बेंगलुरु। कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता पर बात करते हुए समाज में बेटे को प्राथमिकता देने वाली सोच पर सवाल उठाया है। बेंगलुरु में महिला उद्यमियों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने पूछा कि जब महिलाएं बराबरी और आत्मनिर्भरता की बात करती हैं तो फिर कई परिवारों में पहले बच्चे के रूप में बेटे की इच्छा क्यों रहती है। उन्होंने महिलाओं से इस सोच के पीछे के कारणों पर विचार करने की अपील की।

डी.के. शिवकुमार बेंगलुरु में महिला उद्यमियों के 'लेट्स ग्रो टुगेदर' सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिला उद्यमियों और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी महिलाओं ने भाग लिया। इस दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, आत्मनिर्भरता, उद्यमिता और समाज में महिलाओं की भूमिका को लेकर अपनी बात रखी।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए शिवकुमार ने कहा, “मैं महिलाओं से एक सवाल पूछना चाहता हूं। आप बराबरी और आत्मनिर्भरता की बात करती हैं। लेकिन जब बच्चा पैदा होता है, तो आप चाहती हैं कि पहला बच्चा लड़का ही हो। ऐसी सोच क्यों है?”

उन्होंने आगे अपने परिवार का उदाहरण देते हुए कहा कि उनकी भी दो बेटियां और एक बेटा है। उन्होंने कहा, “मेरी भी दो बेटियां और एक बेटा है, लेकिन मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहता हूं। मुझे समझ नहीं आता कि भारत के हर कोने में महिलाएं क्यों चाहती हैं कि उनका पहला बच्चा लड़का हो। आपको मुझे इसका जवाब देना होगा।”

शिवकुमार के इस सवाल का केंद्र समाज में लंबे समय से चली आ रही बेटे और बेटी के बीच भेदभाव की मानसिकता रही। उन्होंने महिला उद्यमियों के मंच से यह मुद्दा उठाते हुए बराबरी की अवधारणा को केवल आर्थिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं रखने की बात कही। उनका संदेश था कि लैंगिक समानता को परिवार और समाज के स्तर पर भी व्यवहार में उतारना जरूरी है।

भारत में महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और कारोबार में भागीदारी लगातार बढ़ी है। बड़ी संख्या में महिलाएं अपना व्यवसाय शुरू कर रही हैं और रोजगार देने वाली उद्यमी के रूप में सामने आ रही हैं। इसके बावजूद कई सामाजिक मान्यताओं और पारंपरिक सोच को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। बेटे को परिवार का उत्तराधिकारी मानने जैसी धारणाएं भी इसी सामाजिक बहस का हिस्सा रही हैं।

महिला उद्यमियों के बीच इस विषय को उठाते हुए शिवकुमार ने आत्मनिर्भरता और समानता को एक-दूसरे से जोड़कर देखने पर जोर दिया। उन्होंने सवाल किया कि यदि समाज वास्तव में महिला और पुरुष को बराबर मानता है तो संतान के जन्म के समय लड़के और लड़की के बीच प्राथमिकता का सवाल क्यों पैदा होना चाहिए।

कार्यक्रम 'टुगेदर वी ग्रो, लेट्स ग्रो टुगेदर' की थीम के साथ आयोजित किया गया था। इसका उद्देश्य महिला उद्यमियों को एक मंच पर लाना और उनके बीच सहयोग, नेटवर्किंग तथा व्यावसायिक अवसरों को बढ़ावा देना था। कार्यक्रम के दौरान महिला उद्यमिता से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई।

शिवकुमार ने महिला उद्यमियों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि आर्थिक रूप से मजबूत और आत्मनिर्भर महिलाएं समाज के विकास में बड़ी भूमिका निभाती हैं। महिलाएं जब कारोबार शुरू करती हैं तो वे केवल अपने लिए आर्थिक अवसर पैदा नहीं करतीं, बल्कि दूसरे लोगों के लिए भी रोजगार के रास्ते खोलती हैं।

उनका कहना था कि महिला सशक्तिकरण का वास्तविक अर्थ महिलाओं को निर्णय लेने की क्षमता और समान अवसर उपलब्ध कराना है। परिवार, शिक्षा, व्यवसाय और सामाजिक जीवन में महिलाओं को बराबरी का स्थान मिलने से ही व्यापक बदलाव संभव होगा।

शिवकुमार के बयान ने लैंगिक समानता के साथ सामाजिक मानसिकता के सवाल को भी सामने ला दिया है। उन्होंने महिलाओं से सीधे संवाद करते हुए पूछा कि आखिर ऐसी कौन सी सामाजिक या पारिवारिक वजहें हैं जिनके कारण आज भी कई लोगों के मन में पहले बच्चे के रूप में बेटे की इच्छा रहती है।

बेटियों को लेकर समाज की सोच में पिछले कुछ दशकों में बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। शिक्षा, खेल, विज्ञान, प्रशासन, राजनीति, उद्योग और कारोबार समेत लगभग हर क्षेत्र में महिलाओं ने अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है। इसके बावजूद लैंगिक समानता को लेकर सामाजिक स्तर पर अभी भी व्यापक जागरूकता की जरूरत महसूस की जाती है।

महिला उद्यमियों के सम्मेलन में उठाया गया यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वहां मौजूद महिलाएं आर्थिक आत्मनिर्भरता और नेतृत्व का प्रतिनिधित्व कर रही थीं। शिवकुमार ने इसी संदर्भ में उनसे सामाजिक सोच में बदलाव का नेतृत्व करने की अपेक्षा जताई।

उन्होंने अपने परिवार का उदाहरण देकर यह बताने की कोशिश की कि बेटा और बेटी दोनों को समान दृष्टि से देखा जाना चाहिए। दो बेटियों और एक बेटे का उल्लेख करते हुए उन्होंने महिलाओं से अपने सवाल का जवाब मांगकर कार्यक्रम में मौजूद लोगों को इस विषय पर सोचने के लिए प्रेरित किया।

महिला उद्यमिता के बढ़ते दायरे के बीच सामाजिक समानता का मुद्दा भी महत्वपूर्ण बना हुआ है। केवल महिलाओं को रोजगार या कारोबार के अवसर उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नहीं माना जा सकता, बल्कि परिवार और समाज में बेटियों को समान महत्व और अवसर देना भी महिला सशक्तिकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

डी.के. शिवकुमार के संबोधन का प्रमुख संदेश यही रहा कि आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ सामाजिक सोच में बदलाव भी जरूरी है। महिला उद्यमियों के मंच से उन्होंने बेटे को प्राथमिकता देने वाली मानसिकता पर सवाल उठाते हुए कहा कि समानता की शुरुआत परिवार से होनी चाहिए। अब उनका यह सवाल महिला सशक्तिकरण और समाज में बेटे-बेटी की बराबरी को लेकर नई चर्चा को जन्म दे सकता है।

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