लखनऊ। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की नई टीम में उत्तर प्रदेश के पूर्व सांसद **हरीश द्विवेदी** का कद बढ़ गया है। बस्ती से दो बार लोकसभा सांसद रहे द्विवेदी को भाजपा का **राष्ट्रीय महासचिव** बनाया गया है। 2024 के लोकसभा चुनाव में बस्ती सीट गंवाने के बाद भी पार्टी ने उन्हें किनारे नहीं किया। वह संगठन में सक्रिय रहे और असम भाजपा के प्रभारी की जिम्मेदारी संभाली। अब राष्ट्रीय महासचिव बनाकर पार्टी नेतृत्व ने उन पर बड़ा भरोसा जताया है।
भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम में कुल आठ राष्ट्रीय महासचिव बनाए गए हैं। हरीश द्विवेदी के अलावा स्मृति ईरानी, सतीश पूनिया और गजेंद्र सिंह पटेल जैसे नेताओं को भी इस महत्वपूर्ण पद पर जगह मिली है।
ABVP से शुरू हुआ राजनीतिक सफर
हरीश द्विवेदी की राजनीतिक यात्रा छात्र राजनीति से शुरू हुई। 22 अक्टूबर 1973 को उत्तर प्रदेश के बस्ती क्षेत्र में जन्मे द्विवेदी मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं। उनके पिता साधु शरण दुबे शिक्षक थे। छात्र जीवन में ही वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी ABVP से जुड़ गए थे।
ABVP में काम करते हुए उन्होंने संगठन की कार्यशैली को करीब से समझा। इसके बाद भारतीय जनता युवा मोर्चा और भाजपा संगठन में अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाते हुए आगे बढ़े। यही लंबा संगठनात्मक अनुभव अब उन्हें पार्टी की राष्ट्रीय टीम तक ले आया है।
2014 में पहली बार पहुंचे लोकसभा
हरीश द्विवेदी को भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में बस्ती से उम्मीदवार बनाया था। नरेंद्र मोदी की अगुवाई में हुए उस चुनाव में उन्होंने जीत दर्ज की और पहली बार संसद पहुंचे।
2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उन पर दोबारा भरोसा जताया। इस चुनाव में भी द्विवेदी बस्ती से जीतने में सफल रहे। इस तरह वह लगातार दो बार लोकसभा सांसद रहे और 2014 से 2024 तक संसद में बस्ती का प्रतिनिधित्व किया।
सांसद रहते हुए उन्होंने संसद की कई समितियों में भी काम किया। इससे उन्हें संसदीय राजनीति के साथ प्रशासनिक और नीतिगत मामलों का अनुभव मिला।
2024 में हार गए बस्ती की सीट
लगातार दो चुनाव जीतने वाले हरीश द्विवेदी को 2024 के लोकसभा चुनाव में झटका लगा। वह बस्ती सीट से चुनाव हार गए। समाजवादी पार्टी के राम प्रसाद चौधरी ने उन्हें पराजित किया और इसके साथ ही उनका दस साल का संसदीय कार्यकाल समाप्त हो गया।
आमतौर पर चुनाव हारने के बाद किसी नेता की सक्रियता कम होने की चर्चा शुरू हो जाती है, लेकिन द्विवेदी के मामले में तस्वीर अलग रही। भाजपा ने उनके संगठनात्मक अनुभव का इस्तेमाल जारी रखा।
हार के बाद संगठन में हुए सक्रिय
लोकसभा चुनाव हारने के बाद हरीश द्विवेदी संगठन के काम में ज्यादा सक्रिय दिखाई दिए। उन्हें **असम भाजपा का प्रभारी** बनाया गया। उत्तर प्रदेश से निकलकर पूर्वोत्तर के महत्वपूर्ण राज्य की जिम्मेदारी मिलना उनके लिए बड़ी संगठनात्मक भूमिका थी। नई नियुक्ति से ठीक पहले भी उनकी पहचान असम भाजपा के प्रदेश प्रभारी के रूप में थी।
असम भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण राज्य है। ऐसे राज्य का प्रभार देकर पार्टी ने संकेत दिया था कि चुनावी हार के बावजूद केंद्रीय नेतृत्व का द्विवेदी पर भरोसा कायम है।
अब राष्ट्रीय महासचिव बनाए जाने को उसी संगठनात्मक सफर की अगली बड़ी सीढ़ी माना जा रहा है।
यूपी के ब्राह्मण चेहरे के तौर पर भी अहम
हरीश द्विवेदी को उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रमुख ब्राह्मण नेताओं में गिना जाता है। नई राष्ट्रीय टीम में उनकी नियुक्ति को संगठनात्मक अनुभव के साथ प्रदेश के सामाजिक समीकरणों से भी जोड़कर देखा जा रहा है। मीडिया रिपोर्टों में उनकी नियुक्ति को भाजपा द्वारा राष्ट्रीय संगठन में उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण प्रतिनिधित्व को महत्व देने के रूप में भी देखा गया है।
उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। उससे पहले नितिन नबीन की राष्ट्रीय टीम में यूपी के कई नेताओं को बड़ी जिम्मेदारियां मिली हैं। ऐसे में हरीश द्विवेदी की नियुक्ति का राजनीतिक महत्व और बढ़ जाता है।
राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर क्या होगी भूमिका?
भाजपा में राष्ट्रीय महासचिव का पद संगठन के सबसे महत्वपूर्ण पदों में शामिल है। राष्ट्रीय महासचिवों को राज्यों का प्रभार, संगठन विस्तार, चुनावी रणनीति और पार्टी के विशेष अभियानों की जिम्मेदारी दी जा सकती है।
हरीश द्विवेदी का ABVP से लेकर लोकसभा और प्रदेश प्रभारी तक का अनुभव उनके लिए इस भूमिका में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। खास बात यह है कि पार्टी ने चुनावी हार के बजाय उनके लंबे संगठनात्मक अनुभव को प्राथमिकता दी है।
नितिन नबीन की नई टीम में राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर नियुक्ति के बाद हरीश द्विवेदी अब केवल उत्तर प्रदेश की राजनीति तक सीमित नहीं रहेंगे। उन्हें दूसरे राज्यों और राष्ट्रीय स्तर के चुनावी अभियानों में भी बड़ी भूमिका मिल सकती है। बस्ती में 2024 की हार के बाद संगठन में उनकी सक्रियता और अब प्रमोशन यह दिखाता है कि भाजपा नेतृत्व ने उन्हें भविष्य की संगठनात्मक रणनीति में अहम स्थान दिया है।