बेंगलुरु: कर्नाटक में कमजोर मानसून और बढ़ते तापमान के बीच बिजली की मांग में तेज उछाल ने ऊर्जा व्यवस्था पर दबाव बढ़ा दिया है। राज्य में बिजली की मांग में रोजाना 2,000 से 3,000 मेगावाट तक उतार-चढ़ाव और बढ़ोतरी देखी जा रही है। कई इलाकों से बिजली कटौती की शिकायतें सामने आ रही हैं, जबकि ऊर्जा विभाग के अधिकारी कुछ आपूर्ति बाधित होने की वजह रखरखाव कार्यों को भी बता रहे हैं।

कर्नाटक राज्य भार प्रेषण केंद्र (SLDC) के आंकड़ों के अनुसार 11 सितंबर 2026 को राज्य की पीक बिजली मांग 20,094 मेगावाट तक पहुंची, जिसे अधिकारियों ने अब तक का उच्चतम स्तर बताया है। इससे पहले 13 मार्च 2026 को पीक मांग 18,655 मेगावाट दर्ज की गई थी। 21 सितंबर को सुबह 11 बजे पीक मांग 16,719 मेगावाट रही।

20 हजार मेगावाट के पार पहुंची थी मांग

बिजली की मांग में मौजूदा बढ़ोतरी को समझने के लिए 11 सितंबर का आंकड़ा महत्वपूर्ण है। उस दिन मांग 20 हजार मेगावाट का स्तर पार कर 20,094 मेगावाट तक पहुंच गई थी।

कमजोर मानसून और सामान्य से अधिक तापमान को इस असामान्य मांग की प्रमुख वजहों में गिना जा रहा है। बारिश कम होने से एक तरफ सिंचाई के लिए कृषि पंप सेट पर निर्भरता बढ़ती है, वहीं गर्मी बढ़ने पर घरेलू और व्यावसायिक उपभोक्ताओं की बिजली खपत भी बढ़ती है।

बिजली वितरण कंपनियों के कर्मचारियों, किसानों और उपभोक्ताओं की ओर से अलग-अलग क्षेत्रों में आपूर्ति बाधित होने की शिकायतें सामने आ रही हैं।

कमजोर मानसून ने बढ़ाई मुश्किल

कर्नाटक में मौजूदा बिजली समस्या केवल मांग बढ़ने तक सीमित नहीं है। कमजोर दक्षिण-पश्चिम मानसून के कारण जलाशयों में पानी की उपलब्धता भी प्रभावित हुई है। इससे जलविद्युत उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ी है।

मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने भी हाल में राज्य में सूखे की स्थिति के बीच जल और बिजली की संभावित कमी को लेकर चिंता जताई थी। कम बारिश से जलविद्युत उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है, जिसके कारण दूसरे ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता बढ़ रही है।

मलनाड क्षेत्र में भी कमजोर मानसून के बीच तापमान बढ़ने और प्रमुख बांधों के जलस्तर में गिरावट की स्थिति दर्ज की गई है।

थर्मल पावर पर बढ़ रहा दबाव

जलविद्युत उत्पादन सीमित होने की स्थिति में कर्नाटक को थर्मल पावर स्टेशनों के साथ सौर और पवन ऊर्जा पर अधिक निर्भर होना पड़ रहा है।

SLDC के 19 सितंबर के उपलब्ध आंकड़ों में राज्य के प्रमुख उत्पादन स्रोतों में थर्मल उत्पादन 3,256 मेगावाट और प्रमुख जलविद्युत उत्पादन 932 मेगावाट दर्ज किया गया था। उसी समय राज्य विभिन्न गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों और केंद्रीय उत्पादन केंद्रों से मिलने वाली बिजली का भी उपयोग कर रहा था।

ऊर्जा विभाग के सामने चुनौती यह है कि बिजली की मांग और उत्पादन के बीच हर समय संतुलन बनाए रखना होता है। किसी एक बड़े स्रोत से उत्पादन अचानक कम होने पर दूसरे स्रोतों से तत्काल अतिरिक्त बिजली की व्यवस्था करनी पड़ती है।

पवन ऊर्जा में अचानक आई थी 2,000 MW की गिरावट

सितंबर के दूसरे सप्ताह में कर्नाटक की बिजली व्यवस्था को एक और झटका तब लगा जब पवन ऊर्जा उत्पादन में अचानक 2,000 मेगावाट से अधिक की गिरावट दर्ज की गई।

इसका असर दक्षिण कर्नाटक के कुछ हिस्सों में दिखाई दिया और अनिर्धारित बिजली कटौती की स्थिति बनी। ऊर्जा विभाग के सूत्रों के मुताबिक अतिरिक्त बिजली केंद्रीय उत्पादन केंद्रों, थर्मल इकाइयों और पावर एक्सचेंज से लेकर स्थिति को संभालने की कोशिश की गई।

यह घटना बताती है कि नवीकरणीय ऊर्जा पर निर्भरता बढ़ने के साथ उसके उत्पादन में होने वाले अचानक बदलाव को संभालने के लिए ग्रिड प्रबंधन भी महत्वपूर्ण है।

सौर ऊर्जा बढ़ी लेकिन स्टोरेज बड़ी चुनौती

कर्नाटक देश के प्रमुख सौर और पवन ऊर्जा उत्पादक राज्यों में शामिल है। दिन के समय सौर ऊर्जा से बड़ी मात्रा में बिजली उपलब्ध हो सकती है, लेकिन उत्पादन मौसम और दिन के समय पर निर्भर रहता है।

ऊर्जा क्षेत्र के अधिकारियों के अनुसार सौर ऊर्जा का उत्पादन बढ़ने के बावजूद बड़े पैमाने पर बिजली भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने से अतिरिक्त बिजली को बाद के समय के लिए सुरक्षित रखना चुनौती बना हुआ है।

उदाहरण के तौर पर 21 सितंबर को SLDC के एक समयबद्ध आंकड़े में राज्य की मांग 15,948 मेगावाट थी। उस समय सौर ऊर्जा का योगदान 3,748 मेगावाट, पवन ऊर्जा 802 मेगावाट और जलविद्युत 988 मेगावाट था। केंद्रीय उत्पादन केंद्रों से 6,384 मेगावाट बिजली ली जा रही थी।

मेंटेनेंस के नाम पर बिजली बंद होने की शिकायत

राज्य में उपभोक्ताओं और किसानों की ओर से बिजली कटौती की शिकायतें बढ़ी हैं। वहीं अधिकारियों का कहना है कि कुछ क्षेत्रों में रखरखाव कार्य के लिए निर्धारित समय तक बिजली आपूर्ति रोकना आवश्यक होता है।

ऊर्जा विभाग से जुड़े अधिकारियों के अनुसार बिजली की मौजूदा उपलब्धता और मांग के बीच अंतर के कारण स्थिति चुनौतीपूर्ण है। इसी बीच हुबली में लगातार बिजली कटौती के विरोध में कर्नाटक रक्षणा वेदिके ने 21 सितंबर को प्रदर्शन भी किया। प्रदर्शनकारियों ने बिजली आपूर्ति को स्थिर करने की मांग की।

किसानों की परेशानी भी बढ़ी

कम बारिश के कारण किसानों को सिंचाई के लिए पंप सेट का अधिक इस्तेमाल करना पड़ रहा है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली की मांग बढ़ी है।

रिपोर्टों के मुताबिक बिजली की कमी के बीच कृषि पंप सेटों को दी जाने वाली दैनिक बिजली आपूर्ति कुछ क्षेत्रों में सात घंटे से घटाकर छह घंटे किए जाने की शिकायत भी सामने आई है। किसानों का कहना है कि शिफ्ट में बिजली मिलने के कारण उन्हें फसलों की सिंचाई के लिए रात में भी खेतों में जाना पड़ रहा है।

कम बारिश की स्थिति में यही समस्या और गंभीर हो सकती है, क्योंकि सिंचाई के लिए भूजल और पंप सेट पर निर्भरता बढ़ जाती है।

आने वाले दिनों पर नजर

कर्नाटक की बिजली व्यवस्था के लिए आने वाले दिन महत्वपूर्ण होंगे। राज्य को एक साथ बढ़ती मांग, कमजोर मानसून, जलविद्युत उत्पादन की सीमाओं और पवन-सौर ऊर्जा की परिवर्तनशील प्रकृति से निपटना पड़ रहा है।

हालांकि मौसम विभाग ने राज्य के कई हिस्सों में आने वाले दिनों में भारी बारिश का पूर्वानुमान जारी किया है। यदि अच्छी बारिश होती है तो गर्मी से राहत मिलने के साथ बिजली की मांग पर कुछ दबाव कम हो सकता है। लंबे समय में जलाशयों की स्थिति में सुधार भी ऊर्जा क्षेत्र के लिए राहत का कारण बन सकता है।

फिलहाल राज्य में मांग और आपूर्ति के संतुलन को बनाए रखने के लिए थर्मल, जलविद्युत, सौर, पवन और केंद्रीय स्रोतों से मिलने वाली बिजली का समन्वय महत्वपूर्ण बना हुआ है। 11 सितंबर को दर्ज 20,094 मेगावाट की रिकॉर्ड मांग ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मौसम प्रतिकूल रहने पर कर्नाटक की बिजली व्यवस्था पर दबाव तेजी से बढ़ सकता है।

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