भारत के रूसी तेल पर अमेरिकी टैरिफ का साया
ट्रम्प के नए कानून से भारत के सामने बड़ी चुनौती
Washington/New Delhi. वॉशिंगटन/नई दिल्ली। रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ाने वाले अमेरिकी कानून पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 18 सितंबर को हस्ताक्षर कर दिए हैं। व्हाइट हाउस के मुताबिक H.R. 5334 यानी Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 अब कानून बन गया है। यह रूस पर प्रतिबंध और टैरिफ संबंधी अमेरिकी अधिकारों का विस्तार करता है और ईरान पर मौजूदा प्रतिबंधों को भी आगे बढ़ाता है। नए कानून का भारत के लिए सबसे अहम पहलू रूसी ऊर्जा खरीद से जुड़ा है। इसके तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले पांच सबसे बड़े देशों से आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिलता है। भारत और चीन रूसी कच्चे तेल के प्रमुख खरीदारों में शामिल हैं। हालांकि एक अहम बात यह है कि कानून बनने के साथ भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ अपने आप लागू नहीं हुआ है। कानून राष्ट्रपति को ऐसा टैरिफ लगाने का अधिकार देता है और इसकी दर तथा इसे लागू करने का फैसला अमेरिकी प्रशासन करेगा।
अमेरिकी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने इस विधेयक को 262-159 मतों से मंजूरी दी थी। इससे पहले अगस्त में सीनेट ने इसे 86-11 मतों से पारित किया था। इसके बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के साथ विधेयक कानून में बदल गया। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की थी। रियायती कीमतों पर उपलब्ध रूसी तेल भारतीय रिफाइनरियों के लिए महत्वपूर्ण स्रोत बना। नए अमेरिकी कानून के कारण अब भारत के ऊर्जा और व्यापार हितों को लेकर नई अनिश्चितता पैदा हुई है।
यदि अमेरिकी प्रशासन भारत पर इस कानून के तहत अतिरिक्त टैरिफ लगाता है तो उसका वास्तविक असर टैरिफ की दर, किन भारतीय उत्पादों को इसके दायरे में रखा जाता है और इसे कब लागू किया जाता है, इन बातों पर निर्भर करेगा। भारतीय निर्यातकों के लिए भी फिलहाल यही अहम सवाल हैं। व्यापार विशेषज्ञों के मुताबिक ठोस प्रभाव का आकलन अमेरिकी प्रशासन द्वारा वास्तविक टैरिफ दर और उत्पादों का दायरा घोषित किए जाने के बाद ही किया जा सकेगा। दूसरी तरफ रूस से तेल की खरीद कम करने की स्थिति में भारत को पश्चिम एशिया, अफ्रीका, अमेरिका और अन्य आपूर्तिकर्ताओं से अधिक कच्चा तेल लेना पड़ सकता है। इसका लागत पर असर उस समय की वैश्विक कीमतों, माल ढुलाई और वैकल्पिक सप्लाई की उपलब्धता पर निर्भर करेगा। इसलिए अभी यह निश्चित रूप से कहना जल्दबाजी होगी कि इससे भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ेंगी।