कारसेवा की ताकत: ₹20 से ₹25 हजार तक के सहयोग से बहल्ला नदी पर बना जीवनदायी पुल

₹20 से ₹25 हजार तक के जनसहयोग से बना कमाल, ग्रामीणों ने बहल्ला नदी पर खड़ा कर दिया पुल

Update: 2026-07-26 01:27 GMT

Moradabad: जहां सरकारी योजनाएं और प्रशासनिक प्रक्रियाएं वर्षों तक समाधान नहीं दे सकीं, वहां लोगों की एकजुटता और सामूहिक संकल्प ने असंभव को संभव कर दिखाया। ग्रामीणों ने ₹20 से लेकर ₹25,000 तक का स्वैच्छिक योगदान दिया और श्रमदान (कारसेवा) के जरिए बहल्ला नदी पर एक पुल का निर्माण कर दिया। यह पुल आज न केवल आवागमन का साधन है, बल्कि सामुदायिक एकता और आत्मनिर्भरता का प्रतीक भी बन गया है।

वर्षों से पुल की मांग थी अधूरी
बहल्ला नदी पर पुल नहीं होने के कारण आसपास के गांवों के लोगों को बरसात के दिनों में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता था। स्कूल जाने वाले बच्चों, किसानों, मरीजों और व्यापारियों को नदी पार करने के लिए लंबा चक्कर लगाना पड़ता था। कई बार तेज बहाव के कारण संपर्क पूरी तरह टूट जाता था।
ग्रामीणों ने कई बार प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से पुल निर्माण की मांग की, लेकिन लंबे समय तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल सका।
फिर गांव ने खुद संभाली जिम्मेदारी
जब सरकारी स्तर पर उम्मीद टूटने लगी, तो ग्रामीणों ने स्वयं पुल बनाने का फैसला किया। गांव में बैठकें हुईं और तय किया गया कि हर परिवार अपनी क्षमता के अनुसार आर्थिक सहयोग देगा।
किसी ने ₹20, किसी ने ₹100, किसी ने ₹500, तो सक्षम लोगों ने ₹25,000 तक का योगदान दिया। केवल धन ही नहीं, बल्कि लोगों ने श्रमदान कर निर्माण कार्य में भी हिस्सा लिया।
कारसेवा से बना पुल
पुल निर्माण में स्थानीय युवाओं, किसानों, बुजुर्गों और महिलाओं ने भी अपनी-अपनी भूमिका निभाई। किसी ने निर्माण सामग्री पहुंचाई, किसी ने मजदूरी की, तो किसी ने भोजन और अन्य व्यवस्थाएं संभाली।
सामूहिक प्रयास और आपसी सहयोग से बहल्ला नदी पर पुल तैयार हो गया, जिससे वर्षों पुरानी समस्या का समाधान हो गया।
हजारों लोगों को मिला लाभ
पुल बनने के बाद कई गांवों के लोगों का आवागमन आसान हो गया है। अब बच्चों को स्कूल पहुंचने में कम समय लगता है, किसानों को अपनी उपज बाजार तक ले जाने में सुविधा होती है और मरीजों को अस्पताल पहुंचाने में भी आसानी हुई है।
बरसात के मौसम में भी अब लोगों को नदी पार करने के लिए जान जोखिम में नहीं डालनी पड़ती।
आत्मनिर्भरता की मिसाल बना गांव
ग्रामीणों की इस पहल को सामाजिक एकजुटता और जनभागीदारी का उत्कृष्ट उदाहरण माना जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समाज एकजुट होकर काम करे, तो कई समस्याओं का समाधान सामूहिक प्रयास से भी संभव है।
यह पुल केवल सीमेंट और लोहे का ढांचा नहीं, बल्कि विश्वास, सहयोग और सामुदायिक शक्ति की मिसाल बन गया है। ग्रामीणों की यह 'कारसेवा' दिखाती है कि सीमित संसाधनों के बावजूद सामूहिक संकल्प बड़े बदलाव ला सकता है।

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