बिजनौर। बिजनौर के अमानगढ़ टाइगर रिजर्व में मिली एक बूढ़ी और बेहद कमजोर बाघिन की कानपुर चिड़ियाघर ले जाते समय रास्ते में मौत हो गई। वन विभाग की टीम ने बाघिन को गंभीर हालत में रेस्क्यू किया था, लेकिन उसकी हालत इतनी खराब थी कि वह सफर के दौरान ही जिंदगी की जंग हार गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बाघिन का पेट पूरी तरह खाली पाया गया, जिससे यह सामने आया कि वह लंबे समय से शिकार नहीं कर पा रही थी। वन विभाग के अनुसार, बाघिन की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई है और वृद्धावस्था इसकी मुख्य वजह रही।
जानकारी के अनुसार, अमानगढ़ टाइगर रिजर्व के गुर्जर गेट के पास शनिवार को वन विभाग की टीम को एक बाघिन दिखाई दी थी। बाघिन काफी कमजोर हालत में थी और ठीक से खड़ी भी नहीं हो पा रही थी। सूचना मिलने के बाद वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और उसे रेस्क्यू किया गया। अधिकारियों के मुताबिक, बाघिन की हालत को देखते हुए उसे इलाज और देखभाल के लिए कानपुर चिड़ियाघर भेजने का फैसला लिया गया।
रेस्क्यू के दौरान बाघिन को बिना ट्रैंकुलाइज किए ही पिंजरे में रखा गया, क्योंकि उसकी स्थिति पहले से ही काफी कमजोर थी। वनकर्मियों ने उसे खाने के लिए मुर्गा दिया, लेकिन उसने उसे नहीं खाया। हालांकि, बाघिन ने पानी जरूर पिया था। इसके बाद उसे कानपुर चिड़ियाघर के लिए रवाना किया गया, लेकिन चिड़ियाघर पहुंचने से करीब 40 किलोमीटर पहले ही उसने दम तोड़ दिया।
कानपुर में बाघिन का पोस्टमार्टम कराया गया। रिपोर्ट में सामने आया कि उसका पेट पूरी तरह खाली था। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, बाघिन की उम्र करीब 15 वर्ष थी। जंगल में बाघ और बाघिन के लिए 15 वर्ष की उम्र काफी अधिक मानी जाती है। बढ़ती उम्र के कारण उसकी शारीरिक क्षमता कम हो गई थी और वह शिकार करने में असमर्थ हो गई थी।
वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि सामान्य तौर पर एक वयस्क बाघ या बाघिन का वजन डेढ़ से ढाई कुंतल तक हो सकता है, लेकिन इस बाघिन का वजन एक कुंतल से भी कम था। इससे उसकी कमजोर हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है। शरीर पर किसी तरह के संघर्ष या चोट के निशान भी नहीं मिले हैं। जांच के बाद अधिकारियों ने इसे प्राकृतिक मृत्यु बताया है।
अमानगढ़ टाइगर रिजर्व वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है। यहां बड़ी संख्या में बाघ, तेंदुए और अन्य वन्यजीव पाए जाते हैं। वन विभाग समय-समय पर जंगल में रहने वाले वन्यजीवों की निगरानी करता है और जरूरत पड़ने पर उनका रेस्क्यू भी किया जाता है।
डीएफओ जय सिंह कुशवाहा ने बताया कि बाघिन बहुत बूढ़ी हो चुकी थी और लंबे समय से शिकार करने में सक्षम नहीं थी। इसी कारण उसका पेट खाली था। उन्होंने कहा कि बाघिन के शरीर पर किसी प्रकार की बाहरी चोट नहीं मिली है। उसकी मौत पूरी तरह प्राकृतिक कारणों से हुई है।
पोस्टमार्टम के बाद वन विभाग ने कानपुर में ही बाघिन के शव को नियमानुसार नष्ट कर दिया। इस घटना ने एक बार फिर जंगल में रहने वाले उम्रदराज वन्यजीवों की चुनौतियों को सामने ला दिया है। उम्र बढ़ने के साथ शिकार करने की क्षमता कम होना वन्यजीवों के जीवन का एक प्राकृतिक हिस्सा है। अमानगढ़ की इस बूढ़ी बाघिन की कहानी जंगल के संघर्ष और प्राकृतिक जीवन चक्र की एक भावुक तस्वीर पेश करती है।