पिछले हफ़्ते, वित्त मंत्री ने GST के कई नियमों में ढील देने के लिए कई उपायों की घोषणा की, और उनमें से कई वाकई तारीफ़ के काबिल हैं। देश भर के कारोबारियों ने बार-बार मुश्किल नियमों को पूरा करने की ज़रूरतों, रिफ़ंड में देरी, इनपुट टैक्स क्रेडिट को लेकर विवादों और ऐसी सख़्त कार्रवाई व्यवस्था की शिकायत की है, जिसमें छोटी-मोटी प्रक्रियात्मक गलतियों के लिए भी भारी जुर्माना भरना पड़ सकता है। हाल ही में हुई 57वीं GST काउंसिल की बैठक में मुख्य प्रस्तावों में GST के तहत गिरफ़्तारी के नियमों को हटाना और मुक़दमा चलाने की सीमा को ₹1 करोड़ से बढ़ाकर ₹5 करोड़ करना शामिल है। ज़्यादा से ज़्यादा सामान्य जुर्माना भी ₹25,000 से घटाकर ₹10,000 कर दिया गया है, जिससे कार्रवाई का तरीका ज़्यादा उचित हो गया है। कुल मिलाकर, इन उपायों से कारोबारियों में फैली चिंता और डर को दूर करने में मदद मिलनी चाहिए।
नियमों को आसान बनाना और कारोबारियों की चिंता कम करना
जानबूझकर नियम तोड़ने वालों और कारोबारियों से अनजाने में हुई गलतियों के बीच बहुत बारीक फ़र्क होता है। जब कार्रवाई को ज़रूरत से ज़्यादा सख़्त माना जाता है, तो कारोबार के मालिक टैक्स से जुड़े विवादों को सुलझाने में ज़्यादा समय बिताते हैं और अपना कामकाज चलाने में कम समय दे पाते हैं। इसलिए, ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जो स्वेच्छा से नियमों का पालन करने को बढ़ावा दे, ताकि टैक्स देने वालों और अधिकारियों के बीच अच्छे संबंध बने रहें। रिफ़ंड और इनपुट टैक्स क्रेडिट से जुड़े सुधार भी उतने ही ज़रूरी हैं; इनमें किसी भी तरह की देरी से वर्किंग कैपिटल फँस सकती है, जिससे कंपनियों को रोज़मर्रा के कामकाज और वर्किंग कैपिटल की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए उधार लेना पड़ सकता है। काउंसिल ने GST रजिस्ट्रेशन और रिटर्न फ़ाइल करने में कागज़ी कार्रवाई और दिक्कतों को कम करने के लिए कई उपायों को मंज़ूरी दी है। इन बदलावों से टैक्स पर टैक्स लगने (कैस्केडिंग इफ़ेक्ट) की समस्या कम होती है और कारोबारियों पर वित्तीय बोझ भी घटता है। रजिस्ट्रेशन और नियमों को पूरा करने की प्रक्रियाओं को आसान बनाने का प्रस्ताव खासकर छोटे कारोबारियों के लिए बहुत फ़ायदेमंद है।
सामान ले जाते समय होने वाली जाँच में बदलाव
इस प्रस्ताव की एक और अहम बात यह है कि काउंसिल ने सामान ले जाते समय होने वाली फ़िज़िकल जाँच के नियमों में भी बदलाव किया है। अब किसी गाड़ी को सिर्फ़ पक्की जानकारी मिलने पर और जॉइंट कमिश्नर या उससे ऊपर के रैंक के अधिकारी की मंज़ूरी से ही रोका जा सकेगा; हर राज्य में जाँच होने के बजाय, अब जाँच सिर्फ़ सामान जहाँ से चला है और जहाँ पहुँचना है, वहीं होगी।
पारदर्शिता और जवाबदेही की ज़रूरत
ये कदम स्वागत योग्य हैं, लेकिन हैरानी की बात है कि GST काउंसिल ने 2017 में अपने गठन के बाद से उठाए गए उपायों के ज़मीनी असर पर विचार नहीं किया। फिर भी, भले ही ये बदलाव देर से आए हैं, लेकिन इनसे देश भर के कारोबारियों को बड़ी राहत मिलेगी। इससे भी ज़रूरी बात यह है कि लोग उन लोगों से ज़्यादा पारदर्शिता की उम्मीद करेंगे जो नीतियां लागू करते हैं। बिज़नेस को यह पता होना चाहिए कि रिफंड कब रोका जाता है, इनपुट टैक्स क्रेडिट कब ब्लॉक किया जाता है या रजिस्ट्रेशन एप्लीकेशन कब रिजेक्ट की जाती हैं। टैक्स अधिकारियों को अपने कामकाज को ज़्यादा पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना चाहिए।
भरोसे पर आधारित टैक्स सिस्टम बनाना
GST के लॉन्च के बाद से इसमें काफ़ी सुधार हुआ है। सुधार के अगले चरण में नियमों का पालन आसान बनाने और टैक्स देने वालों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। हाल की घोषणाएं सही दिशा में हैं। उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या प्रशासन उसी भरोसे के सिद्धांत को अपनाता है जिसे सुधार स्थापित करना चाहते हैं। हालाँकि, प्रस्तावित बदलाव अप्रैल 2027 में लागू होंगे, जिससे बिज़नेस को यह देखने के लिए लंबा इंतज़ार करना होगा कि उनका क्या नतीजा निकलता है।
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