इस कपड़ा दुकान में संस्कृत में होता है कारोबार, मुस्लिम कर्मचारी भी बोलते हैं प्राचीन भाषा
विजयपुरा। शहर के व्यस्त मीनाक्षी चौक इलाके में स्थित ‘आर गारमेंट्स’ नामक कपड़ों की दुकान अपने उत्पादों से अधिक ग्राहकों से बातचीत के अनोखे तरीके के कारण चर्चा में है। इस दुकान में मालिक, उनके परिवार के सदस्य और कर्मचारी दैनिक कामकाज के दौरान संस्कृत भाषा का इस्तेमाल करते हैं। दुकान में प्रवेश करने वाले ग्राहकों का स्वागत संस्कृत में किया जाता है और कपड़ों की कीमत, रंग, आकार तथा पसंद से संबंधित सामान्य बातचीत भी इसी प्राचीन भाषा में होती है।
इस पहल की खास बात यह है कि दुकान में काम करने वाले मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के कर्मचारी भी संस्कृत में ग्राहकों से संवाद करते हैं। अलग-अलग धार्मिक और सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले कर्मचारियों का एक भाषा के माध्यम से जुड़ना इस प्रतिष्ठान को विशेष पहचान देता है। आमतौर पर धार्मिक ग्रंथों, विद्यालयों या विशेष समारोहों तक सीमित मानी जाने वाली संस्कृत यहां रोजमर्रा के व्यावसायिक व्यवहार का हिस्सा बन चुकी है।
आर गारमेंट्स के मालिक रामसिंह राजाराम राजपूत लगभग चार दशकों से विजयपुरा के कपड़ा कारोबार से जुड़े हुए हैं। लंबे समय से कपड़ा उद्योग में सक्रिय रामसिंह की संस्कृत भाषा में विशेष रुचि रही है। उन्होंने इस भाषा को केवल पढ़ने या धार्मिक अवसरों पर इस्तेमाल करने के बजाय सामान्य बातचीत में अपनाने का फैसला किया। शुरुआत में उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों के साथ संस्कृत में संवाद करने का अभ्यास किया।
रामसिंह की इस रुचि और संस्कृत को बढ़ावा देने की कोशिश को उनके परिवार का समर्थन मिला। परिवार के सदस्यों ने भी भाषा को सीखना और बोलना शुरू किया। नियमित अभ्यास से संस्कृत उनके पारिवारिक संवाद का हिस्सा बन गई। धीरे-धीरे परिवार ने इसे अपने कारोबार से जोड़ने का विचार किया। इसके बाद दुकान में ग्राहकों से होने वाली सामान्य बातचीत में संस्कृत शब्दों और वाक्यों का उपयोग शुरू किया गया।
शुरुआत में संस्कृत बोलकर कारोबार करना परिवार और कर्मचारियों के लिए आसान नहीं था। कपड़ा दुकान में ग्राहकों से रंग, नाप, कीमत, पसंद और भुगतान सहित कई विषयों पर बातचीत करनी पड़ती है। इसके लिए रोजमर्रा के उपयोग वाले संस्कृत शब्दों और छोटे वाक्यों को सीखा गया। लगातार अभ्यास के कारण परिवार और कर्मचारियों की झिझक दूर होती गई। अब वे सामान्य व्यावसायिक संवाद संस्कृत में सहजता से कर लेते हैं।
दुकान में आने वाले कई ग्राहकों के लिए यह अनुभव नया होता है। व्यस्त बाजार में सामान्य दुकानों के बीच संस्कृत में स्वागत सुनकर वे हैरान रह जाते हैं। कुछ ग्राहक उत्सुकता के साथ भाषा के बारे में सवाल करते हैं तो कुछ संस्कृत के आसान शब्द सीखने का प्रयास भी करते हैं। जो ग्राहक संस्कृत नहीं समझते, उन्हें कर्मचारी सरल तरीके से बात समझा देते हैं। दुकान का उद्देश्य ग्राहकों पर कोई भाषा थोपना नहीं, बल्कि संस्कृत के प्रति रुचि पैदा करना है।
आर गारमेंट्स में संस्कृत के इस्तेमाल ने इसके कारोबार को शहर में अलग पहचान दी है। यहां भाषा केवल प्रचार का माध्यम नहीं है, बल्कि दुकान की दैनिक कार्यसंस्कृति में शामिल है। मालिक से लेकर कर्मचारियों तक सभी लोग इसे व्यवहार में लाने का प्रयास करते हैं। ग्राहकों के साथ बातचीत के अलावा परिवार और कर्मचारियों के बीच होने वाले सामान्य संवाद में भी संस्कृत का प्रयोग किया जाता है।
दुकान में विभिन्न समुदायों के कर्मचारियों द्वारा संस्कृत बोलना सामाजिक सद्भाव का संदेश भी दे रहा है। मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों से जुड़े कर्मचारी भाषा को किसी एक धर्म या समुदाय तक सीमित न मानकर भारतीय भाषायी विरासत के रूप में देखते हैं। उन्होंने काम के साथ संस्कृत के सामान्य वाक्य सीखे और अब उनका इस्तेमाल ग्राहकों से बातचीत में कर रहे हैं। इससे यह पहल भाषा के साथ सामाजिक जुड़ाव का उदाहरण बन गई है।
रामसिंह का मानना है कि किसी भाषा को जीवित रखने का सबसे प्रभावी तरीका उसका दैनिक व्यवहार में प्रयोग करना है। केवल किताबों में पढ़ने से भाषा का प्रसार सीमित रह सकता है, लेकिन जब उसका उपयोग बाजार, घर और कार्यस्थल पर किया जाता है तो लोग उससे स्वाभाविक रूप से जुड़ने लगते हैं। इसी सोच के तहत उन्होंने अपनी दुकान को संस्कृत संवाद का माध्यम बनाया।
संस्कृत को प्राचीन और कठिन भाषा मानने वाले लोगों के लिए यह दुकान एक अलग तस्वीर प्रस्तुत करती है। यहां छोटे और सरल वाक्यों के जरिए बताया जा रहा है कि नियमित अभ्यास से इस भाषा को रोजमर्रा की बातचीत में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। खरीदारी जैसे सामान्य काम में संस्कृत सुनने से ग्राहकों के बीच भाषा के प्रति उत्सुकता बढ़ती है। इससे विशेष रूप से युवा पीढ़ी को संस्कृत के बारे में जानने की प्रेरणा मिल सकती है।
चार दशकों से कपड़ा उद्योग में काम कर रहे रामसिंह ने परंपरागत कारोबार को भाषायी प्रयोग से जोड़कर एक नया स्वरूप दिया है। बदलते बाजार और आधुनिक व्यावसायिक तरीकों के बीच उन्होंने प्राचीन भाषा के लिए स्थान बनाया। उनके परिवार ने भी इस प्रयास को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। परिवार के समर्थन के बाद कर्मचारियों को भी संस्कृत के सामान्य शब्द और वाक्य सिखाए गए।
दुकान की यह पहल इस बात का उदाहरण है कि भाषा का प्रचार केवल सरकारी कार्यक्रमों, शिक्षण संस्थानों या औपचारिक आयोजनों तक सीमित नहीं होना चाहिए। व्यापारी, परिवार और कर्मचारी भी अपनी दिनचर्या में किसी भाषा को स्थान देकर उसके संरक्षण में योगदान कर सकते हैं। आर गारमेंट्स ने संस्कृत को बाजार के बीच पहुंचाकर उसे व्यावहारिक संवाद की भाषा बनाने का प्रयास किया है।
मीनाक्षी चौक जैसे व्यस्त कारोबारी क्षेत्र में स्थित यह दुकान कपड़ों की बिक्री के साथ भाषायी विविधता और आपसी सद्भाव की कहानी भी प्रस्तुत कर रही है। यहां धर्म और समुदाय से ऊपर उठकर कर्मचारी एक प्राचीन भाषा सीख रहे हैं तथा उसका इस्तेमाल आत्मविश्वास के साथ कर रहे हैं। यही कारण है कि आर गारमेंट्स अब केवल कपड़ों की दुकान नहीं, बल्कि संस्कृत को रोजमर्रा के जीवन से जोड़ने वाली अनोखी पहल के रूप में पहचानी जा रही है।