लखनऊ। मध्य प्रदेश के सागर में जहरीली शराब से हुई मौतों के बाद राजधानी लखनऊ में भी पुराने शराब कांडों की यादें ताजा हो गई हैं। पिछले करीब दो दशकों में लखनऊ और आसपास के ग्रामीण इलाकों में जहरीली व मिलावटी शराब कई परिवारों को उजाड़ चुकी है। हर बड़े हादसे के बाद प्रशासन और पुलिस ने कार्रवाई का दावा किया, जांच समितियां गठित हुईं और अवैध शराब के खिलाफ अभियान चलाए गए, लेकिन कुछ समय बीतने के बाद निगरानी व्यवस्था फिर कमजोर पड़ती रही। यही वजह है कि जहरीली शराब का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हो सका।

राजधानी में अवैध शराब का कारोबार कोई नया मामला नहीं है। वर्ष 2003 में अमीनाबाद-कैसरबाग इलाके से सामने आए शराब कांड ने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए थे। इसके बाद अलग-अलग वर्षों में ग्रामीण क्षेत्रों से भी जहरीली और मिलावटी शराब के सेवन से लोगों के बीमार होने और मौतों की घटनाएं सामने आती रहीं। इन हादसों में गरीब और मजदूर वर्ग के परिवार सबसे ज्यादा प्रभावित हुए।

2003 में अमीनाबाद-कैसरबाग कांड से हड़कंप

वर्ष 2003 में अमीनाबाद-कैसरबाग इलाके में जहरीली शराब से जुड़े मामले ने राजधानी को झकझोर दिया था। शराब पीने के बाद लोगों की तबीयत बिगड़ने और मौतों की घटनाओं ने अवैध शराब के नेटवर्क को लेकर पुलिस और आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए थे।

घटना के बाद अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई तेज की गई। संदिग्ध ठिकानों पर छापेमारी हुई और शराब की बिक्री व सप्लाई से जुड़े लोगों पर शिकंजा कसने की कोशिश की गई। साथ ही संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय करने की बात सामने आई। हालांकि, समय बीतने के साथ अभियान की गति धीमी पड़ गई और अवैध शराब की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी।

2015 का मलिहाबाद कांड बना बड़ी चेतावनी

राजधानी के ग्रामीण क्षेत्र में वर्ष 2015 में मलिहाबाद शराब कांड ने एक बार फिर प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर दिया। जहरीली शराब पीने के बाद बड़ी संख्या में लोगों की तबीयत खराब हुई और कई लोगों की जान चली गई। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि अवैध शराब की बिक्री केवल शहर के किसी एक हिस्से तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण इलाकों में भी इसका नेटवर्क सक्रिय हो सकता है।

हादसे के बाद पुलिस और आबकारी विभाग की कार्यशैली की समीक्षा शुरू हुई। जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई और अवैध शराब के निर्माण तथा बिक्री पर रोक लगाने के लिए अभियान चलाया गया। ग्रामीण इलाकों में शराब बनाने और बेचने वाले संदिग्ध ठिकानों पर छापेमारी की गई। इसके बावजूद अवैध शराब के कारोबार पर स्थायी रूप से अंकुश लगाने की चुनौती बनी रही।

2020 में बंथरा कांड ने फिर बढ़ाई चिंता

वर्ष 2020 में बंथरा क्षेत्र में सामने आया शराब कांड भी राजधानी के लिए बड़ी चेतावनी साबित हुआ। जहरीली शराब के सेवन से लोगों की मौत के बाद एक बार फिर पुलिस और आबकारी विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठे। घटना के बाद अधिकारियों ने कार्रवाई करते हुए अवैध शराब के कारोबार से जुड़े लोगों के खिलाफ अभियान चलाया।

बंथरा कांड के बाद भी वही तस्वीर सामने आई, जो पहले के हादसों के बाद देखने को मिली थी। कुछ समय तक अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई तेज रही, लेकिन बाद में अभियान की रफ्तार कम होने लगी। विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का मानना है कि केवल हादसे के बाद छापेमारी करने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। अवैध शराब की आपूर्ति के पूरे नेटवर्क पर लगातार निगरानी और कार्रवाई जरूरी है।

हर हादसे के बाद होती है जांच, फिर ढीली पड़ती निगरानी

लखनऊ में जहरीली शराब के पुराने मामलों पर नजर डालें तो एक पैटर्न सामने आता है। किसी बड़े हादसे के बाद प्रशासन सक्रिय होता है। पुलिस और आबकारी विभाग के अधिकारी मैदान में उतरते हैं। अवैध शराब के ठिकानों पर छापेमारी होती है, गिरफ्तारियां की जाती हैं और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जाती है। कुछ समय तक निगरानी भी बढ़ा दी जाती है।

हालांकि, स्थिति सामान्य होने के बाद यही सख्ती धीरे-धीरे कम होती जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में कच्ची शराब बनाने वाले छोटे ठिकाने और अवैध बिक्री के केंद्र दोबारा सक्रिय होने का खतरा बना रहता है। यही कारण है कि जहरीली शराब के खिलाफ लड़ाई को केवल किसी घटना के बाद चलाए जाने वाले अभियान तक सीमित रखने के बजाय इसे लगातार चलाने की जरूरत महसूस होती रही है।

गरीब परिवारों पर सबसे ज्यादा असर

जहरीली और मिलावटी शराब के मामलों का सबसे गंभीर असर गरीब और निम्न आय वर्ग के परिवारों पर पड़ता है। रोज कमाकर परिवार चलाने वाले लोग सस्ती शराब के लालच में अवैध शराब खरीद लेते हैं। शराब में जहरीले रसायन या खतरनाक मिलावट होने की स्थिति में कुछ ही घंटों में कई लोगों की हालत बिगड़ सकती है। मौत होने पर परिवार के सामने आर्थिक संकट भी खड़ा हो जाता है।

पुराने शराब कांडों ने राजधानी और आसपास के क्षेत्रों में ऐसे कई परिवारों को प्रभावित किया है, जिन्होंने अपने कमाने वाले सदस्यों को खोया। हादसों के बाद मुआवजे और सरकारी मदद की घोषणाएं होती हैं, लेकिन परिवार के सामने खड़ी दीर्घकालिक आर्थिक और सामाजिक मुश्किलें बनी रहती हैं।

सागर की घटना ने फिर खड़े किए सवाल

मध्य प्रदेश के सागर में जहरीली शराब से हुई मौतों के बाद लखनऊ के पुराने मामलों की चर्चा इसलिए महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि राजधानी पहले भी ऐसे हादसों का सामना कर चुकी है। 2003 के अमीनाबाद-कैसरबाग कांड से लेकर 2015 के मलिहाबाद और 2020 के बंथरा कांड तक की घटनाएं बताती हैं कि अवैध शराब के खिलाफ लगातार निगरानी कितनी जरूरी है।

 

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