बेंगलुरु। कर्नाटक रूरल इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट लिमिटेड (KRIDL) में कथित भ्रष्टाचार और ठेकेदारों से रिश्वत मांगने के आरोपों को लेकर राज्य सरकार ने उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। पुत्तूर से कांग्रेस विधायक के. अशोक कुमार राय ने आरोप लगाया है कि KRIDL के दो इंजीनियरों ने मंत्रियों के नाम का इस्तेमाल करते हुए सरकारी काम करने वाले ठेकेदारों से कथित रूप से रिश्वत की मांग की। शिकायत सामने आने के बाद सरकार ने मामले की जांच कराने का फैसला किया है।

ग्रामीण विकास और पंचायत राज विभाग की ओर से मामले की उच्चस्तरीय जांच के निर्देश दिए गए हैं। दूसरी तरफ KRIDL ने अपने ऊपर लगे आरोपों पर सफाई देते हुए कहा है कि किसी तरह की वित्तीय गड़बड़ी नहीं हुई है। संस्था ने उस 7 प्रतिशत कटौती को भी वैध प्रशासनिक शुल्क बताया है जिसे लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ है।

कांग्रेस विधायक ने मुख्यमंत्री को लिखा पत्र

पुत्तूर के कांग्रेस विधायक के. अशोक कुमार राय ने मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार को पत्र लिखकर KRIDL के मैंगलोर डिवीजन के दो अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच की मांग की है।

पत्र में मैंगलोर डिवीजन के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर विजय और जूनियर इंजीनियर प्रज्वल के कामकाज पर सवाल उठाए गए हैं। विधायक ने आरोप लगाया कि सरकारी परियोजनाओं को पूरा करने वाले कुछ ठेकेदारों ने दोनों अधिकारियों के खिलाफ शिकायत की है।

राय के मुताबिक, ठेकेदारों ने अधिकारियों पर उन्हें परेशान करने, धमकी देने और कथित तौर पर गैर-कानूनी रकम मांगने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। विधायक ने सरकार से इन शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए विभागीय स्तर पर जांच कराने की मांग की।

मंत्रियों के नाम पर रिश्वत मांगने का आरोप

मामले का सबसे गंभीर पहलू यह आरोप है कि कथित रिश्वत मंत्रियों के नाम पर मांगी गई। विधायक की शिकायत के मुताबिक, ठेकेदारों से पैसे मांगने के लिए वरिष्ठ राजनीतिक पदाधिकारियों के नाम का इस्तेमाल किए जाने का आरोप है।

अब जांच में यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि इन आरोपों में कितनी सच्चाई है और क्या वास्तव में किसी अधिकारी ने मंत्री या अन्य वरिष्ठ व्यक्ति के नाम का इस्तेमाल कर ठेकेदारों पर भुगतान के लिए दबाव बनाया था।

यह भी जांच का विषय हो सकता है कि संबंधित ठेकेदारों से कितनी रकम मांगी गई, कथित मांग किस परियोजना या भुगतान से संबंधित थी और क्या इस संबंध में कोई दस्तावेजी या डिजिटल साक्ष्य मौजूद है।

उच्चस्तरीय जांच के आदेश

विधायक की शिकायत सामने आने के बाद ग्रामीण विकास और पंचायत राज विभाग ने मामले की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। जांच के दौरान आरोपों से जुड़े दस्तावेज, संबंधित अधिकारियों की भूमिका और ठेकेदारों की शिकायतों का परीक्षण किए जाने की संभावना है।

सरकार के इस कदम को मामले की गंभीरता को देखते हुए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सत्तारूढ़ कांग्रेस के ही विधायक द्वारा सरकारी संस्था के अधिकारियों के खिलाफ शिकायत किए जाने के कारण राजनीतिक स्तर पर भी यह मुद्दा चर्चा में है।

जांच के निष्कर्षों से ही स्पष्ट होगा कि अधिकारियों के खिलाफ लगाए गए आरोप सही हैं या नहीं।

7 प्रतिशत कटौती पर KRIDL की सफाई

विवाद के बीच KRIDL ने 7 प्रतिशत कटौती को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की है। संस्था का कहना है कि यह कोई गैर-कानूनी शुल्क या कमीशन नहीं है बल्कि आधिकारिक प्रशासनिक शुल्क है।

KRIDL के मुताबिक, संबंधित राशि निर्धारित प्रक्रिया के तहत प्रशासनिक खर्च के रूप में ली जाती है। इसलिए इसे भ्रष्टाचार या अवैध वसूली से जोड़ना उचित नहीं है।

यह स्पष्टीकरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विपक्षी भाजपा ने इसी 7 प्रतिशत कटौती को लेकर सरकार पर सवाल उठाए थे। भाजपा नेताओं ने इसे कथित तौर पर “मिनिस्ट्रियल चार्ज” बताते हुए सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे।

अब KRIDL ने स्पष्ट किया है कि 7 प्रतिशत की राशि आधिकारिक प्रशासनिक शुल्क है। हालांकि ठेकेदारों से कथित तौर पर अतिरिक्त गैर-कानूनी रकम मांगने का आरोप इससे अलग है और उसकी जांच की जाएगी।

अधिकारियों के खिलाफ गंभीर शिकायतें

कांग्रेस विधायक के पत्र में एग्जीक्यूटिव इंजीनियर विजय और जूनियर इंजीनियर प्रज्वल पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। ठेकेदारों की शिकायतों का हवाला देते हुए राय ने दावा किया कि उन्हें कथित तौर पर परेशान किया गया और धमकियां दी गईं।

यदि जांच में इन आरोपों की पुष्टि होती है तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है। वहीं आरोप गलत पाए जाने पर अधिकारियों को राहत मिल सकती है।

फिलहाल दोनों अधिकारियों पर लगे आरोपों को जांच के निष्कर्ष से पहले साबित तथ्य नहीं माना जा सकता।

भाजपा भी उठा चुकी है मामला

KRIDL से जुड़ा यह मामला पहले ही राजनीतिक रंग ले चुका है। भाजपा नेताओं ने कांग्रेस विधायक के पत्र को आधार बनाकर राज्य सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं।

विपक्ष ने मांग की है कि कथित अनियमितताओं में शामिल अधिकारियों को निलंबित किया जाए और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया जाए। भाजपा का आरोप है कि सरकारी परियोजनाओं में अतिरिक्त शुल्क और कथित कमीशन की व्यवस्था से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है।

हालांकि KRIDL की सफाई के बाद 7 प्रतिशत शुल्क को लेकर विवाद का एक दूसरा पक्ष भी सामने आया है। अब जांच में आधिकारिक प्रशासनिक शुल्क और कथित अवैध वसूली के आरोपों के बीच अंतर स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होगा।

ठेकेदारों के बयान हो सकते हैं अहम

उच्चस्तरीय जांच में संबंधित ठेकेदारों के बयान महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यदि उन्होंने वास्तव में अधिकारियों के खिलाफ उत्पीड़न, धमकी और पैसे मांगने की शिकायत की है तो जांच टीम उनसे विस्तृत जानकारी ले सकती है।

इसके अलावा फोन रिकॉर्ड, संदेश, भुगतान से संबंधित दस्तावेज और परियोजनाओं की फाइलों की जांच भी आरोपों की सच्चाई तक पहुंचने में मदद कर सकती है।

जांच में यह भी देखा जा सकता है कि संबंधित अधिकारियों ने ठेकेदारों के बिल या भुगतान रोकने के लिए किसी तरह का अनुचित दबाव बनाया था या नहीं।

सरकारी परियोजनाओं में पारदर्शिता का सवाल

KRIDL ग्रामीण बुनियादी ढांचे से जुड़ी विभिन्न परियोजनाओं के क्रियान्वयन में भूमिका निभाता है। इसलिए संस्था के अधिकारियों पर रिश्वत मांगने के आरोप सरकारी परियोजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ा महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करते हैं।

सरकारी निर्माण कार्यों में ठेकेदारों के भुगतान, प्रशासनिक शुल्क और परियोजना लागत की स्पष्ट व्यवस्था होना जरूरी है। यदि किसी स्तर पर आधिकारिक शुल्क के अतिरिक्त रकम मांगी जाती है तो यह जांच का विषय बनता है।

इसी कारण सरकार द्वारा उच्चस्तरीय जांच का आदेश महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

जांच रिपोर्ट पर टिकी नजर

अब पूरे मामले में उच्चस्तरीय जांच की रिपोर्ट का इंतजार रहेगा। जांच से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि ठेकेदारों से कथित रिश्वत मांगने के आरोपों में कितनी सच्चाई है और दोनों अधिकारियों की भूमिका क्या रही।

साथ ही यह भी साफ हो सकेगा कि मंत्रियों के नाम का वास्तव में इस्तेमाल किया गया था या नहीं। सरकार के लिए यह मामला इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि शिकायत विपक्ष की ओर से नहीं बल्कि सत्तारूढ़ कांग्रेस के विधायक ने की है।

फिलहाल KRIDL ने किसी भी गड़बड़ी से इनकार करते हुए 7 प्रतिशत कटौती को आधिकारिक प्रशासनिक शुल्क बताया है। दूसरी ओर सरकार ने शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए उच्चस्तरीय जांच शुरू करने का फैसला किया है। अब जांच के निष्कर्ष ही तय करेंगे कि आरोपों में कितना दम है और किसी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की आवश्यकता है या नहीं।

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