बेंगलुरु। कर्नाटक रूरल इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट लिमिटेड (KRIDL) में कथित भ्रष्टाचार और ठेकेदारों से रिश्वत मांगने के आरोपों को लेकर राज्य सरकार ने उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। पुत्तूर से कांग्रेस विधायक के. अशोक कुमार राय की शिकायत के बाद यह कार्रवाई की गई है। विधायक ने आरोप लगाया है कि KRIDL के दो इंजीनियरों ने मंत्रियों के नाम का इस्तेमाल करते हुए सरकारी काम करने वाले ठेकेदारों से पैसे की मांग की और उन्हें परेशान किया। हालांकि KRIDL ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा है कि उसके स्तर पर कोई अनियमितता नहीं हुई है।

मामले को गंभीरता से लेते हुए ग्रामीण विकास और पंचायत राज विभाग की ओर से उच्चस्तरीय जांच कराने का फैसला किया गया है। जांच के जरिए अधिकारियों पर लगाए गए आरोपों और ठेकेदारों से कथित तौर पर पैसे मांगे जाने के दावों की सत्यता का पता लगाया जाएगा।

पुत्तूर के कांग्रेस विधायक के. अशोक कुमार राय ने मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार को पत्र लिखकर पूरे मामले की शिकायत की है। उन्होंने KRIDL के मैंगलोर डिवीजन के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर विजय और जूनियर इंजीनियर प्रज्वल के कामकाज की विभागीय जांच कराने की मांग की है।

विधायक ने अपने पत्र में दावा किया कि सरकारी परियोजनाओं से जुड़े कई ठेकेदारों ने दोनों अधिकारियों के खिलाफ शिकायतें की हैं। आरोप है कि ठेकेदारों को परेशान किया गया, उन्हें धमकियां दी गईं और उनसे कथित तौर पर गैर-कानूनी रकम की मांग की गई।

राय ने दावा किया कि संबंधित अधिकारियों ने मंत्रियों के नाम का इस्तेमाल करते हुए ठेकेदारों पर पैसे देने का दबाव बनाया। इन आरोपों के सामने आने के बाद मामला राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। सत्तारूढ़ कांग्रेस के ही विधायक द्वारा शिकायत किए जाने के कारण सरकार ने इसे गंभीरता से लिया है।

विधायक ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली की विभागीय स्तर पर विस्तृत जांच की मांग की है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि ठेकेदारों की ओर से की गई शिकायतों में कितनी सच्चाई है। उन्होंने कथित उत्पीड़न और अवैध पैसे की मांग से जुड़े मामलों की भी जांच कराने को कहा है।

दूसरी ओर KRIDL ने अपने ऊपर लगाए जा रहे अनियमितता के आरोपों को खारिज किया है। एजेंसी ने विशेष रूप से सात प्रतिशत कटौती से जुड़े आरोपों पर स्पष्टीकरण दिया है। KRIDL के अनुसार, जिस सात प्रतिशत राशि को कथित तौर पर गैर-कानूनी वसूली के रूप में पेश किया जा रहा है, वह वास्तव में आधिकारिक प्रशासनिक शुल्क है।

एजेंसी ने कहा कि निर्धारित प्रशासनिक शुल्क को रिश्वत या अवैध फीस के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। KRIDL का कहना है कि उसकी प्रक्रियाओं में किसी तरह की गड़बड़ी नहीं हुई है और सात प्रतिशत की कटौती नियमों के तहत की जाने वाली प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

ऐसे में जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी होगा कि ठेकेदारों से ली जाने वाली रकम आधिकारिक प्रशासनिक शुल्क तक सीमित थी या इसके अतिरिक्त भी किसी तरह के भुगतान की मांग की गई थी। विधायक के आरोप दो अधिकारियों के व्यक्तिगत आचरण पर केंद्रित हैं, जबकि एजेंसी ने संस्थागत प्रक्रिया का बचाव किया है।

मामले में उच्चस्तरीय जांच के आदेश के बाद अब संबंधित दस्तावेजों, भुगतान से जुड़े रिकॉर्ड और ठेकेदारों की शिकायतों की जांच किए जाने की संभावना है। शिकायतकर्ताओं के बयान भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। यदि मंत्रियों के नाम पर पैसे मांगने के आरोप लगाए गए हैं तो जांच में यह भी स्पष्ट करना होगा कि ऐसा कोई दावा वास्तव में किया गया था या नहीं।

KRIDL राज्य में ग्रामीण बुनियादी ढांचे से जुड़े विभिन्न विकास कार्यों को लागू करने वाली महत्वपूर्ण एजेंसी है। ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी निर्माण और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी परियोजनाओं में इसकी भूमिका होने के कारण अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप गंभीर माने जा रहे हैं।

सरकारी विकास कार्यों में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए टेंडर, भुगतान, प्रशासनिक शुल्क और ठेकेदारों से जुड़े नियमों का पालन महत्वपूर्ण होता है। यदि किसी अधिकारी द्वारा निर्धारित सरकारी शुल्क से अलग रकम मांगी जाती है तो वह जांच का विषय बन सकती है। यही कारण है कि सरकार ने शिकायत मिलने के बाद उच्चस्तरीय जांच कराने का रास्ता चुना है।

इस मामले की एक खास बात यह है कि आरोप विपक्षी दल की तरफ से नहीं बल्कि सत्तारूढ़ कांग्रेस के विधायक की ओर से लगाए गए हैं। अशोक कुमार राय ने सीधे मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर विभागीय जांच की मांग की है। इससे मामला सरकार के लिए भी महत्वपूर्ण हो गया है।

अब जांच में यह देखा जाएगा कि मैंगलोर डिवीजन के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर विजय और जूनियर इंजीनियर प्रज्वल के खिलाफ ठेकेदारों की कथित शिकायतों का आधार क्या है। आरोपों की पुष्टि के लिए दस्तावेजी और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण किया जा सकता है।

वहीं KRIDL की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण की भी जांच के दौरान समीक्षा की जा सकती है। एजेंसी का दावा है कि सात प्रतिशत की कटौती पूरी तरह वैध और आधिकारिक प्रशासनिक शुल्क है। ऐसे में जांच के बाद ही यह साफ हो सकेगा कि विवाद केवल निर्धारित शुल्क को लेकर पैदा हुआ है या अधिकारियों द्वारा इसके अतिरिक्त रकम मांगने के आरोपों में भी कोई तथ्य है।

फिलहाल उच्चस्तरीय जांच के आदेश के बाद KRIDL से जुड़ा यह मामला सुर्खियों में आ गया है। एक तरफ कांग्रेस विधायक ने ठेकेदारों को परेशान करने, धमकाने और मंत्रियों के नाम पर पैसे मांगने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं, वहीं दूसरी तरफ एजेंसी ने किसी भी तरह की गड़बड़ी से इनकार किया है। अब जांच रिपोर्ट से ही आरोपों की वास्तविकता स्पष्ट होने की उम्मीद है।

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