Karnataka कर्नाटक: कलबुर्गी जिले में रोजगार की तलाश में हर दिन बड़ी संख्या में ग्रामीण मजदूर शहर का रुख कर रहे हैं। सुबह सूरज निकलने से पहले ही गांवों से निकलने वाले ये मजदूर अपनी रोजी-रोटी की तलाश में शहर पहुंचते हैं, जहां उन्हें घंटों खड़े होकर काम मिलने का इंतजार करना पड़ता है। लेकिन हाल के दिनों में मजदूरों की बढ़ती संख्या ने उनके सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है।

लक्ष्मी भी उन्हीं मजदूरों में शामिल हैं, जो हर दिन सुबह करीब 6 बजे अपने घर से निकलती हैं। वह आसपास के गांवों के लगभग 40 अन्य ग्रामीणों के साथ कलबुर्गी शहर की ओर रवाना होती हैं। करीब दो घंटे के सफर के बाद यह समूह शहर की उन जगहों पर पहुंचता है, जहां रोजाना दिहाड़ी मजदूर काम मिलने की उम्मीद में इकट्ठा होते हैं।

इन जगहों पर सुबह से ही बड़ी संख्या में मजदूर जमा हो जाते हैं। कोई निर्माण कार्य के लिए मजदूर तलाशने वाले ठेकेदारों का इंतजार करता है, तो कोई घरों या अन्य छोटे-मोटे कामों की उम्मीद लगाए रहता है। लेकिन हर दिन सभी को काम मिल जाए, यह जरूरी नहीं है।

मजदूरों का कहना है कि पिछले एक महीने में काम की तलाश में आने वाले लोगों की संख्या में लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है। भीड़ बढ़ने के कारण अब पहले की तुलना में अधिक लोग खाली हाथ लौटने को मजबूर हो रहे हैं।

ग्रामीण मजदूरों के अनुसार, गांवों में पर्याप्त रोजगार के अवसर नहीं मिलने के कारण उन्हें शहरों का रुख करना पड़ रहा है। खेती पर निर्भर परिवारों को कई बार मौसम, फसल की स्थिति और सीमित आय के कारण अतिरिक्त कमाई की जरूरत होती है। ऐसे में दिहाड़ी मजदूरी उनके लिए आय का महत्वपूर्ण साधन बन जाती है।

लक्ष्मी जैसी कई महिला मजदूर भी अब शहरों में काम तलाशने पहुंच रही हैं। वे निर्माण कार्य, घरेलू काम, सफाई, सामान ढोने और अन्य अस्थायी रोजगार के जरिए परिवार की आर्थिक मदद करती हैं। हालांकि काम की अनिश्चितता उनके लिए सबसे बड़ी चिंता बनी हुई है।

मजदूरों का कहना है कि पहले सुबह आने पर काम मिलने की संभावना अधिक रहती थी, लेकिन अब मजदूरों की संख्या बढ़ने से प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है। कई बार ठेकेदार सीमित संख्या में ही लोगों को काम पर ले जाते हैं, जबकि बाकी मजदूरों को निराश होकर वापस लौटना पड़ता है।

एक मजदूर ने बताया कि कई बार पूरा दिन इंतजार करने के बाद भी काम नहीं मिलता। ऐसी स्थिति में आने-जाने का खर्च और समय दोनों बर्बाद हो जाते हैं। इसके बावजूद वे अगले दिन फिर रोजगार की उम्मीद में शहर पहुंचते हैं, क्योंकि परिवार का खर्च चलाने के लिए कमाई जरूरी है।

स्थानीय मजदूरों के अनुसार, कलबुर्गी में निर्माण गतिविधियां और छोटे-बड़े कामों की जरूरत तो बनी हुई है, लेकिन मजदूरों की संख्या के मुकाबले रोजगार के अवसर पर्याप्त नहीं हैं। इसी वजह से सुबह-सुबह शहर के कई इलाकों में दिहाड़ी मजदूरों की लंबी कतारें दिखाई देने लगी हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्थायी रोजगार के अवसर बढ़ाने की जरूरत है, ताकि लोगों को मजबूरी में रोजाना लंबी दूरी तय कर शहरों में काम तलाशने न आना पड़े। ग्रामीण रोजगार योजनाओं को प्रभावी तरीके से लागू करने और स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर तैयार करने से इस समस्या को कम किया जा सकता है।

कलबुर्गी जैसे शहरों में बढ़ती मजदूरों की भीड़ केवल रोजगार की समस्या नहीं दिखाती, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की चुनौतियों को भी सामने लाती है। जब गांवों में आय के साधन सीमित होते हैं, तो लोग बेहतर कमाई की उम्मीद में शहरों की ओर पलायन करते हैं।

मजदूरों का कहना है कि वे किसी तरह अपना और अपने परिवार का जीवन चलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनके लिए हर सुबह एक नई उम्मीद लेकर आती है कि शायद आज काम मिल जाएगा और घर खाली हाथ नहीं लौटना पड़ेगा।

लेकिन बढ़ती भीड़ और सीमित अवसरों के कारण यह उम्मीद हर दिन पूरी नहीं हो पाती। अब मजदूरों को इंतजार है कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ें, ताकि उन्हें रोजाना लंबा सफर तय कर शहर में काम की तलाश न करनी पड़े।

फिलहाल कलबुर्गी की सड़कों और चौराहों पर सुबह जुटने वाली मजदूरों की भीड़ इस बात का संकेत है कि रोजगार की तलाश में ग्रामीण इलाकों से शहरों की ओर पलायन लगातार जारी है। सरकार और प्रशासन के लिए यह चुनौती है कि इन मजदूरों को स्थायी और सम्मानजनक रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाएं।

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