उत्तर प्रदेश

अमेरिकी नागरिकों को बनाया निशाना 16 आरोपी गिरफ्तार

Ratna Netam
19 Sept 2026 7:04 PM IST
अमेरिकी नागरिकों को बनाया निशाना 16 आरोपी गिरफ्तार
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लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में कथित तौर पर फर्जी कॉल सेंटर चलाकर अमेरिकी नागरिकों से करोड़ों रुपये की साइबर ठगी करने वाले गिरोह का खुलासा हुआ है। आरोप है कि गिरोह के सदस्य अमेरिका में बैठे लोगों को तकनीकी सहायता, बैंकिंग या दूसरी सेवाओं के नाम पर फोन करते और उन्हें अपने जाल में फंसाकर रकम ऐंठते थे। शुरुआती जानकारी में ठगी का आंकड़ा करीब 100 करोड़ रुपये तक बताया जा रहा है। मामले में पुलिस ने कॉल सेंटर से जुड़े 16 लोगों को गिरफ्तार किया है और पूरे नेटवर्क की जांच शुरू कर दी है।
पुलिस की कार्रवाई में सामने आया कि आरोपियों ने लखनऊ में एक व्यवस्थित कॉल सेंटर तैयार कर रखा था। बाहर से देखने पर यहां सामान्य तरीके से काम होता दिखाई देता था, लेकिन आरोप है कि इसके जरिए विदेशी नागरिकों को निशाना बनाया जा रहा था। कॉल सेंटर में कंप्यूटर, इंटरनेट आधारित कॉलिंग सिस्टम और अन्य तकनीकी उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता था।
जांच में पता लगाया जा रहा है कि गिरोह कितने समय से सक्रिय था और अब तक कितने अमेरिकी नागरिकों से संपर्क किया गया। पुलिस उन बैंक खातों, डिजिटल वॉलेट और अन्य माध्यमों की जानकारी भी जुटा रही है जिनका इस्तेमाल कथित ठगी से हासिल रकम को एक जगह से दूसरी जगह भेजने में किया गया।
पुलिस के अनुसार, गिरोह से जुड़े लोग अमेरिकी नागरिकों को कॉल करने के लिए इंटरनेट आधारित तकनीक का इस्तेमाल करते थे। आरोपियों को इस तरह प्रशिक्षित किया गया था कि बातचीत के दौरान पीड़ित को शक न हो। अंग्रेजी बोलने वाले कर्मचारियों को कॉल सेंटर में रखा गया था और उन्हें कथित तौर पर तय स्क्रिप्ट के आधार पर लोगों से बात करने के निर्देश दिए जाते थे।
आरोप है कि फोन उठाने वाले व्यक्ति को किसी समस्या या सेवा के नाम पर डराया या भ्रमित किया जाता था। इसके बाद समाधान उपलब्ध कराने के बहाने उससे भुगतान करने के लिए कहा जाता था। पीड़ित को विश्वास दिलाया जाता था कि फोन करने वाला व्यक्ति किसी अधिकृत संस्था या कंपनी से जुड़ा हुआ है।
इस पूरे नेटवर्क को संचालित करने के लिए अलग-अलग कर्मचारियों को अलग जिम्मेदारियां दिए जाने की बात सामने आई है। कुछ लोग संभावित पीड़ितों को फोन करते थे, जबकि कुछ बातचीत आगे बढ़ाने और भुगतान कराने का काम संभालते थे। वहीं गिरोह से जुड़े अन्य लोग कथित तौर पर रकम को प्राप्त करने और उसे आगे भेजने की व्यवस्था देखते थे।
मामले में 16 लोगों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस अब कॉल सेंटर के मुख्य संचालकों और उनके सहयोगियों की भूमिका की जांच कर रही है। यह भी पता लगाया जा रहा है कि गिरफ्तार किए गए लोगों में कौन कर्मचारी के तौर पर काम कर रहा था और कौन पूरे नेटवर्क के संचालन और वित्तीय लेनदेन में शामिल था।
जांच एजेंसियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक करीब 100 करोड़ रुपये की कथित ठगी के आंकड़े की पुष्टि करना है। शुरुआती जांच में बड़ी रकम के लेनदेन की बात सामने आई है, लेकिन अंतिम राशि बैंक खातों, डिजिटल ट्रांजैक्शन और अन्य वित्तीय रिकॉर्ड की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी। पुलिस संबंधित खातों की ट्रांजैक्शन हिस्ट्री खंगाल रही है।
जांच में यह भी देखा जा रहा है कि रकम भारत तक किस माध्यम से पहुंचती थी। अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी के मामलों में अपराधी कई बार अलग-अलग बैंक खातों, डिजिटल भुगतान माध्यमों या अन्य वित्तीय तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। इस मामले में वास्तविक प्रक्रिया क्या थी, इसकी पुष्टि जांच के बाद होगी।
पुलिस ने कार्रवाई के दौरान कॉल सेंटर में इस्तेमाल किए जा रहे कंप्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को कब्जे में लिया है। इनकी डिजिटल फॉरेंसिक जांच से महत्वपूर्ण जानकारी सामने आने की उम्मीद है। उपकरणों में मौजूद कॉल रिकॉर्ड, चैट, ईमेल, संपर्क सूची और अन्य डेटा की जांच कर गिरोह के पूरे नेटवर्क का पता लगाया जा सकता है।
पुलिस यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि अमेरिकी नागरिकों के फोन नंबर और अन्य जानकारियां आरोपियों तक कैसे पहुंचती थीं। अगर इसके लिए किसी अवैध डेटाबेस या चोरी किए गए डेटा का इस्तेमाल किया गया है तो मामले में अन्य लोगों की भूमिका भी सामने आ सकती है।
कॉल सेंटर के कर्मचारियों को दी जाने वाली ट्रेनिंग भी जांच के दायरे में है। शुरुआती जानकारी के मुताबिक, विदेशी नागरिकों से बातचीत के लिए कर्मचारियों को विशेष तरीके से तैयार किया जाता था। उन्हें अंग्रेजी में बातचीत करने, सवालों के जवाब देने और पीड़ित को लंबे समय तक कॉल पर बनाए रखने के तरीके सिखाए जाने की बात सामने आई है।
अमेरिकी नागरिकों को निशाना बनाए जाने के कारण जांच में अंतरराष्ट्रीय पहलू भी जुड़ गया है। जरूरत पड़ने पर संबंधित एजेंसियों के माध्यम से विदेशी अधिकारियों से जानकारी साझा की जा सकती है। पीड़ितों की पहचान और उनके साथ हुई वित्तीय ठगी की पुष्टि के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध रिकॉर्ड भी महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।
पुलिस के सामने अब यह पता लगाने की चुनौती है कि कॉल सेंटर का असली मास्टरमाइंड कौन है और नेटवर्क में कुल कितने लोग जुड़े हुए थे। गिरफ्तार 16 आरोपियों से पूछताछ के आधार पर अन्य संदिग्धों की पहचान की जा सकती है। यदि नेटवर्क दूसरे शहरों या राज्यों तक फैला पाया जाता है तो जांच का दायरा बढ़ सकता है।
इस मामले ने एक बार फिर फर्जी कॉल सेंटर के जरिए होने वाली अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी की चुनौती को सामने रखा है। ऐसे नेटवर्क सामान्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान की तरह कार्यालय किराए पर लेकर बड़ी संख्या में कर्मचारियों के साथ काम कर सकते हैं। इंटरनेट कॉलिंग और डिजिटल भुगतान व्यवस्था के कारण अपराधियों की वास्तविक पहचान और स्थान का पता लगाना कई बार मुश्किल हो जाता है।
पुलिस अब कॉल सेंटर से जब्त इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और दस्तावेजों की जांच कर रही है। गिरफ्तार आरोपियों के बैंक खातों, मोबाइल नंबरों और डिजिटल गतिविधियों को भी खंगाला जा रहा है। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि कथित ठगी की रकम कहां-कहां भेजी गई और इससे किसे आर्थिक लाभ हुआ।
जांच में कर्मचारियों की भर्ती प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी। पुलिस यह जानने की कोशिश कर रही है कि कॉल सेंटर में नौकरी करने वाले युवाओं को वास्तविक काम के बारे में कितनी जानकारी थी और किन लोगों ने उन्हें भर्ती किया था। प्रत्येक आरोपी की भूमिका के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई तय की जाएगी।
फिलहाल करीब 100 करोड़ रुपये की ठगी का आंकड़ा शुरुआती जांच से जुड़ा दावा है और इसकी अंतिम पुष्टि विस्तृत वित्तीय जांच के बाद होगी। पुलिस गिरफ्तार 16 लोगों से पूछताछ और डिजिटल साक्ष्यों के विश्लेषण के जरिए नेटवर्क की पूरी कड़ी जोड़ने में जुटी है।
लखनऊ में सामने आए इस मामले में अब जांच का फोकस कथित मास्टरमाइंड, विदेशी पीड़ितों की संख्या, ठगी की वास्तविक रकम और पैसे के लेनदेन के रास्ते का पता लगाने पर है। जांच आगे बढ़ने के साथ मामले में और गिरफ्तारियां या नए खुलासे भी हो सकते हैं। फिलहाल पुलिस जब्त डिजिटल उपकरणों और वित्तीय रिकॉर्ड के आधार पर इस कथित अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी नेटवर्क की परतें खोलने में जुटी है।
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