चक्रवात के बीच ओडिशा में जन्मे 931 बच्चे, कई परिवारों ने रखा ‘अर्णब’ और ‘वर्षा’ नाम
ओडिशा में चक्रवात के दौरान आई खुशियां
भुवनेश्वर: चक्रवात ‘अर्णब’ के कारण खराब मौसम और भारी बारिश का सामना कर रहे ओडिशा से सैकड़ों परिवारों के लिए खुशी की खबर सामने आई है। चक्रवात के दौरान राज्य में 931 बच्चों का जन्म हुआ। मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने बुधवार, 28 अक्टूबर को स्थिति की समीक्षा करते हुए यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि एहतियात के तौर पर पहले ही 2,245 गर्भवती महिलाओं को विभिन्न स्वास्थ्य संस्थानों में पहुंचाया गया था। प्रसव के बाद सभी संबंधित माताएं और नवजात स्वस्थ हैं। इस बीच कुछ परिवारों ने जन्म के समय की परिस्थितियों को बच्चों के नाम से जोड़ दिया। किसी ने बेटे का नाम अर्णब रखा तो किसी परिवार ने बेटी के लिए वर्षा या वर्षारानी नाम चुना। अधिकारियों के मुताबिक, कुछ नवजातों के नाम तूफान, पवन और बतासी भी रखे गए। हालांकि, ऐसे नाम रखने वाले परिवारों की कुल संख्या स्पष्ट नहीं की गई है।
प्रसव से पहले अस्पताल पहुंचाने पर दिया जोर
चक्रवात की आशंका को देखते हुए प्रशासन ने गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंचाने की तैयारी शुरू की थी। विशेष ध्यान उन महिलाओं पर दिया गया, जिनकी प्रसव की संभावित तारीख नजदीक थी। इसका उद्देश्य खराब मौसम के बीच अचानक अस्पताल पहुंचाने की जरूरत को कम करना था। गंजाम जिले में शुरुआती तैयारियों के दौरान ऐसी महिलाओं को चिह्नित किया गया था, जिनका प्रसव अगले 15 दिनों में संभावित था। टाइम्स ऑफ इंडिया की 26 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, सोमवार दोपहर तक 107 गर्भवती महिलाओं को नजदीकी अस्पतालों और चार को ‘मां गृह’ पहुंचाया गया था। यह शुरुआती चरण का आंकड़ा था; इसके बाद स्थानांतरण का अभियान आगे बढ़ा। कुछ महिलाएं संभावित प्रसव तिथि से काफी पहले घर छोड़ने के लिए तैयार नहीं थीं। ऐसे मामलों में आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने उन्हें अस्पताल जाने के लिए समझाया। इससे तैयारी का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामने आया—सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराने के साथ परिवारों को समय रहते वहां जाने के लिए तैयार करना भी जरूरी था।
गंजाम में 220 महिलाओं का हुआ प्रसव
गंजाम जिले में 25 अक्टूबर से एहतियाती स्थानांतरण किया जा रहा था। बाद में जारी जानकारी के अनुसार, जिले में 493 गर्भवती महिलाओं को अस्पतालों तक पहुंचाया गया। मुख्य जिला चिकित्सा एवं जनस्वास्थ्य अधिकारी एस. कामेश्वर राव ने बताया कि बुधवार दोपहर एक बजे तक इनमें से 220 महिलाओं का प्रसव हो चुका था। जन्मे बच्चों में 101 लड़के और 119 लड़कियां शामिल थीं। ये आंकड़े अलग-अलग समय पर जारी हुए थे। शुरुआती स्थानांतरण की संख्या और बाद में सामने आए जिला स्तर के कुल आंकड़े को इसी क्रम में देखा जाना चाहिए। इसी तरह गंजाम के 220 प्रसव राज्यभर में बताए गए 931 प्रसवों से अलग अतिरिक्त संख्या नहीं हैं।
पहले बेटे का नाम रखा ‘अर्णब’
पात्रपुर के बेंगेई साही की रहने वाली 30 वर्षीय सुकांति प्रधान ने स्थानीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में बेटे को जन्म दिया। परिवार ने बच्चे का नाम अर्णब चुना। बच्चे के पिता चक्रधर साबर ने बताया कि चक्रवात की वजह से उनकी पत्नी को पहले ही अस्पताल पहुंचा दिया गया था।
स्वास्थ्य केंद्र के चिकित्सा अधिकारी के अनुसार, माता-पिता के नाम तय करने के बाद बच्चे का जन्म प्रमाणपत्र जारी किया गया। मां और बच्चे की स्थिति स्थिर पाए जाने पर उन्हें छुट्टी दे दी गई। परिवार के लिए पहली संतान का जन्म अब उस चक्रवात की याद से भी जुड़ गया है, जिसके कारण उन्हें पहले अस्पताल जाना पड़ा था। उसी स्वास्थ्य केंद्र में चिकारदा की 22 वर्षीय रुक्मिणी बेहरा ने बेटी को जन्म दिया। परिवार ने उसका नाम वर्षारानी रखने का निर्णय लिया। उन्होंने बताया कि जन्म के आसपास तेज बारिश हो रही थी और चिकित्सा कर्मचारियों ने वर्षा नाम सुझाया था।
राहत और जरूरी सेवाओं की बहाली पर निर्देश
बच्चों के सुरक्षित जन्म की जानकारी के साथ राज्य सरकार प्रभावित क्षेत्रों में राहत व्यवस्था पर भी ध्यान दे रही है। मुख्यमंत्री कार्यालय की आधिकारिक सूचना के अनुसार, मोहन चरण माझी ने विशेष राहत आयुक्त कार्यालय में उच्चस्तरीय बैठक कर नुकसान, बचाव अभियान और राहत वितरण की समीक्षा की। मुख्यमंत्री ने बिजली, पेयजल और संचार सेवाओं की बहाली तेज करने के निर्देश दिए। उन्होंने ओडिशा आपदा त्वरित कार्रवाई बल, राष्ट्रीय आपदा मोचन बल और अग्निशमन सेवाओं को सतर्क रहने तथा विभागों के बीच प्रभावी समन्वय सुनिश्चित करने को कहा। इस घटनाक्रम में सुरक्षित प्रसव के लिए की गई अग्रिम तैयारी विशेष रूप से सामने आई है। चक्रवात के दौरान रास्तों और सेवाओं में संभावित बाधा से पहले महिलाओं को अस्पताल पहुंचाना स्वास्थ्य व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी थी। अब राहत कार्यों के साथ माताओं और नवजातों की देखभाल भी संबंधित स्वास्थ्य संस्थानों की प्राथमिकताओं में बनी हुई है।