कानपुर/प्रयागराज। कानपुर में अवैध कॉलोनियों और बिना स्वीकृत ले-आउट के बड़े पैमाने पर हुए निर्माण को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने कानपुर विकास प्राधिकरण (केडीए) के अधिकारियों से पूछा है कि यदि संबंधित कॉलोनी अवैध है तो वह प्राधिकरण की निगरानी के बावजूद बिना किसी रोक-टोक के कैसे विकसित हो गई। कोर्ट ने मामले में केडीए के उपाध्यक्ष, सचिव और प्रवर्तन जोन-4 के प्रभारी अधिकारी को नोटिस जारी करते हुए व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।
मामला कानपुर नगर के गंगापुर स्थित मौजा देहली सुजानपुर की नेहरू स्मारक सहकारी गृह निर्माण समिति लिमिटेड की कॉलोनी से जुड़ा है। अदालत के सामने सवाल उठाया गया कि जब कॉलोनी के लिए स्वीकृत ले-आउट प्लान नहीं था और इसे अवैध माना जा रहा है तो इतने बड़े स्तर पर निर्माण आखिर किस तरह होता चला गया। विकास प्राधिकरण के अधिकारियों को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई और यदि जानकारी थी तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की खंडपीठ ने की। याचिका रवि कुमार और एक अन्य की ओर से दाखिल की गई है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं के साथ प्राधिकरण और राज्य सरकार का पक्ष भी अदालत के सामने रखा गया। हाईकोर्ट ने पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए जवाबदेही तय करने की दिशा में अधिकारियों से विस्तृत जानकारी मांगी है।
जिन अफसरों के कार्यकाल में बनी कॉलोनी उनके नाम भी मांगे
हाईकोर्ट ने केवल वर्तमान अधिकारियों से जवाब मांगने तक मामला सीमित नहीं रखा है। अदालत ने केडीए से यह भी बताने को कहा है कि जिस अवधि में संबंधित अवैध कॉलोनी विकसित हुई, उस दौरान प्राधिकरण में उपाध्यक्ष और सचिव के पद पर कौन-कौन अधिकारी तैनात थे। यानी अब यह भी सामने आ सकता है कि कॉलोनी के विस्तार के समय केडीए की कमान किन अधिकारियों के हाथ में थी।
कोर्ट का सवाल सीधे तौर पर निगरानी व्यवस्था और अधिकारियों की जिम्मेदारी से जुड़ा है। किसी कॉलोनी के विकसित होने में सड़क, भूखंडों का विभाजन और बड़ी संख्या में निर्माण जैसी गतिविधियां होती हैं। ऐसे में अदालत ने पूछा है कि प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र में बड़े पैमाने पर अवैध निर्माण किन परिस्थितियों में होने दिया गया।
29 सितंबर तक व्यक्तिगत हलफनामा
हाईकोर्ट ने केडीए के उपाध्यक्ष, सचिव और प्रवर्तन जोन-4 के प्रभारी अधिकारी को **29 सितंबर 2026 तक व्यक्तिगत हलफनामा** दाखिल करने का निर्देश दिया है। इससे अधिकारियों को अदालत के सामने अपने स्तर से स्थिति स्पष्ट करनी होगी।
मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि केडीए की अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर कानपुर शहर की **152 अनधिकृत कॉलोनियों की सूची** उपलब्ध होने की जानकारी दी गई है। इससे शहर में अनधिकृत कॉलोनियों का मुद्दा केवल एक कॉलोनी तक सीमित नहीं रहने का संकेत मिलता है। हालांकि मौजूदा हाईकोर्ट की कार्यवाही विशेष रूप से गंगापुर, मौजा देहली सुजानपुर स्थित संबंधित कॉलोनी को लेकर है।
अवैध कॉलोनियों से आम खरीदारों पर भी संकट
शहरी क्षेत्रों में अनधिकृत कॉलोनियों का विस्तार आम लोगों के लिए बड़ी परेशानी का कारण बन सकता है। प्लॉट या मकान खरीदते समय कई लोग कॉलोनी के ले-आउट की स्वीकृति, भूमि उपयोग और संबंधित विकास प्राधिकरण की अनुमति जैसी तकनीकी जानकारियों की पूरी जांच नहीं कर पाते। बाद में निर्माण या कॉलोनी अवैध पाए जाने पर खरीदारों को कानूनी और प्रशासनिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
ऐसी कॉलोनियों में बुनियादी सुविधाओं का सवाल भी महत्वपूर्ण होता है। सड़क, जल निकासी, सीवर, पेयजल और अन्य नागरिक सुविधाओं के व्यवस्थित विकास के लिए नियोजित ले-आउट अहम होता है। बिना स्वीकृत योजना के बसावट बढ़ने से भविष्य में पूरे इलाके के नियोजन पर दबाव पड़ सकता है।
केडीए की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद सबसे बड़ा सवाल केडीए की प्रवर्तन व्यवस्था को लेकर खड़ा हुआ है। विकास प्राधिकरण का काम केवल नक्शे और योजनाएं स्वीकृत करना नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र में अनधिकृत विकास और निर्माण पर निगरानी रखना भी है। ऐसे में यदि कोई बड़ी कॉलोनी लंबे समय में विकसित होती है तो जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।
अदालत द्वारा पूर्व अधिकारियों के नाम मांगे जाने से यह संकेत मिलता है कि मामले में केवल वर्तमान स्थिति की जानकारी पर्याप्त नहीं होगी। कोर्ट यह जानना चाहता है कि संबंधित अवधि में जिम्मेदारी किसके पास थी और अवैध कॉलोनी के विकास को रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए।
अब 29 सितंबर की रिपोर्ट पर नजर
अब इस मामले में केडीए के अधिकारियों के व्यक्तिगत हलफनामों पर नजर रहेगी। इन हलफनामों से यह स्पष्ट हो सकता है कि संबंधित कॉलोनी कब और किन परिस्थितियों में विकसित हुई, प्राधिकरण को इसकी जानकारी कब मिली और अलग-अलग समय पर क्या कार्रवाई की गई।
हाईकोर्ट की सख्ती के बाद कानपुर में अवैध कॉलोनियों के खिलाफ कार्रवाई और निगरानी व्यवस्था भी चर्चा में आ गई है। केडीए की वेबसाइट पर 152 अनधिकृत कॉलोनियों की सूची का उल्लेख पहले से मौजूद है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह मामला शहर के अनियोजित विकास और अधिकारियों की जवाबदेही के व्यापक सवाल को भी सामने ला सकता है।