लखनऊ : उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और अधिक आबादी वाले राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं को लोगों के नजदीक पहुंचाना बेहद जरूरी है। अचानक बीमारी, दुर्घटना या प्रसव की स्थिति में मरीज और उसके परिवार के सामने सबसे बड़ी चुनौती समय पर अस्पताल पहुंचने की होती है। यदि डॉक्टर, जांच, इमरजेंसी और विशेषज्ञ इलाज की सुविधा जिले में ही उपलब्ध हो तो मरीज को बड़े शहर तक ले जाने में लगने वाला समय और खर्च बच सकता है।
प्रदेश में मेडिकल कॉलेज, जिला अस्पताल, क्रिटिकल केयर ब्लॉक, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयोगशालाएं, एम्स और डिजिटल स्वास्थ्य सेवाएं मिलकर एक व्यापक हेल्थकेयर नेटवर्क तैयार कर सकती हैं। इससे मरीज को प्राथमिक जांच से लेकर सुपर स्पेशलिटी उपचार तक चरणबद्ध तरीके से चिकित्सा सुविधा मिल सकती है।
मेडिकल कॉलेज से जिला स्तर पर मजबूत इलाज
मेडिकल कॉलेज केवल डॉक्टरों की पढ़ाई का संस्थान नहीं होता। इसके साथ ओपीडी, इमरजेंसी, वार्ड, ऑपरेशन थिएटर, प्रयोगशाला, डॉक्टर और नर्सों की पूरी व्यवस्था जुड़ी होती है। जिला अस्पताल से संबद्ध मेडिकल कॉलेज बनने पर पहले से उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं को अतिरिक्त बेड, बेहतर जांच और विशेषज्ञ डॉक्टरों का सहयोग मिल सकता है।
इससे महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और गंभीर रोगियों के लिए स्थानीय स्तर पर नई सुविधाएं विकसित हो सकती हैं। मरीज को इलाज की शुरुआत के लिए तुरंत बड़े शहर जाने की जरूरत कम हो सकती है।
समय पर इलाज से बच सकती है जान
हार्ट अटैक, स्ट्रोक, सड़क दुर्घटना, सांस की गंभीर समस्या और प्रसव संबंधी जटिलताओं में प्रत्येक मिनट महत्वपूर्ण होता है। यदि पास में क्रिटिकल केयर सुविधा उपलब्ध हो तो मरीज का शुरुआती इलाज जल्दी शुरू किया जा सकता है।
क्रिटिकल केयर ब्लॉक और आधुनिक प्रयोगशालाएं जिला स्तर की क्षमता बढ़ा सकती हैं। जांच रिपोर्ट जल्दी मिलने से डॉक्टर समय पर बीमारी की पहचान कर उपचार का निर्णय ले सकते हैं। आवश्यकता पड़ने पर मरीज को स्थिर करने के बाद बड़े चिकित्सा संस्थान में भेजा जा सकता है।
रेफरल व्यवस्था की अहम भूमिका
हर मरीज को एम्स या सुपर स्पेशलिटी अस्पताल भेजने की आवश्यकता नहीं होती। सामान्य बीमारियों का इलाज प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अथवा जिला अस्पताल में हो सकता है। विशेषज्ञ उपचार की जरूरत होने पर मरीज को मेडिकल कॉलेज भेजा जा सकता है।
हार्ट, न्यूरो, किडनी, कैंसर, ट्रॉमा और जटिल सर्जरी जैसे मामलों में उसे एम्स या सुपर स्पेशलिटी सेंटर रेफर किया जा सकता है। यह रेफरल व्यवस्था सही ढंग से काम करे तो मरीज और उसके परिजनों को अलग-अलग अस्पतालों में भटकने से राहत मिल सकती है।
नए डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी होंगे तैयार
मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ने से प्रदेश के युवाओं को चिकित्सा शिक्षा के अधिक अवसर मिल सकते हैं। इन संस्थानों से केवल डॉक्टर ही तैयार नहीं होते, बल्कि नर्सिंग, फार्मेसी, पैरामेडिकल, रेडियोलॉजी, लैब टेक्नोलॉजी और अस्पताल प्रबंधन के क्षेत्र में भी प्रशिक्षण तथा रोजगार के रास्ते खुलते हैं।
जिले में मेडिकल कॉलेज होने से स्थानीय युवाओं को अपने क्षेत्र के नजदीक पढ़ाई और प्रशिक्षण का अवसर मिलता है। इससे भविष्य में ग्रामीण और छोटे शहरी क्षेत्रों में प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है।
एम्स और टेलीमेडिसिन का सहयोग
रायबरेली और गोरखपुर स्थित एम्स जैसे बड़े संस्थान इलाज, मेडिकल शिक्षा, अनुसंधान तथा सुपर स्पेशलिटी सेवाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज जटिल मरीजों को इन संस्थानों तक रेफर कर सकते हैं।
किसी जिले में विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध न होने पर टेलीमेडिसिन के माध्यम से सलाह ली जा सकती है। डिजिटल हेल्थ रिकॉर्ड, हेल्थ आईडी और ई-हॉस्पिटल जैसी व्यवस्थाएं मरीज की जांच तथा उपचार संबंधी जानकारी व्यवस्थित रखने में मदद कर सकती हैं। फॉलोअप के लिए बार-बार लंबी यात्रा करने की आवश्यकता भी कम हो सकती है।
स्वास्थ्य सुविधाओं से बढ़ेंगे रोजगार
अस्पताल और मेडिकल कॉलेज स्थानीय रोजगार भी बढ़ाते हैं। इनमें डॉक्टर, नर्स, फार्मासिस्ट, लैब टेक्नीशियन, वार्ड कर्मचारी, एंबुलेंस चालक, डाटा एंट्री ऑपरेटर, हाउसकीपिंग और सुरक्षाकर्मियों की जरूरत होती है। आसपास मेडिकल स्टोर, भोजनालय, परिवहन और किराये के कमरों जैसी सेवाओं की मांग भी बढ़ती है।
घर के पास बेहतर इलाज उपलब्ध होने का सबसे अधिक लाभ महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को मिल सकता है। इससे नियमित जांच, टीकाकरण, प्रसव और फॉलोअप आसान होंगे। मजबूत जिला स्तरीय स्वास्थ्य नेटवर्क मरीजों का भरोसा बढ़ाने के साथ छोटे शहरों को स्वास्थ्य केंद्र के रूप में विकसित करने में सहायक बन सकता है।