श्रीनगर: कश्मीर की मशहूर चेरी अब स्थानीय मंडियों तक सीमित नहीं है। अपनी मिठास, रंग और गुणवत्ता के कारण इसकी मांग देश के बड़े शहरों के साथ खाड़ी देशों में भी बढ़ रही है। इस साल मौसम की चुनौतियों के कारण उत्पादन कम रहने के बावजूद किसानों को चेरी के अच्छे दाम मिले। अब जम्मू-कश्मीर में चेरी उत्पादन और किसानों की कमाई बढ़ाने के लिए करीब 126 करोड़ रुपये की योजना पर काम किया जा रहा है।
कश्मीर घाटी में चेरी की खेती लंबे समय से होती आ रही है। यहां की जलवायु और मिट्टी चेरी उत्पादन के लिए अनुकूल मानी जाती है। श्रीनगर, गांदरबल, बारामुला और आसपास के कई क्षेत्रों में बड़ी संख्या में किसान चेरी के बागों पर निर्भर हैं। यह फल जल्दी खराब होने वाला होता है, इसलिए इसे तोड़ने के बाद कम समय में बाजार तक पहुंचाना बेहद जरूरी होता है।
हाल के वर्षों में बेहतर पैकेजिंग, कोल्ड चेन और तेज परिवहन सुविधाओं के कारण कश्मीरी चेरी को दूर के बाजारों तक भेजना आसान हुआ है। देश के विभिन्न हिस्सों के साथ खाड़ी देशों तक भी इसकी खेप पहुंचाई जा रही है। विदेशी बाजारों में अच्छी गुणवत्ता वाली चेरी की मांग ने उत्पादकों के लिए कमाई के नए अवसर पैदा किए हैं। इस बार उत्पादन अपेक्षाकृत कम रहा, लेकिन बाजार में बेहतर कीमत मिलने से कई किसानों को राहत मिली। कम आवक और अच्छी मांग के कारण उच्च गुणवत्ता वाली चेरी को बेहतर भाव मिला। किसानों के लिए यह महत्वपूर्ण है क्योंकि चेरी की फसल तैयार करने में पूरे साल बागों की देखभाल करनी पड़ती है और कटाई के बाद इसे तुरंत बाजार पहुंचाने की चुनौती रहती है।
अब चेरी की खेती को आधुनिक बनाने और उत्पादन बढ़ाने के लिए करीब 126 करोड़ रुपये की व्यापक योजना तैयार की गई है। इसका उद्देश्य पारंपरिक बागों को आधुनिक तकनीक से जोड़ना, बेहतर किस्मों को बढ़ावा देना और प्रति हेक्टेयर उत्पादन में वृद्धि करना है। किसानों को नई तकनीक, पौध प्रबंधन और वैज्ञानिक तरीके से बागवानी के लिए प्रोत्साहित करने पर भी जोर दिया जाएगा। योजना में हाई डेंसिटी प्लांटेशन को बढ़ावा देना भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस तकनीक में सीमित जमीन पर अधिक पौधे लगाए जाते हैं और उनकी वैज्ञानिक तरीके से देखभाल की जाती है। इससे परंपरागत बागों के मुकाबले उत्पादन बढ़ाने की संभावना रहती है। बेहतर गुणवत्ता वाले पौधों और आधुनिक सिंचाई तकनीक का इस्तेमाल भी किसानों को फायदा पहुंचा सकता है।
चेरी कारोबार में सबसे बड़ी चुनौती इसकी कम शेल्फ लाइफ है। पेड़ से तोड़ने के बाद फल को लंबे समय तक सामान्य तापमान पर रखना मुश्किल होता है। इसलिए योजना में ग्रेडिंग, पैकिंग, कोल्ड स्टोरेज और परिवहन व्यवस्था को मजबूत करना किसानों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। इससे फसल खराब होने का नुकसान कम होगा और चेरी को देश-विदेश के बाजारों तक बेहतर स्थिति में पहुंचाया जा सकेगा।
निर्यात बढ़ने से किसानों को स्थानीय बाजार पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। खाड़ी देशों सहित अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कश्मीरी चेरी की पहचान मजबूत होने पर किसानों को बेहतर कीमत मिलने की संभावना बढ़ेगी। इसके साथ ही पैकेजिंग, ग्रेडिंग, परिवहन और निर्यात से जुड़े क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं। कश्मीर पहले से सेब उत्पादन के लिए दुनियाभर में जाना जाता है, लेकिन अब चेरी भी घाटी की बागवानी अर्थव्यवस्था में अपनी जगह मजबूत कर रही है। करीब 126 करोड़ रुपये की योजना सही तरीके से लागू होने पर उत्पादन, गुणवत्ता और निर्यात बढ़ने के साथ किसानों की आय में भी इजाफा होने की उम्मीद है।
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