लखनऊ। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। चवन्नी, दो कौड़ी और मंदबुद्धि जैसे शब्दों के इस्तेमाल ने दोनों दलों के नेताओं को आमने-सामने ला दिया है। विवाद में जातीय पहचान और राजनीतिक सम्मान का सवाल जुड़ने के बाद मामला केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा। सहारनपुर से लेकर गौतमबुद्ध नगर तक राजनीतिक माहौल गरमा गया है और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत एक बार फिर जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई दे रही है।

विवाद की शुरुआत “चवन्नी” शब्द को लेकर हुई। रालोद नेताओं ने इसे अपने राजनीतिक नेतृत्व और समर्थकों के सम्मान से जोड़ते हुए समाजवादी पार्टी पर हमला बोला। रालोद इस मुद्दे पर सपा को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि किसी दल या उसके नेतृत्व को कमतर बताने वाली भाषा स्वीकार नहीं की जा सकती। रालोद समर्थकों ने भी इस टिप्पणी को राजनीतिक अपमान के रूप में लिया और सोशल मीडिया से लेकर सार्वजनिक मंचों तक तीखी प्रतिक्रियाएं दीं।

इसके जवाब में “दो कौड़ी” और “मंदबुद्धि” जैसे शब्द सामने आने के बाद विवाद और बढ़ गया। समाजवादी पार्टी ने भी रक्षात्मक रुख अपनाने के बजाय मोर्चा खोल दिया। दोनों दलों के नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप की भाषा लगातार तल्ख होती जा रही है। राजनीतिक मुद्दों पर शुरू हुआ विवाद अब नेताओं की योग्यता, राजनीतिक हैसियत और सामाजिक आधार तक पहुंच गया है। इससे दोनों दलों के बीच पहले से मौजूद राजनीतिक दूरी और अधिक स्पष्ट हो गई है।

सपा और रालोद कभी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक साथ चुनावी मैदान में उतर चुके हैं। दोनों दलों का गठबंधन क्षेत्र के जातीय और सामाजिक समीकरणों को साधने की रणनीति पर आधारित था। समाजवादी पार्टी अपने यादव और मुस्लिम मतदाता आधार के साथ अन्य पिछड़ा वर्ग तथा दलित समुदायों तक पहुंच बढ़ाना चाहती थी। वहीं रालोद की राजनीति का मुख्य आधार जाट और किसान मतदाता माने जाते रहे हैं। दोनों दलों के साथ आने से भाजपा के सामने एक मजबूत चुनौती खड़ी करने की कोशिश की गई थी।

हालांकि राजनीतिक परिस्थितियां बदलने के बाद रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी ने भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन का रुख कर लिया। इसके बाद सपा और रालोद के बीच राजनीतिक संबंधों में खटास बढ़ती चली गई। अब ताजा जुबानी विवाद ने दोनों दलों के बीच मौजूद तनाव को सार्वजनिक रूप से सामने ला दिया है। नेताओं के बयान बताते हैं कि दोनों पार्टियां पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपने-अपने प्रभाव और समर्थक वर्ग को मजबूत करने के लिए एक-दूसरे पर हमला करने से पीछे नहीं हटेंगी।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से महत्वपूर्ण रहे हैं। जाट, मुस्लिम, गुर्जर, दलित, त्यागी और अन्य पिछड़े वर्गों की भूमिका कई सीटों पर चुनावी नतीजे तय करती है। यही वजह है कि राजनीतिक दलों के नेता किसी भी बयान को सीधे मतदाता समुदाय के सम्मान से जोड़ने का प्रयास करते हैं। “चवन्नी” जैसे शब्द को रालोद ने केवल राजनीतिक कटाक्ष न मानकर अपने समर्थक वर्ग की अस्मिता से जोड़ दिया है। दूसरी तरफ सपा भी “दो कौड़ी” और “मंदबुद्धि” जैसे शब्दों के जरिए विरोधियों के हमलों का जवाब दे रही है।

इस जुबानी जंग का असर सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत, मेरठ, बिजनौर, गाजियाबाद और गौतमबुद्ध नगर सहित पूरे पश्चिमी क्षेत्र में देखा जा रहा है। दोनों दलों के स्थानीय पदाधिकारी अपने-अपने नेतृत्व के समर्थन में बयान दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर समर्थकों के बीच तीखी बहस चल रही है। राजनीतिक बयान तेजी से जातीय संदर्भ ले रहे हैं जिससे आने वाले समय में क्षेत्र की राजनीति और अधिक गरमाने की आशंका है।

सपा के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाता बेहद महत्वपूर्ण हैं। पार्टी रालोद से अलग होने के बाद जाटों, गुर्जरों और अन्य किसान समुदायों के बीच भी अपनी पकड़ बढ़ाने का प्रयास कर रही है। वहीं रालोद भाजपा के साथ रहते हुए अपने पारंपरिक जाट और किसान मतदाता आधार को बनाए रखने के साथ नए वर्गों तक पहुंचना चाहती है। दोनों दलों के बीच बयानबाजी के पीछे राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र की लड़ाई भी दिखाई दे रही है।

इस पूरे घटनाक्रम पर भाजपा ने अब तक आक्रामक प्रतिक्रिया देने के बजाय मौन साध रखा है। राजनीतिक जानकार इसे भाजपा की रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं। रालोद वर्तमान में भाजपा की सहयोगी है और जयंत चौधरी के साथ गठबंधन के जरिए भाजपा ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट और किसान मतदाताओं तक अपनी पहुंच मजबूत करने का प्रयास किया है। ऐसे में सपा और रालोद की तकरार भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से फायदेमंद साबित हो सकती है।

भाजपा को उम्मीद हो सकती है कि विपक्षी खेमे की पुरानी साझेदारी टूटने के बाद मतदाताओं के बीच सपा और रालोद का टकराव और गहरा होगा। इससे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विपक्षी वोटों का ध्रुवीकरण रोकने और अपने गठबंधन को मजबूत बनाने में उसे मदद मिल सकती है। भाजपा नेता खुलकर विवाद में उतरने के बजाय दोनों दलों की बयानबाजी को देखते हुए राजनीतिक लाभ का आकलन कर रहे हैं।

हालांकि रालोद के लिए यह लड़ाई आसान नहीं है। भाजपा के साथ गठबंधन के बाद उसे अपने पारंपरिक समर्थकों को यह भरोसा दिलाना है कि पार्टी की राजनीतिक पहचान और किसानों के मुद्दों पर उसका रुख कमजोर नहीं हुआ है। इसलिए रालोद नेतृत्व सपा के प्रत्येक हमले का कड़ा जवाब देकर अपने समर्थकों को मजबूती का संदेश देने की कोशिश कर रहा है। दूसरी ओर सपा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खुद को भाजपा के प्रमुख विरोधी के रूप में स्थापित करना चाहती है।

राजनीतिक भाषा का लगातार गिरता स्तर दोनों दलों के लिए नुकसानदायक भी हो सकता है। आम मतदाता रोजगार, महंगाई, किसान समस्याओं, गन्ना भुगतान, कानून-व्यवस्था और विकास जैसे मुद्दों पर चर्चा की उम्मीद करता है। इसके विपरीत नेताओं के बीच चवन्नी, दो कौड़ी और मंदबुद्धि जैसे शब्दों की लड़ाई से वास्तविक जनसमस्याएं पीछे छूटती दिखाई दे रही हैं।

फिलहाल सपा और रालोद के बीच शुरू हुई यह जुबानी जंग जल्द थमती नजर नहीं आ रही है। दोनों दल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपने सामाजिक आधार और राजनीतिक सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं। इस टकराव में जातीय समीकरण फिर केंद्र में आ गए हैं जबकि भाजपा बिना सीधे विवाद में उतरे अपने लिए संभावित राजनीतिक लाभ देख रही है। आने वाले चुनावों में यह बयानबाजी वोटों के समीकरण पर कितना असर डालेगी इसका फैसला पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मतदाता करेगा।

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