बेंगलुरु: कर्नाटक हाई कोर्ट ने सोमवार को शैक्षणिक संस्थानों और राज्य सरकार की नौकरियों में अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए बढ़ाए गए आरक्षण को रद्द कर दिया। बसवराज बोम्मई के नेतृत्व वाली तत्कालीन BJP सरकार ने यह आरक्षण बढ़ाया था, जिससे राज्य में कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से बढ़कर 56 प्रतिशत हो गया था।
चीफ जस्टिस विभु बखरू और जस्टिस के.एस. हेमलेखा की डिवीजन बेंच ने यह आदेश महेंद्र कुमार मित्रा द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए दिया। इस याचिका में कर्नाटक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (आरक्षण) अधिनियम, 2022 को चुनौती दी गई थी।
संशोधित कोटे के तहत, SC के लिए आरक्षण 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 17 प्रतिशत और ST के लिए तीन प्रतिशत से बढ़ाकर सात प्रतिशत कर दिया गया था। इन बदलावों से दोनों समुदायों के लिए संयुक्त आरक्षण 18 प्रतिशत से बढ़कर 24 प्रतिशत हो गया था।
यह बढ़ोतरी रिटायर्ड जस्टिस नागमोहन दास कमेटी की सिफारिशों पर आधारित थी। कमेटी ने संबंधित समुदायों की आबादी के अनुपात में कोटा बढ़ाने का प्रस्ताव दिया था। बाद में सर्वदलीय बैठक में इन सिफारिशों पर चर्चा हुई, जिसमें राजनीतिक दलों ने कथित तौर पर इन्हें लागू करने पर सहमति जताई थी।
राज्य कैबिनेट द्वारा प्रस्ताव को मंजूरी दिए जाने के बाद, बोम्मई के नेतृत्व वाली तत्कालीन BJP सरकार ने बढ़ोतरी को लागू करने के लिए एक अध्यादेश जारी किया था। गवर्नर ने अध्यादेश को मंजूरी दी और सरकार ने बाद में बढ़े हुए कोटे को औपचारिक रूप देने के लिए एक विशेष गजट नोटिफिकेशन जारी किया।
संशोधित नीति में अनुसूचित जातियों की 103 उप-जातियों और अनुसूचित जनजातियों के 56 उप-समूहों को शामिल किया गया था। इसका मकसद शिक्षा और राज्य सरकार की नौकरियों में उनके प्रतिनिधित्व को बेहतर बनाना था।
हाई कोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए, पूर्व मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने कर्नाटक सरकार से आग्रह किया कि वह रिट याचिका दायर करके सुप्रीम कोर्ट में इस आदेश को चुनौती दे।
बोम्मई ने कहा कि बढ़ा हुआ कोटा जस्टिस नागमोहन दास कमेटी की रिपोर्ट पर आधारित था और इसे केवल प्रशासनिक आदेश के बजाय राज्य विधानसभा के दोनों सदनों द्वारा पारित कानून के माध्यम से लागू किया गया था। उन्होंने तमिलनाडु और छत्तीसगढ़ का उदाहरण दिया, जहाँ आरक्षण का स्तर 50 प्रतिशत से ज़्यादा है, और कहा कि राज्य सरकार को राहत पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर सरकार इस फ़ैसले को चुनौती नहीं देती है, तो वे खुद यह मामला सुप्रीम कोर्ट ले जाएँगे।