बेंगलुरु। देश के सरकारी स्कूलों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल तेजी से बढ़ता दिखाई दे रहा है। कर्नाटक समेत कई राज्यों के सरकारी स्कूलों के शिक्षक पढ़ाई को आसान और प्रभावी बनाने के लिए AI टूल्स का सहारा ले रहे हैं। JanAI की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, सर्वे में शामिल 72 प्रतिशत शिक्षक शिक्षा में AI के इस्तेमाल को लेकर सकारात्मक सोच रखते हैं। हालांकि, प्रशिक्षण की कमी, संस्थागत सहयोग, डेटा प्राइवेसी और छात्रों की AI पर बढ़ती निर्भरता को लेकर शिक्षकों ने चिंता भी जताई है।

यह राष्ट्रीय सर्वे कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, झारखंड और महाराष्ट्र में किया गया। इसमें कुल 797 सरकारी स्कूल शिक्षकों को शामिल किया गया। रिपोर्ट से सामने आया कि AI अब केवल निजी या तकनीकी रूप से बेहतर सुविधाओं वाले स्कूलों तक सीमित नहीं है। सरकारी स्कूलों में भी शिक्षक अपनी जरूरत के अनुसार इन तकनीकी साधनों को अपनाना शुरू कर चुके हैं।

सर्वे में शामिल 72 प्रतिशत शिक्षकों ने शिक्षा के क्षेत्र में AI को लेकर सकारात्मक रुख दिखाया। वहीं 26 प्रतिशत शिक्षकों ने बताया कि वे पहले से ही नियमित रूप से AI टूल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह आंकड़ा इस बात का संकेत देता है कि स्कूल शिक्षा में AI धीरे-धीरे शिक्षकों के रोजमर्रा के काम का हिस्सा बनता जा रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, शिक्षक AI का इस्तेमाल कई तरह के शैक्षणिक कार्यों में कर रहे हैं। इनमें कठिन विषयों और कॉन्सेप्ट को सरल भाषा में समझाना, छात्रों के लिए उदाहरण तैयार करना, अलग-अलग तरह की गतिविधियां बनाना और वर्कशीट तैयार करना शामिल है। इसके अलावा असेसमेंट से संबंधित सामग्री तैयार करने में भी AI की मदद ली जा रही है।

शिक्षकों के लिए AI का एक बड़ा फायदा समय की बचत के रूप में सामने आया है। आम तौर पर किसी विषय के लिए उदाहरण, गतिविधियां, प्रश्न या वर्कशीट तैयार करने में काफी समय लगता है। AI टूल्स की मदद से शिक्षक इन कामों के लिए शुरुआती सामग्री तेजी से तैयार कर सकते हैं और फिर उसे अपनी कक्षा और विद्यार्थियों की जरूरत के अनुसार बदल सकते हैं।

सर्वे में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आया कि AI का इस्तेमाल केवल उन स्कूलों तक सीमित नहीं है जहां कंप्यूटर लैब या बेहतर डिजिटल सुविधाएं मौजूद हैं। जिन स्कूलों में कंप्यूटर लैब नहीं हैं, वहां के शिक्षक भी AI टूल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। कई शिक्षक इसके लिए अपने निजी स्मार्टफोन का सहारा ले रहे हैं।

स्मार्टफोन के जरिए AI तक पहुंच ने सरकारी स्कूलों में तकनीक के इस्तेमाल के लिए एक नया रास्ता खोला है। सीमित डिजिटल संसाधनों के बावजूद शिक्षक अपने स्तर पर नई तकनीक को अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। इससे संकेत मिलता है कि AI आधारित शैक्षणिक साधनों का इस्तेमाल बुनियादी डिजिटल ढांचे की कमी के बावजूद आगे बढ़ सकता है।

हालांकि, AI को लेकर उत्साह के साथ कई चुनौतियां भी सामने आई हैं। शिक्षकों ने AI टूल्स के बेहतर और सुरक्षित इस्तेमाल के लिए उचित प्रशिक्षण की जरूरत बताई है। केवल AI टूल उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि शिक्षकों को यह भी समझना जरूरी है कि उनसे मिलने वाली जानकारी की जांच कैसे की जाए और उनका इस्तेमाल किस तरह जिम्मेदारी के साथ किया जाए।

संस्थागत समर्थन भी एक प्रमुख मुद्दा है। यदि स्कूल और शिक्षा विभाग AI के इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश, प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराते हैं तो शिक्षक इसका ज्यादा प्रभावी उपयोग कर सकते हैं। बिना स्पष्ट नियमों के अलग-अलग शिक्षक अपने स्तर पर अलग तरीके से AI का इस्तेमाल कर सकते हैं, जिससे गुणवत्ता और सुरक्षा से जुड़े सवाल पैदा हो सकते हैं।

डेटा प्राइवेसी को लेकर भी शिक्षकों ने चिंता जाहिर की है। AI प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते समय शिक्षक या छात्र किस तरह की जानकारी साझा कर रहे हैं और वह डेटा कहां तथा किस तरह इस्तेमाल किया जा सकता है, इसे लेकर स्पष्टता जरूरी मानी जा रही है। खासकर बच्चों से जुड़े डेटा की सुरक्षा स्कूल शिक्षा में संवेदनशील मुद्दा है।

रिपोर्ट में छात्रों की AI पर संभावित अत्यधिक निर्भरता को लेकर भी चिंता सामने आई है। शिक्षकों को आशंका है कि यदि विद्यार्थी हर सवाल का जवाब, असाइनमेंट या दूसरे शैक्षणिक काम AI से करवाने लगेंगे तो उनकी खुद सोचने और समस्या का समाधान तलाशने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।

शिक्षकों का मानना है कि AI को सीखने में मदद करने वाले साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए, न कि छात्र के स्वयं के प्रयास की जगह लेने वाले विकल्प के रूप में। उदाहरण के तौर पर किसी कठिन विषय को समझने, अतिरिक्त उदाहरण खोजने या अभ्यास प्रश्न हासिल करने के लिए AI मददगार हो सकता है। लेकिन यदि विद्यार्थी पूरा होमवर्क या असाइनमेंट AI से तैयार करवाते हैं तो सीखने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

सर्वे के नतीजे इस बात की ओर भी इशारा करते हैं कि सरकारी स्कूलों में AI को अपनाने के लिए केवल तकनीक उपलब्ध कराना काफी नहीं होगा। शिक्षकों को डिजिटल और AI साक्षरता से जुड़ा प्रशिक्षण, स्पष्ट नीतियां और डेटा सुरक्षा से जुड़े दिशा-निर्देश भी देने होंगे।

कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, झारखंड और महाराष्ट्र के 797 सरकारी शिक्षकों पर आधारित यह सर्वे स्कूल शिक्षा में बदलते तकनीकी माहौल की तस्वीर पेश करता है। 72 प्रतिशत शिक्षकों का AI के प्रति सकारात्मक नजरिया और 26 प्रतिशत का नियमित इस्तेमाल बताता है कि नई तकनीक ने सरकारी स्कूलों में भी अपनी जगह बनानी शुरू कर दी है।

आने वाले समय में AI स्कूल शिक्षा का कितना महत्वपूर्ण हिस्सा बनेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि इसके फायदों और जोखिमों के बीच किस तरह संतुलन बनाया जाता है। बेहतर प्रशिक्षण, संस्थागत सहयोग और मजबूत डेटा प्राइवेसी व्यवस्था के साथ AI शिक्षकों के लिए उपयोगी सहयोगी बन सकता है, लेकिन छात्रों की स्वतंत्र सोच और सीखने की क्षमता बनाए रखना भी उतना ही जरूरी होगा।

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