बेंगलुरु। कर्नाटक में छात्रों की समस्याओं के समाधान और शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए गठित कैबिनेट उप-समिति ने विद्यार्थियों, अभिभावकों और शिक्षण संस्थानों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। समिति को दिए गए प्रमुख कार्यों में निजी शिक्षण संस्थानों और कोचिंग सेंटरों द्वारा ली जाने वाली फीस को नियंत्रित करने के उपाय तलाशना भी शामिल है। निजी संस्थानों की फीस में पारदर्शिता और नियंत्रण की मांग अभिभावक लंबे समय से करते रहे हैं।
राज्य सरकार द्वारा गठित यह पांच सदस्यीय समिति शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों का अध्ययन करेगी। इनमें निजी संस्थानों की फीस, परीक्षा और भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, प्रश्नपत्र लीक रोकने के उपाय, शैक्षणिक संस्थानों में बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता और छात्रों की सुरक्षा जैसे मुद्दे शामिल हैं। समिति अलग-अलग पक्षों से बातचीत कर सरकार को अपनी सिफारिशें सौंपेगी।
निजी स्कूलों, कॉलेजों और कोचिंग संस्थानों की फीस में लगातार होने वाली वृद्धि अभिभावकों के लिए चिंता का विषय रही है। कई परिवारों का कहना है कि ट्यूशन फीस के अतिरिक्त अलग-अलग नाम से कई प्रकार के शुल्क लिए जाते हैं। इससे बच्चों की शिक्षा पर होने वाला कुल खर्च काफी बढ़ जाता है। समिति इन विषयों का अध्ययन करते हुए यह देखेगी कि फीस तय करने की प्रक्रिया को किस तरह अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जा सकता है।
फीस नियंत्रण का अर्थ केवल शुल्क की सीमा निर्धारित करना नहीं होगा। समिति को यह भी विचार करना पड़ सकता है कि शिक्षण संस्थानों की वास्तविक संचालन लागत, शिक्षकों के वेतन, प्रयोगशाला, पुस्तकालय, परिवहन और अन्य सुविधाओं के खर्च में संतुलन कैसे बनाया जाए। अभिभावकों को अनुचित आर्थिक बोझ से बचाने के साथ संस्थानों की शैक्षणिक गुणवत्ता बनाए रखना भी एक महत्वपूर्ण चुनौती होगी।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री यूटी खादर की अध्यक्षता वाली समिति में उच्च शिक्षा मंत्री बसवराज रायरेड्डी, गृह मंत्री प्रियांक खड़गे, चिकित्सा शिक्षा एवं कौशल विकास मंत्री शरण प्रकाश पाटिल और स्कूली शिक्षा मंत्री मधु बंगारप्पा शामिल हैं। समिति को एक महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है। इस पूरी प्रक्रिया की जिम्मेदारी उच्च शिक्षा विभाग को दी गई है। अमर उजाला
समिति छात्रों, अभिभावकों, शिक्षकों, शिक्षण संस्थानों के प्रतिनिधियों और शिक्षा विशेषज्ञों से सुझाव ले सकती है। संबंधित पक्षों से बातचीत के आधार पर तैयार रिपोर्ट सरकार के भविष्य के फैसलों का आधार बन सकती है। इससे उम्मीद जगी है कि शिक्षा व्यवस्था से जुड़े निर्णय केवल प्रशासनिक स्तर पर नहीं, बल्कि प्रभावित लोगों की समस्याओं और सुझावों को ध्यान में रखते हुए लिए जाएंगे।
निजी संस्थानों की फीस के अलावा समिति परीक्षाओं में होने वाली अनियमितताओं और प्रश्नपत्र लीक की घटनाओं को रोकने के उपायों की भी समीक्षा करेगी। परीक्षा और भर्ती प्रक्रिया को अधिक निष्पक्ष, पारदर्शी तथा जवाबदेह बनाने के लिए आवश्यक बदलाव सुझाए जाएंगे। विद्यार्थियों की एक बड़ी मांग परीक्षाओं और भर्तियों का समयबद्ध कैलेंडर तैयार करने की भी रही है। अनिश्चित कार्यक्रम के कारण छात्रों की तैयारी और भविष्य की योजनाएं प्रभावित होती हैं।
सरकारी स्कूलों, प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति भी समिति के कार्यक्षेत्र में शामिल है। कई शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षकों के पद रिक्त रहने, प्रयोगशालाओं और पुस्तकालयों की कमी तथा छात्रावासों में पर्याप्त स्थान न होने जैसी समस्याएं सामने आती रही हैं। समिति इन सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए सरकार को सुझाव देगी।
शिक्षा को रोजगार से जोड़ने के उपायों पर भी ध्यान दिया जाएगा। उद्योगों की बदलती जरूरतों के अनुसार पाठ्यक्रम में सुधार, कौशल विकास, अप्रेंटिसशिप और इंटर्नशिप को प्रोत्साहन देने की संभावनाओं का अध्ययन किया जाएगा। शिक्षण संस्थानों और उद्योगों के बीच बेहतर साझेदारी से विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ व्यावहारिक अनुभव उपलब्ध कराने की कोशिश की जा सकती है।
समिति के सामने छात्रों की मानसिक और शारीरिक सुरक्षा का विषय भी महत्वपूर्ण रहेगा। पढ़ाई और परीक्षाओं के तनाव को कम करने, काउंसलिंग की व्यवस्था मजबूत करने तथा आवश्यकता पड़ने पर विद्यार्थियों को सहायता उपलब्ध कराने के उपायों पर विचार होगा। कोचिंग सेंटरों, छात्रावासों और आवासीय शिक्षण संस्थानों में छात्रों की सुरक्षा के लिए मौजूदा व्यवस्थाओं की समीक्षा भी की जाएगी।
छात्रवृत्ति, आर्थिक सहायता और छात्रावासों में सीटों की उपलब्धता से जुड़े विषय भी समिति के दायरे में हैं। लड़कियों, अनुसूचित जाति-जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक समुदाय और परिवार में पहली बार उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को मिलने वाली सहायता का आकलन किया जाएगा। इसका उद्देश्य उन बाधाओं को पहचानना है, जिनके कारण आर्थिक या सामाजिक रूप से कमजोर विद्यार्थी अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख पाते।
निजी संस्थानों की फीस नियंत्रित करने की व्यवस्था बनाते समय सरकार को कई पक्षों के हितों में संतुलन स्थापित करना होगा। अभिभावकों की मांग है कि फीस वृद्धि का स्पष्ट आधार हो और बिना उचित प्रक्रिया के अतिरिक्त शुल्क न वसूला जाए। दूसरी ओर निजी संस्थान गुणवत्ता, वेतन और बुनियादी ढांचे पर होने वाले खर्च का मुद्दा उठा सकते हैं। ऐसे में समिति की सिफारिशों और बाद में बनने वाले नियमों का व्यावहारिक होना जरूरी होगा।
फिलहाल उप-समिति का गठन शिक्षा सुधार की दिशा में शुरुआती कदम है। फीस में तत्काल कमी या कोई नई सीमा लागू नहीं हुई है। अंतिम निर्णय समिति की रिपोर्ट, संबंधित पक्षों के सुझाव और सरकार की समीक्षा के बाद ही लिया जाएगा। इसके बावजूद फीस नियंत्रण को समिति के प्रमुख कार्यों में शामिल किए जाने से अभिभावकों को उम्मीद है कि उनकी लंबे समय से चली आ रही मांग पर अब ठोस पहल हो सकती है।