्ठों से निकलने वाला धुआं और प्रदूषण लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। कई क्षेत्रों में स्थानीय लोगों ने आरोप लगाए हैं कि नियमों की अनदेखी कर चल रहे भट्ठों से हवा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, ईंट-भट्ठों से निकलने वाले धुएं में कई ऐसे तत्व होते हैं, जो स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों पर असर डाल सकते हैं। यही वजह है कि इनके संचालन के लिए अलग-अलग पर्यावरणीय मानक तय किए गए हैं।
पर्यावरण संरक्षण कानूनों का हवाला
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 और पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2006 का हवाला दिया गया। उनका तर्क है कि ईंट-भट्ठों को बिना निर्धारित प्रक्रिया पूरी किए संचालित नहीं किया जा सकता।
याचिका में यह भी कहा गया कि पहले भी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से निर्देश जारी किए गए थे, जिनमें संचालन की अनुमति देने से पहले आवश्यक पर्यावरणीय मंजूरी की जांच करना जरूरी बताया गया था।
ईंट-भट्ठा उद्योग पर बढ़ेगा दबाव
उत्तर प्रदेश में ईंट-भट्ठा उद्योग बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार देता है और निर्माण क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि पर्यावरण नियमों का पालन करना भी उतना ही जरूरी है।
हाईकोर्ट की सख्ती के बाद ईंट-भट्ठा संचालकों को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके पास सभी जरूरी अनुमतियां मौजूद हों। नियमों का उल्लंघन मिलने पर कार्रवाई की संभावना बढ़ सकती है।
प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल
मामले में प्रशासनिक निगरानी की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है। अगर बिना मंजूरी के ईंट-भट्ठे संचालित हो रहे हैं तो संबंधित विभागों की जिम्मेदारी तय करने की मांग भी उठ रही है।
पर्यावरण से जुड़े मामलों में अक्सर यह सवाल उठता रहा है कि नियम तो बनाए जाते हैं, लेकिन उनका पालन सुनिश्चित करने के लिए निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
आगे की सुनवाई पर नजर
अब सभी की नजर उत्तर प्रदेश सरकार और संबंधित विभागों के जवाब पर है। सरकार की ओर से अदालत में यह जानकारी दी जाएगी कि राज्य में ईंट-भट्ठों की स्थिति क्या है और पर्यावरणीय नियमों को लागू करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।
हाईकोर्ट के इस कदम को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अगर जांच में बिना मंजूरी चल रहे ईंट-भट्ठे पाए जाते हैं तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई हो सकती है।
कुल मिलाकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्ती ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि उद्योगों के संचालन में पर्यावरणीय नियमों का पालन अनिवार्य है। विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण का संतुलन बनाए रखना जरूरी है और इसी उद्देश्य से अदालत ने सरकार से जवाब मांगा है।
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