गोंडा। उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर योगी सरकार के कैबिनेट मंत्री और निषाद पार्टी के अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद चर्चा में हैं। अपनी ही गठबंधन सरकार में मंत्री होने के बावजूद अधिकारियों की कार्यप्रणाली को लेकर उनकी नाराजगी खुलकर सामने आई है। लखनऊ में विरोध जताने के बाद अब संजय निषाद गोंडा में धरने पर बैठ गए। मंत्री के इस कदम से प्रशासनिक अमले में हलचल मच गई और मामला राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा का विषय बन गया।
संजय निषाद का आरोप है कि उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं और समाज से जुड़े लोगों की शिकायतों पर अधिकारी गंभीरता से कार्रवाई नहीं कर रहे हैं। उन्होंने स्थानीय प्रशासन और पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि जनता की समस्याओं का समाधान होना चाहिए। सरकार में मंत्री होने के बावजूद उन्हें धरने पर बैठना पड़ा तो इससे अधिकारियों के रवैये का अंदाजा लगाया जा सकता है।
गोंडा में मंत्री के धरने की खबर मिलते ही स्थानीय प्रशासन के अधिकारी सक्रिय हो गए। मौके पर अधिकारियों ने पहुंचकर उनसे बातचीत की और उनकी शिकायतों को सुनने की कोशिश की। इस दौरान निषाद पार्टी के कई कार्यकर्ता और समर्थक भी मौजूद रहे।
गोंडा में अचानक धरने पर बैठे संजय निषाद
संजय निषाद गोंडा पहुंचे तो यहां पार्टी कार्यकर्ताओं ने उनके सामने स्थानीय स्तर की कई समस्याएं रखीं। कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि शिकायत करने के बावजूद संबंधित अधिकारियों की ओर से सुनवाई नहीं की जा रही है।
मामले की जानकारी मिलने के बाद संजय निषाद नाराज हो गए और वहीं धरने पर बैठ गए। उनका कहना था कि यदि आम आदमी या कार्यकर्ता की समस्या लेकर मंत्री को स्वयं धरना देना पड़े तो अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
मंत्री के धरने पर बैठने की सूचना प्रशासन तक पहुंचते ही अधिकारियों में हलचल तेज हो गई। पुलिस और प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंचे और स्थिति को संभालने का प्रयास किया।
अधिकारियों की कार्यशैली पर उठाए सवाल
संजय निषाद ने अधिकारियों पर जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं की शिकायतों को गंभीरता से नहीं लेने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सरकार की मंशा जनता तक योजनाओं और न्याय का लाभ पहुंचाने की है, लेकिन यदि अधिकारी शिकायतों को नजरअंदाज करेंगे तो इसका असर सरकार की छवि पर भी पड़ेगा।
उन्होंने साफ किया कि उनका विरोध सरकार के खिलाफ नहीं बल्कि ऐसे अधिकारियों के खिलाफ है जो जनता की समस्याओं का समय पर समाधान नहीं करते।
संजय निषाद ने कहा कि सरकार जनता की सेवा के लिए है और अधिकारियों को भी उसी भावना से काम करना चाहिए। अगर किसी स्तर पर लापरवाही होती है तो उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा।
लखनऊ में भी जता चुके हैं नाराजगी
यह पहला मौका नहीं है जब संजय निषाद अपनी ही सरकार के दौरान धरने पर बैठे हों। इससे पहले लखनऊ में भी उन्होंने एक मामले को लेकर विरोध दर्ज कराया था।
लखनऊ में हुई घटना के दौरान भी उनकी नाराजगी पुलिस और प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर सामने आई थी। तब भी उन्होंने अधिकारियों पर गंभीर सवाल उठाए थे और कार्रवाई की मांग की थी।
अब गोंडा में धरना देने से यह मुद्दा फिर चर्चा में आ गया है। विपक्ष भी सरकार में शामिल किसी मंत्री के धरने पर बैठने को लेकर सवाल उठा सकता है।
राजनीतिक रूप से देखा जाए तो किसी सत्तारूढ़ गठबंधन के मंत्री का प्रशासन के खिलाफ सार्वजनिक रूप से धरने पर बैठना सामान्य घटना नहीं मानी जाती।
निषाद पार्टी के कार्यकर्ताओं का भी जमावड़ा
मंत्री के धरने की जानकारी मिलते ही निषाद पार्टी के कार्यकर्ता भी वहां जुटने लगे। कार्यकर्ताओं ने अपने नेता का समर्थन किया और स्थानीय प्रशासन के खिलाफ नाराजगी जाहिर की।
संजय निषाद ने कार्यकर्ताओं से शांति बनाए रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि आंदोलन का उद्देश्य किसी तरह का टकराव पैदा करना नहीं बल्कि संबंधित अधिकारियों तक जनता की समस्या पहुंचाना और उसका समाधान कराना है।
इस दौरान पार्टी नेताओं ने भी आरोप लगाया कि कई बार शिकायत देने के बावजूद स्थानीय स्तर पर उचित सुनवाई नहीं होती। इससे लोगों में नाराजगी बढ़ती है।
प्रशासन ने दिया कार्रवाई का भरोसा
धरने की सूचना के बाद मौके पर पहुंचे अधिकारियों ने संजय निषाद से बातचीत की। उन्होंने मंत्री की ओर से उठाई गई शिकायतों की जांच कराने और उचित कार्रवाई का भरोसा दिलाया।
अधिकारियों ने संबंधित मामलों की जानकारी लेकर आगे की कार्रवाई करने की बात कही। प्रशासन की ओर से आश्वासन मिलने के बाद स्थिति सामान्य करने की कोशिश की गई।
हालांकि संजय निषाद ने स्पष्ट किया कि केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं है। शिकायतों पर वास्तविक कार्रवाई होनी चाहिए और दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों या कर्मचारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
मंत्री का धरना क्यों बन गया बड़ा राजनीतिक मुद्दा?
संजय निषाद उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री होने के साथ निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। उनकी पार्टी भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा है। ऐसे में अपनी ही गठबंधन सरकार के दौरान प्रशासन के खिलाफ उनका धरना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
एक मंत्री के पास सरकार के भीतर अपनी शिकायत रखने और संबंधित विभागों से बातचीत करने के कई विकल्प होते हैं। इसके बावजूद सार्वजनिक रूप से धरने पर बैठना यह संकेत देता है कि मामला उनके लिए गंभीर था और वह तत्काल कार्रवाई चाहते थे।
यही वजह है कि गोंडा की यह घटना राजनीतिक चर्चा का विषय बन गई।
भाजपा के लिए महत्वपूर्ण सहयोगी है निषाद पार्टी
उत्तर प्रदेश की राजनीति में निषाद समुदाय का महत्वपूर्ण प्रभाव माना जाता है। पूर्वांचल समेत प्रदेश की कई विधानसभा और लोकसभा सीटों पर निषाद, मल्लाह, केवट और संबंधित समुदायों के मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
इसी सामाजिक आधार के कारण निषाद पार्टी भाजपा के लिए महत्वपूर्ण सहयोगी रही है। संजय निषाद लगातार अपने समाज से जुड़े मुद्दों को उठाते रहे हैं।
वे आरक्षण समेत निषाद समुदाय की विभिन्न मांगों को लेकर भी मुखर रहे हैं। गठबंधन में रहते हुए भी कई अवसरों पर उन्होंने अपनी पार्टी और समुदाय से जुड़े मुद्दों पर अलग रुख दिखाया है।
क्या गठबंधन में बढ़ेगी खटास?
गोंडा में हुए धरने के बाद सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यह है कि क्या इसका असर भाजपा और निषाद पार्टी के संबंधों पर पड़ेगा। फिलहाल संजय निषाद ने सरकार के खिलाफ सीधे तौर पर कोई मोर्चा नहीं खोला है। उनकी नाराजगी मुख्य रूप से अधिकारियों की कार्यशैली को लेकर सामने आई है।
ऐसे में इसे तत्काल गठबंधन में टकराव के तौर पर देखना जल्दबाजी होगी। हालांकि विपक्ष इस घटनाक्रम को कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक व्यवस्था से जोड़कर सरकार को घेर सकता है।
आने वाले दिनों में भाजपा नेतृत्व या राज्य सरकार की प्रतिक्रिया से यह स्पष्ट होगा कि इस मामले को किस स्तर पर लिया जाता है।
पहले भी अफसरों को लेकर नाराज रहे हैं जनप्रतिनिधि
उत्तर प्रदेश में समय-समय पर सत्तारूढ़ दल और सहयोगी दलों के जनप्रतिनिधियों की अधिकारियों से नाराजगी सामने आती रही है। विधायकों और सांसदों द्वारा अधिकारियों पर फोन नहीं उठाने, शिकायतों पर कार्रवाई नहीं करने या जनप्रतिनिधियों को पर्याप्त महत्व नहीं देने जैसे आरोप लगाए जाते रहे हैं।
संजय निषाद का धरना इसी व्यापक बहस को फिर सामने ले आया है कि सरकार और प्रशासन के बीच समन्वय किस स्तर पर है।
जनप्रतिनिधियों का कहना रहता है कि जनता उन्हें अपनी समस्या बताती है और इसलिए प्रशासन को उनकी शिकायतों को प्राथमिकता से सुनना चाहिए। दूसरी ओर प्रशासनिक अधिकारियों को कानून और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार काम करना होता है।
विपक्ष को मिला हमला करने का मौका
सरकार के मंत्री का धरने पर बैठना विपक्ष के लिए राजनीतिक मुद्दा बन सकता है। विपक्ष यह सवाल उठा सकता है कि जब सरकार में शामिल मंत्री को अपनी बात मनवाने के लिए धरना देना पड़ रहा है तो आम नागरिकों की शिकायतों का क्या हाल होगा।
वहीं सत्तापक्ष की ओर से इसे सरकार के भीतर लोकतांत्रिक तरीके से जनता की समस्या उठाने के रूप में पेश किया जा सकता है।
राजनीतिक बयानबाजी के बीच वास्तविक सवाल उन शिकायतों के समाधान का है जिनकी वजह से मंत्री को धरने पर बैठना पड़ा।
आगे की कार्रवाई पर टिकी नजर
अब सबसे ज्यादा नजर प्रशासन की आगे की कार्रवाई पर है। अधिकारियों की ओर से दिए गए आश्वासन के बाद संबंधित मामलों में क्या कदम उठाए जाते हैं, यह महत्वपूर्ण होगा।
अगर संजय निषाद की मांगों पर जल्द कार्रवाई होती है तो मामला शांत हो सकता है। लेकिन यदि कार्रवाई में देरी हुई तो निषाद पार्टी इस मुद्दे को और बड़े स्तर पर उठा सकती है।
लखनऊ के बाद गोंडा में संजय निषाद का धरना यह भी दिखाता है कि वह अपने समर्थकों और पार्टी कार्यकर्ताओं से जुड़े मामलों में सार्वजनिक रूप से विरोध जताने से पीछे नहीं हट रहे हैं।
कुल मिलाकर अपनी ही गठबंधन सरकार में मंत्री संजय निषाद का गोंडा में धरने पर बैठना उत्तर प्रदेश की राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है। उन्होंने सरकार के बजाय अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए जनता और कार्यकर्ताओं की शिकायतों पर कार्रवाई की मांग की है। प्रशासन ने समाधान का भरोसा दिया है, लेकिन अब नजर इस बात पर रहेगी कि आश्वासन के बाद जमीन पर क्या कार्रवाई होती है।
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