पटना: बिहार में सुरक्षित मातृत्व और मातृ-शिशु स्वास्थ्य की दिशा में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। राज्य में अब पहले की तुलना में अधिक गर्भवती महिलाएं प्रसव के लिए अस्पताल और स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंच रही हैं। संस्थागत प्रसव की दर बढ़कर 81.1 प्रतिशत तक पहुंचने की बात सामने आई है। स्वास्थ्य सेवाओं तक बढ़ती पहुंच को गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं की सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

संस्थागत प्रसव का अर्थ अस्पताल, स्वास्थ्य केंद्र या मान्यता प्राप्त चिकित्सा संस्थान में प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की निगरानी में बच्चे का जन्म होना है। घर पर बिना पर्याप्त चिकित्सा सुविधा के प्रसव की तुलना में अस्पताल में प्रसव के दौरान किसी आपात स्थिति से निपटने के लिए डॉक्टर, नर्स, दवाएं और दूसरी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध होने की संभावना अधिक रहती है।
81.1 प्रतिशत तक पहुंचा संस्थागत प्रसव
राज्य में संस्थागत प्रसव का प्रतिशत बढ़ना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि गर्भवती महिलाओं और उनके परिवारों में अस्पताल में प्रसव कराने को लेकर जागरूकता बढ़ी है। सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं, आशा कार्यकर्ताओं और विभिन्न मातृ स्वास्थ्य योजनाओं ने भी महिलाओं को स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंचाने में भूमिका निभाई है। ग्रामीण क्षेत्रों में आशा और एएनएम गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के संपर्क में रहती हैं। नियमित जांच, टीकाकरण, पोषण संबंधी सलाह और प्रसव की संभावित तारीख के बारे में जानकारी देकर उन्हें सुरक्षित प्रसव के लिए तैयार किया जाता है।
सुरक्षित मातृत्व में संस्थागत प्रसव की अहम भूमिका
गर्भावस्था और प्रसव के दौरान अचानक कई तरह की जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। अत्यधिक रक्तस्राव, उच्च रक्तचाप, प्रसव में रुकावट और दूसरी चिकित्सकीय परिस्थितियों में तत्काल इलाज की जरूरत पड़ सकती है। अस्पताल में प्रसव होने पर ऐसी स्थिति की पहचान कर समय रहते इलाज शुरू किया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर महिला को उच्च चिकित्सा संस्थान में रेफर करने की व्यवस्था भी की जा सकती है। इसी वजह से मातृ और नवजात मृत्यु के जोखिम को कम करने की रणनीति में संस्थागत प्रसव को महत्वपूर्ण माना जाता है।
सरकारी योजनाओं से बढ़ी अस्पतालों तक पहुंच
गर्भवती महिलाओं को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार की विभिन्न योजनाएं संचालित की जाती हैं। जननी सुरक्षा योजना जैसी पहल संस्थागत प्रसव को प्रोत्साहित करती हैं। इसके अलावा सरकारी अस्पतालों में प्रसव और उससे जुड़ी कई स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। एम्बुलेंस सेवाओं का विस्तार भी ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है। प्रसव पीड़ा शुरू होने या आपात स्थिति में समय पर अस्पताल पहुंचना मां और बच्चे दोनों के लिए निर्णायक साबित हो सकता है।
आशा कार्यकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका
ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था में आशा कार्यकर्ता गर्भवती महिलाओं और स्वास्थ्य संस्थानों के बीच महत्वपूर्ण कड़ी हैं। गर्भावस्था की जानकारी मिलने के बाद पंजीकरण कराने से लेकर नियमित जांच और संस्थागत प्रसव के लिए प्रेरित करने तक उनकी भूमिका रहती है। प्रसव के बाद भी मां और नवजात की सेहत पर निगरानी जरूरी होती है। बच्चे का टीकाकरण, स्तनपान, पोषण और मां की स्वास्थ्य जांच से जुड़ी जानकारी भी स्वास्थ्यकर्मियों के माध्यम से दी जाती है।
अभी बाकी है बड़ी चुनौती
81.1 प्रतिशत संस्थागत प्रसव का आंकड़ा सुधार का संकेत है लेकिन इसका अर्थ यह भी है कि सभी प्रसव अभी स्वास्थ्य संस्थानों में नहीं हो रहे हैं। दूरदराज के इलाकों, कमजोर परिवहन व्यवस्था और स्वास्थ्य सुविधाओं की दूरी जैसी चुनौतियां कुछ परिवारों के लिए अस्पताल पहुंचने में बाधा बन सकती हैं। अब लक्ष्य संस्थागत प्रसव की दर बढ़ाने के साथ स्वास्थ्य संस्थानों में मिलने वाली सेवाओं की गुणवत्ता सुधारना भी होना चाहिए। केवल अस्पताल तक पहुंचना पर्याप्त नहीं है। प्रशिक्षित कर्मचारी, जरूरी दवाएं, आपातकालीन उपचार, साफ-सफाई और समय पर रेफरल की सुविधा भी उतनी ही जरूरी है।
राज्य में बढ़ता संस्थागत प्रसव सुरक्षित मातृत्व की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति का संकेत है। यदि स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और गुणवत्ता में लगातार सुधार होता रहा तो इसका सीधा लाभ गर्भवती महिलाओं और नवजात बच्चों को मिलेगा। 81.1 प्रतिशत तक पहुंची संस्थागत प्रसव दर अब शेष महिलाओं को भी सुरक्षित चिकित्सा व्यवस्था के दायरे में लाने की चुनौती और अवसर दोनों सामने रखती है।
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