UP : बाल कल्याण योजना में गड़बड़ी की आशंका, शासन स्तर पर हो सकती है जांच
UP यूपी : उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक समाज के गरीब बच्चों के लिए चलाई जा रही छात्रवृत्ति योजना को लेकर एक बड़ा घोटाला सामने आया है। इस योजना का उद्देश्य था उन बच्चों की मदद करना, जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं और शिक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन कुछ सरकारी बाबुओं और शिक्षा संस्थानों के अधिकारियों ने मिलकर इस योजना को लूट का जरिया बना डाला। करोड़ों रुपये, जो बच्चों की पढ़ाई के लिए थे, धोखे से उनकी जेबों में चले गए, और इससे उन मासूमों का भविष्य अधर में लटक गया। आइए जानते है इस खबर को विस्तार से…
करोड़ों रुपये की छात्रवृत्ति बन गई लूट
आपको बता दें कि घोटाला कोई छोटा-मोटा नहीं है। शैक्षणिक सत्र 2021-22 में, जब कोविड महामारी के बाद शिक्षा व्यवस्था पटरी पर लाने की कोशिश हो रही थी, तभी इस योजना में ₹1 करोड़ 46 लाख 37 हजार 604 रुपये (₹1,46,37,604) का गबन किया गया। यह पैसा उन बच्चों के नाम पर निकाला गया, जो असल में थे ही नहीं यानी फर्जी छात्रों के नाम पर सरकारी खजाने को चूना लगाया गया।
1832 ‘भूतिया छात्र’ बने घोटाले का आधार
इसके साथ ही जांच में यह साफ हुआ कि 1832 फर्जी नामों के आधार पर यह धन निकाला गया। इन नामों का न कोई अस्तित्व था, न ही उनकी पढ़ाई का कोई प्रमाण। इस फर्जीवाड़े का खुलासा तब हुआ जब जिला अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के वक्फ निरीक्षक मोहम्मद इफ्तिखार को कुछ अनियमितताओं की भनक लगी। उनकी सजगता और ईमानदारी से यह मामला उजागर हुआ, वरना ये भ्रष्ट लोग इसे आगे भी चालू रखते।
पुलिस ने दर्ज किया मामला, 75 आरोपी नामजद
हालांकि, जैसे ही यह मामला पुलिस तक पहुंचा, एसपी अभिनंदन की निगरानी में कार्यवाही शुरू हुई। पुलिस ने एनआईओ (नोडल अधिकारी) जीशान खान सहित 75 लोगों के खिलाफ गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया है। आरोप है कि ये लोग छात्रवृत्ति फर्जीवाड़े और सरकारी धन की हेराफेरी में लिप्त थे। इनमें से कई आरोपी शिक्षा विभाग से जुड़े हुए हैं।
प्रबंधक और प्रधानाचार्य भी घोटाले में शामिल
जिन लोगों को बच्चों की शिक्षा और भविष्य संवारने की जिम्मेदारी दी गई थी, वही स्कूलों के प्रबंधक और प्रधानाचार्य इस घोटाले के भागीदार निकले। यह बेहद चिंताजनक है कि शिक्षा का मंदिर कहे जाने वाले संस्थानों में अब भ्रष्टाचार की पाठशाला चलाई जा रही है। जांच में सामने आया है कि ज्यादातर वित्तीय सहायता प्राप्त इंटर कॉलेज ही इस गड़बड़ी में शामिल हैं।
जांच रिपोर्ट ने खोली सच्चाई
सरकारी स्तर पर हुई जांच की जनपद के 50 शिक्षण संस्थानों पर जब संदेह हुआ और छानबीन की गई, तो 47 संस्थानों में फर्जीवाड़ा साबित हुआ। रिपोर्ट में लिखा है कि 1832 छात्रों के आवेदन फर्जी थे और उनकी पढ़ाई का कोई रिकॉर्ड नहीं था। फिर भी उनके नाम पर छात्रवृत्ति के पैसे बैंक खातों में ट्रांसफर कर दिए गए।
अब निदेशालय की बारी, लेकिन क्या होगा एक्शन?
जांच रिपोर्ट को आगे निदेशालय को भेज दिया गया है। निदेशालय ने पुलिस को एफआईआर दर्ज कराने का निर्देश दे दिया है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या वाकई दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होगी, या यह मामला भी कागज़ों में दबकर रह जाएगा? जिन लोगों ने गरीबों के हक पर डाका डाला है, उन्हें केवल निलंबन से नहीं, कानूनी सजा मिलनी चाहिए।
बच्चों का भविष्य या घोटालों का शिकार?
यह घोटाला केवल धन की चोरी नहीं है, बल्कि यह उन हजारों मासूम बच्चों के सपनों की हत्या है, जो इस छात्रवृत्ति के सहारे अपने भविष्य को बेहतर बनाने की उम्मीद रखते थे। सरकार की योजनाएं जितनी अच्छी हैं, उतनी ही कमजोर होती जा रही हैं उनका क्रियान्वयन, क्योंकि सिस्टम में बैठे कुछ भ्रष्ट लोग उन्हें खुद की कमाई का जरिया बना रहे हैं।
उत्तर प्रदेश का यह छात्रवृत्ति घोटाला एक चेतावनी है – कि जब तक प्रशासनिक ईमानदारी और निगरानी नहीं बढ़ेगी, तब तक कल्याणकारी योजनाएं सिर्फ भ्रष्टाचार की बलि चढ़ती रहेंगी। ऐसे मामलों में न्याय और जवाबदेही जरूरी है, ताकि किसी गरीब बच्चे का भविष्य किसी लालची अफसर के पेट की भेंट न चढ़े।