लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों में नेताओं की आवाजाही तेज होने लगी है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) को झटका देते हुए पूर्व सांसद अमीर आलम खान और उनके बेटे पूर्व विधायक नवाजिश आलम खान ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। दोनों नेताओं ने कांग्रेस में शामिल होने का फैसला किया है। वे 23 सितंबर को नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में पार्टी की सदस्यता ग्रहण करेंगे।
अमीर आलम और नवाजिश आलम का पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से प्रभाव रहा है। पिता-पुत्र करीब डेढ़ साल पहले राष्ट्रीय लोकदल छोड़कर आजाद समाज पार्टी में शामिल हुए थे। 2 फरवरी 2025 को शामली के गढ़ीपुख्ता में आयोजित कार्यक्रम में आसपा अध्यक्ष और नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद की मौजूदगी में दोनों ने पार्टी की सदस्यता ली थी। अब 2027 के चुनाव से पहले दोनों ने आसपा से अलग होने का फैसला किया है।
पूर्व विधायक नवाजिश आलम ने सोशल मीडिया के जरिए अपने इस्तीफे की जानकारी सार्वजनिक की। इसके बाद अमीर आलम ने भी पार्टी नेतृत्व को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने आरोप लगाया कि आजाद समाज पार्टी में शामिल कराते समय चंद्रशेखर आजाद की ओर से किए गए वादे पूरे नहीं किए गए। अमीर आलम का यह भी आरोप है कि उन्हें पार्टी में अपेक्षित संवाद और सम्मान नहीं मिला। ये आरोप अमीर आलम का पक्ष हैं; आसपा नेतृत्व की प्रतिक्रिया सामने आने पर इस विवाद की दूसरी तस्वीर भी स्पष्ट होगी।
नवाजिश आलम ने भी पार्टी में सम्मान नहीं मिलने की बात कही है। पिता-पुत्र के एक साथ इस्तीफा देने के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गईं। शुरुआत में उनके अगले राजनीतिक कदम को लेकर अटकलें थीं, लेकिन अब रिपोर्टों के अनुसार दोनों ने कांग्रेस में शामिल होने का फैसला कर लिया है। 23 सितंबर को दिल्ली में उनके औपचारिक रूप से कांग्रेस की सदस्यता लेने का कार्यक्रम है।
अमीर आलम खान का राजनीतिक सफर कई दशक पुराना है। वह पहली बार 1985 में थानाभवन विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए थे। इसके बाद उन्होंने मोरना और फिर थानाभवन विधानसभा क्षेत्र का भी प्रतिनिधित्व किया। वह उत्तर प्रदेश सरकार में परिवहन मंत्री भी रह चुके हैं। वर्ष 1998 में अमीर आलम कैराना लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुने गए और बाद में राज्यसभा सदस्य भी रहे। इस कारण पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पुराने और अनुभवी नेताओं में उनका नाम शामिल किया जाता है।
उनके बेटे नवाजिश आलम भी सक्रिय राजनीति में हैं। वह 2012 से 2017 तक बुढ़ाना विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे। पिता-पुत्र लंबे समय तक राष्ट्रीय लोकदल की राजनीति से जुड़े रहे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान, जाट और मुस्लिम मतदाताओं के बीच मजबूत आधार रखने वाले रालोद के साथ उनकी राजनीतिक यात्रा लंबी रही, लेकिन 2025 में उन्होंने पार्टी छोड़कर चंद्रशेखर आजाद की आसपा का दामन थाम लिया था।
अब करीब डेढ़ साल के भीतर आसपा से भी दोनों का रिश्ता समाप्त हो गया है। उनके इस्तीफे के पीछे पार्टी नेतृत्व से असंतोष के साथ विधानसभा टिकट को लेकर मतभेद की चर्चा भी सामने आई है। कुछ स्थानीय नेताओं का दावा है कि पिता-पुत्र पहले बुढ़ाना विधानसभा क्षेत्र को लेकर इच्छुक थे और बाद में थानाभवन सीट को लेकर चर्चा हुई। हालांकि अमीर आलम ने टिकट विवाद से जुड़े ऐसे दावों को खारिज किया है। इसलिए इस्तीफे का कारण केवल टिकट विवाद था, इसे स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
अमीर आलम का कहना है कि मुख्य मुद्दा पार्टी में किए गए वादों का पूरा नहीं होना और नेतृत्व के साथ संवाद की कमी है। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी अध्यक्ष उनसे मुलाकात नहीं करते थे और फोन का जवाब भी नहीं मिलता था। वहीं नवाजिश ने सम्मान नहीं मिलने को पार्टी छोड़ने की वजह बताया।
पिता-पुत्र का कांग्रेस की ओर जाना ऐसे समय हो रहा है, जब उत्तर प्रदेश में सभी राजनीतिक दल 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए अपने संगठन और सामाजिक समीकरण मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम, दलित, जाट, गुर्जर और अन्य समुदायों के बीच समर्थन को लेकर अलग-अलग दल सक्रिय हैं। अमीर आलम और नवाजिश आलम की अगली राजनीतिक भूमिका इसी व्यापक चुनावी तैयारी के संदर्भ में देखी जा रही है।
आजाद समाज पार्टी के लिए भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश खास राजनीतिक महत्व रखता है। चंद्रशेखर आजाद ने 2024 के लोकसभा चुनाव में नगीना सीट से जीत हासिल की थी और इसके बाद पार्टी उत्तर प्रदेश में अपना संगठन बढ़ाने में जुटी है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले आसपा अलग-अलग क्षेत्रों में नेताओं और कार्यकर्ताओं को जोड़ने की कोशिश कर रही है। इसी दौरान अमीर आलम और नवाजिश जैसे अनुभवी नेताओं का अलग होना पार्टी के संगठनात्मक समीकरण में बदलाव है।
हालांकि दो नेताओं के पार्टी छोड़ने से 2027 के चुनाव में आसपा या कांग्रेस के वास्तविक चुनावी प्रदर्शन पर कितना असर पड़ेगा, इसका अभी निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारों, गठबंधनों, स्थानीय मुद्दों और अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों के सामाजिक समीकरण सहित कई कारक भूमिका निभाते हैं।
अमीर आलम परिवार का राजनीतिक प्रभाव खास तौर पर मुजफ्फरनगर और शामली क्षेत्र में रहा है। थानाभवन, कैराना, बुढ़ाना और आसपास के इलाकों में परिवार की पुरानी राजनीतिक सक्रियता रही है। यही कारण है कि उनके पार्टी बदलने की खबर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में चर्चा का विषय बनी हुई है।
कांग्रेस में शामिल होने के बाद अमीर आलम और नवाजिश आलम को क्या जिम्मेदारी दी जाएगी और 2027 के विधानसभा चुनाव में दोनों में से किसी को उम्मीदवार बनाया जाएगा या नहीं, इस बारे में अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। फिलहाल केवल इतना तय बताया गया है कि दोनों नेता 23 सितंबर को दिल्ली में कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण करेंगे।
दूसरी ओर, चंद्रशेखर आजाद भी प्रदेश में अपनी पार्टी का विस्तार करने में लगे हैं। हाल के दिनों में उन्होंने दूसरे राजनीतिक दलों से जुड़े नेताओं को आसपा में आने का न्योता भी दिया है। ऐसे में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले नेताओं का एक दल से दूसरे दल में जाना आगे भी राजनीतिक चर्चा का विषय बना रह सकता है।
फिलहाल अमीर आलम खान और नवाजिश आलम खान के इस्तीफे से इतना स्पष्ट है कि आजाद समाज पार्टी के पश्चिमी यूपी संगठन में एक महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है। पिता-पुत्र ने पार्टी नेतृत्व पर वादे पूरे न करने और पर्याप्त सम्मान नहीं मिलने के आरोप लगाए हैं, जबकि टिकट विवाद की चर्चाओं को अमीर आलम ने खारिज किया है। अब 23 सितंबर को दोनों के कांग्रेस में औपचारिक प्रवेश के बाद उनकी अगली राजनीतिक भूमिका पर नजर रहेगी।
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