लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में रंगों की सियासत एक बार फिर चर्चा में आ गई है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव की नीली टी-शर्ट को लेकर बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इसे दलित और बहुजन समाज को भ्रमित करने की कोशिश से जोड़ते हुए समाजवादी पार्टी पर निशाना साधा। इसके साथ ही मायावती ने कांग्रेस को भी नहीं बख्शा और बसपा के नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करने वालों को चेतावनी दी।
मायावती का यह बयान ऐसे समय सामने आया है जब उत्तर प्रदेश में आगामी चुनावों को देखते हुए दलित वोट बैंक को लेकर राजनीतिक दलों की सक्रियता लगातार बढ़ रही है। समाजवादी पार्टी अपने पारंपरिक लाल रंग के साथ पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक रणनीति पर जोर दे रही है। वहीं कांग्रेस भी दलित समुदाय के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
ऐसे में बसपा प्रमुख ने साफ संकेत दिया है कि वह दलित राजनीति के अपने परंपरागत आधार पर किसी दूसरे दल की दावेदारी को आसानी से स्वीकार करने वाली नहीं हैं।
अखिलेश की नीली टी-शर्ट क्यों बनी मुद्दा?
सपा प्रमुख अखिलेश यादव हाल में नीले रंग की टी-शर्ट पहने नजर आए। सामान्य तौर पर समाजवादी पार्टी की पहचान लाल रंग से जुड़ी रही है, जबकि उत्तर प्रदेश की राजनीति में नीला रंग लंबे समय से बसपा और आंबेडकरवादी आंदोलन की राजनीतिक पहचान माना जाता है।
इसी वजह से अखिलेश के नीली टी-शर्ट पहनने को राजनीतिक संदेश के तौर पर भी देखा जाने लगा। राजनीतिक गलियारों में इसे सपा की पीडीए रणनीति और दलित मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश से जोड़कर देखा गया।
मायावती ने इसी पर आपत्ति जताते हुए अपने समर्थकों को ऐसे प्रतीकों से सतर्क रहने का संदेश दिया। उनका कहना है कि केवल रंग या प्रतीक अपनाने से किसी दल की दलित और बहुजन समाज के प्रति नीति नहीं बदल जाती।
मायावती ने सपा को घेरा
बसपा प्रमुख लंबे समय से समाजवादी पार्टी पर दलित विरोधी राजनीति करने का आरोप लगाती रही हैं। अखिलेश यादव की नीली टी-शर्ट को लेकर भी उन्होंने इसी राजनीतिक लाइन को आगे बढ़ाया।
मायावती ने अपने समर्थकों को याद दिलाने की कोशिश की कि बसपा ने दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों और अन्य वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए लंबे समय तक संघर्ष किया है। उनके मुताबिक चुनाव नजदीक आने पर दूसरे दल बहुजन समाज से जुड़े प्रतीकों का इस्तेमाल करके वोट हासिल करने की कोशिश करते हैं।
बसपा प्रमुख का संदेश साफ है कि उनके समर्थक किसी दल के कपड़ों के रंग या नारों के आधार पर अपना राजनीतिक फैसला न करें बल्कि उसके पुराने रिकॉर्ड और नीतियों को देखें।
कांग्रेस को भी सुनाई खरी-खरी
मायावती का हमला केवल समाजवादी पार्टी तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने कांग्रेस को भी निशाने पर लिया। बसपा के पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं को कांग्रेस में शामिल कराने की कोशिशों को लेकर उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया दी।
बसपा प्रमुख का आरोप रहा है कि कांग्रेस दलितों की हितैषी होने का दावा करती है, लेकिन सत्ता में रहने के दौरान उसने बहुजन समाज के हितों के लिए पर्याप्त काम नहीं किया। उन्होंने कांग्रेस पर बसपा को कमजोर करने के लिए उसके नेताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करने का आरोप भी लगाया।
मायावती ने पार्टी कार्यकर्ताओं को संगठन के प्रति निष्ठा बनाए रखने का संदेश दिया और कहा कि राजनीतिक विरोधी बसपा के कैडर को तोड़ने की कोशिश कर सकते हैं।
दलित वोटों पर बढ़ी सियासी जंग
उत्तर प्रदेश में दलित मतदाता चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। राज्य में अनुसूचित जाति की आबादी करीब 21 प्रतिशत है। कई लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों में दलित मतदाता किसी भी उम्मीदवार की जीत या हार तय करने की स्थिति में होते हैं।
लंबे समय तक दलित वोटों के बड़े हिस्से पर बसपा की मजबूत पकड़ रही। मायावती इसी सामाजिक आधार के सहारे उत्तर प्रदेश में चार बार मुख्यमंत्री बनीं।
लेकिन पिछले कुछ चुनावों में बसपा का चुनावी प्रदर्शन कमजोर हुआ है। इसके बाद सपा, कांग्रेस और भाजपा समेत कई दलों ने दलित मतदाताओं के बीच अपना आधार बढ़ाने की कोशिश तेज की है।
अखिलेश की PDA रणनीति
अखिलेश यादव पिछले कुछ वर्षों से पीडीए की रणनीति पर जोर दे रहे हैं। पीडीए का अर्थ पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक है। सपा का प्रयास इन तीन बड़े सामाजिक समूहों को एक राजनीतिक मंच पर लाने का है।
लोकसभा चुनाव में भी समाजवादी पार्टी ने टिकट वितरण में पीडीए के प्रतिनिधित्व पर विशेष जोर दिया था। पार्टी का मानना है कि सामाजिक न्याय की राजनीति के जरिए वह अपने पारंपरिक यादव-मुस्लिम आधार से आगे बढ़ सकती है।
यही रणनीति बसपा के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकती है, क्योंकि इसमें दलित मतदाताओं को सीधे तौर पर शामिल किया गया है।
अखिलेश यादव के नीले रंग के कपड़ों को भी इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है, हालांकि किसी नेता की पोशाक के आधार पर उसके राजनीतिक उद्देश्य का निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
कांग्रेस भी दलित वोटों पर लगा रही जोर
कांग्रेस ने भी हाल के वर्षों में संविधान, आरक्षण और सामाजिक न्याय को अपनी राजनीति के प्रमुख मुद्दों में शामिल किया है। पार्टी के शीर्ष नेता लगातार संविधान की रक्षा और सामाजिक प्रतिनिधित्व की बात कर रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस संगठन को मजबूत करने के लिए दूसरे दलों से आने वाले नेताओं को भी जगह दे रही है। बसपा के कुछ पूर्व नेताओं के कांग्रेस की ओर जाने से मायावती की नाराजगी बढ़ना स्वाभाविक माना जा रहा है।
बसपा नेतृत्व को आशंका है कि पुराने नेताओं के दूसरे दलों में जाने से स्थानीय स्तर पर संगठन प्रभावित हो सकता है। यही कारण है कि मायावती कार्यकर्ताओं को लगातार संगठन के साथ बने रहने का संदेश दे रही हैं।
नीला रंग क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
भारतीय दलित राजनीति में नीला रंग डॉ. भीमराव आंबेडकर और आंबेडकरवादी आंदोलनों से गहराई से जुड़ा है। बसपा ने भी अपनी राजनीतिक पहचान में नीले रंग को प्रमुख स्थान दिया है। पार्टी के झंडे और चुनावी कार्यक्रमों में नीला रंग स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
समाजवादी पार्टी की पहचान लाल और हरे रंग से रही है। ऐसे में अखिलेश यादव का नीली टी-शर्ट में सामने आना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक चर्चा का कारण बन गया।
हालांकि राजनीति में रंगों का इस्तेमाल किसी एक पार्टी तक कानूनी रूप से सीमित नहीं होता। कोई भी नेता किसी भी रंग के कपड़े पहन सकता है। लेकिन उत्तर प्रदेश जैसी प्रतीक-प्रधान राजनीति में रंगों के राजनीतिक अर्थ निकाले जाना सामान्य बात है।
बसपा की रणनीति में बदलाव के संकेत?
मायावती पिछले कुछ समय से पार्टी संगठन को फिर मजबूत करने पर जोर दे रही हैं। चुनावी प्रदर्शन में गिरावट के बाद बसपा के सामने अपने पुराने वोट बैंक को वापस एकजुट करने की चुनौती है।
इसके लिए पार्टी एक बार फिर अपने मूल बहुजन एजेंडे और कैडर आधारित राजनीति को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। मायावती के हालिया बयान भी इसी रणनीति का हिस्सा माने जा सकते हैं।
वह अपने समर्थकों को यह संदेश देना चाहती हैं कि सपा और कांग्रेस की दलित राजनीति बसपा का विकल्प नहीं है।
सपा-बसपा का पुराना राजनीतिक टकराव
समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के रिश्ते उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से उतार-चढ़ाव वाले रहे हैं। दोनों पार्टियां कभी एक-दूसरे की सबसे बड़ी राजनीतिक विरोधी रही हैं तो कभी चुनावी गठबंधन भी कर चुकी हैं।
2019 के लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा ने भाजपा के खिलाफ गठबंधन किया था। चुनाव के बाद यह गठबंधन टूट गया और दोनों दलों के बीच फिर आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए।
अब अखिलेश यादव की पीडीए रणनीति के बाद दोनों दलों के बीच दलित वोटों को लेकर प्रतिस्पर्धा और बढ़ गई है।
2027 की तैयारी में जुटे राजनीतिक दल
उत्तर प्रदेश में अगला विधानसभा चुनाव 2027 में होना है। चुनाव में अभी समय है लेकिन सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने सामाजिक समीकरण मजबूत करने की तैयारी शुरू कर दी है।
भाजपा अपने गैर-यादव पिछड़ा और गैर-जाटव दलित आधार को मजबूत रखने की कोशिश करेगी। समाजवादी पार्टी पीडीए के जरिए व्यापक सामाजिक गठजोड़ बनाने में लगी है। कांग्रेस संविधान और सामाजिक न्याय के मुद्दों के जरिए अपनी जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही है।
वहीं बसपा के सामने अपने पारंपरिक दलित आधार को एकजुट रखने के साथ दूसरे सामाजिक वर्गों को फिर अपने साथ जोड़ने की चुनौती है।
इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में अखिलेश यादव की नीली टी-शर्ट पर मायावती की नाराजगी को देखा जा रहा है। मामला केवल कपड़े के रंग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे उत्तर प्रदेश के दलित वोट बैंक को लेकर चल रही बड़ी राजनीतिक लड़ाई दिखाई देती है।
मायावती ने सपा के साथ कांग्रेस को भी निशाने पर लेकर साफ कर दिया है कि बसपा अपने नेताओं, कार्यकर्ताओं और पारंपरिक समर्थकों को दूसरे दलों की ओर जाने से रोकने के लिए आक्रामक रणनीति अपनाने वाली है। आने वाले दिनों में 2027 विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ यह सियासी मुकाबला और तेज होने की संभावना है।