बेंगलुरु। कर्नाटक में किसानों को दिए जाने वाले फसल ऋण में पिछले पांच वर्षों के दौरान उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। स्टेट लेवल बैंकर्स कमेटी (SLBC) के आंकड़ों के मुताबिक सरकारी, वाणिज्यिक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की ओर से दिए गए फसल ऋण में करीब 45 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। पांच वर्षों के आंकड़ों के विश्लेषण में सामने आया है कि राज्य में किसानों को फसल ऋण उपलब्ध कराने के मामले में केनरा बैंक सबसे आगे है।
केनरा बैंक कर्नाटक की SLBC का संयोजक भी है। उसके बाद कर्नाटक ग्रामीण बैंक, कर्नाटक स्टेट को-ऑपरेटिव एपेक्स बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) प्रमुख फसल ऋण प्रदाताओं में शामिल हैं।
फसल ऋण में हुई वृद्धि कृषि क्षेत्र में संस्थागत कर्ज की बढ़ती भूमिका को दिखाती है। खेती के लिए बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरी, सिंचाई और अन्य जरूरी खर्चों को पूरा करने के लिए किसान बैंकों से फसल ऋण लेते हैं।
पांच वर्षों में करीब 45 प्रतिशत की बढ़ोतरी
SLBC के पिछले पांच साल के आंकड़ों के विश्लेषण के अनुसार कर्नाटक में फसल ऋण वितरण लगातार बढ़ा है। सरकारी बैंकों के साथ वाणिज्यिक बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक और सहकारी बैंक किसानों को कृषि जरूरतों के लिए ऋण उपलब्ध करा रहे हैं।
आंकड़ों के मुताबिक पांच साल की अवधि में फसल ऋण में लगभग 45 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इससे पता चलता है कि कृषि वित्तपोषण में औपचारिक बैंकिंग प्रणाली की भागीदारी बढ़ रही है।
किसानों के लिए समय पर कर्ज की उपलब्धता महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि कृषि उत्पादन का बड़ा हिस्सा मौसम और फसल चक्र पर निर्भर करता है। बुआई के समय किसानों को एक साथ कई प्रकार के खर्च करने पड़ते हैं।
केनरा बैंक सबसे आगे
SLBC के आंकड़ों में केनरा बैंक कर्नाटक में सबसे ज्यादा फसल ऋण देने वाला बैंक बनकर सामने आया है। बैंक राज्य के विभिन्न जिलों में अपनी शाखाओं के माध्यम से किसानों को कृषि ऋण उपलब्ध करा रहा है।
केनरा बैंक SLBC का संयोजक भी है। SLBC के माध्यम से राज्य सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक, नाबार्ड और विभिन्न बैंकों के बीच राज्य की बैंकिंग तथा ऋण संबंधी योजनाओं को लेकर समन्वय किया जाता है।
कृषि क्षेत्र में ऋण वितरण की समीक्षा भी इस व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
दूसरे स्थान पर कर्नाटक ग्रामीण बैंक
फसल ऋण वितरण के मामले में कर्नाटक ग्रामीण बैंक दूसरे स्थान पर है। ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक की पहुंच के कारण कृषि ऋण उपलब्ध कराने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि, छोटे किसानों और ग्रामीण कारोबार को वित्तीय सेवाएं उपलब्ध कराना है। ऐसे में फसल ऋण इनके प्रमुख ऋण उत्पादों में शामिल रहता है।
कर्नाटक के बड़ी संख्या में किसान खेती से जुड़े मौसमी खर्चों के लिए ग्रामीण बैंकिंग नेटवर्क पर निर्भर रहते हैं।
सहकारी बैंक की भी बड़ी हिस्सेदारी
कर्नाटक स्टेट को-ऑपरेटिव एपेक्स बैंक भी राज्य में फसल ऋण उपलब्ध कराने वाले प्रमुख संस्थानों में शामिल है। सहकारी बैंकिंग प्रणाली लंबे समय से कृषि क्षेत्र में कर्ज उपलब्ध कराने का महत्वपूर्ण माध्यम रही है।
राज्य और जिला स्तर के सहकारी बैंक तथा प्राथमिक कृषि ऋण समितियां ग्रामीण इलाकों में किसानों तक वित्तीय सेवाएं पहुंचाने में भूमिका निभाती हैं।
विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के लिए स्थानीय स्तर पर उपलब्ध बैंकिंग नेटवर्क महत्वपूर्ण होता है।
बैंक ऑफ बड़ौदा और SBI भी प्रमुख ऋणदाता
SLBC के पांच वर्षों के आंकड़ों में बैंक ऑफ बड़ौदा और भारतीय स्टेट बैंक भी फसल ऋण देने वाले प्रमुख बैंकों में शामिल हैं।
इन बैंकों का राज्य में व्यापक शाखा नेटवर्क है। कृषि क्षेत्र के लिए विभिन्न ऋण योजनाओं के माध्यम से किसान अपनी मौसमी जरूरतों के लिए वित्तीय सहायता प्राप्त कर सकते हैं।
फसल ऋण सामान्य तौर पर खेती की अल्पकालिक जरूरतों के लिए दिया जाता है। इसमें बीज खरीदने से लेकर खाद, कृषि उपकरणों के उपयोग, मजदूरी और फसल उत्पादन से संबंधित अन्य खर्च शामिल हो सकते हैं।
खेती की बढ़ती लागत भी एक कारण
फसल ऋण में वृद्धि को केवल अधिक किसानों के बैंकिंग व्यवस्था से जुड़ने के रूप में नहीं देखा जा सकता। पिछले कुछ वर्षों में खेती की लागत में बदलाव भी ऋण की जरूरत को प्रभावित कर सकता है।
बीज, उर्वरक, कृषि मजदूरी, मशीनों के किराए, डीजल और सिंचाई जैसे खर्च किसानों की उत्पादन लागत का बड़ा हिस्सा हैं।
जब खेती की लागत बढ़ती है तो किसानों की कार्यशील पूंजी की जरूरत भी बढ़ती है। ऐसे में बैंकों से मिलने वाला फसल ऋण कृषि गतिविधियों को जारी रखने में मददगार बनता है।
हालांकि केवल ऋण वितरण में वृद्धि से किसानों की आर्थिक स्थिति के बारे में कोई सीधा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए आय, उत्पादन लागत, फसल की कीमत, ऋण अदायगी और अन्य आर्थिक संकेतकों को भी देखना जरूरी है।
संस्थागत कर्ज का महत्व
कृषि क्षेत्र में संस्थागत ऋण की उपलब्धता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे किसानों को अनौपचारिक स्रोतों से ऊंची ब्याज दरों पर कर्ज लेने की जरूरत कम हो सकती है।
बैंकिंग व्यवस्था के जरिए मिलने वाले ऋण में तय नियम, ब्याज दर और भुगतान की शर्तें होती हैं। किसान क्रेडिट कार्ड जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से भी पात्र किसानों को कृषि जरूरतों के लिए कर्ज उपलब्ध कराया जाता है।
समय पर ऋण मिलने से किसान बुआई और दूसरी कृषि गतिविधियों को निर्धारित समय पर पूरा कर सकते हैं।
छोटे किसानों तक कर्ज पहुंचाना चुनौती
फसल ऋण का कुल वितरण बढ़ने के बावजूद यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि बैंकिंग सुविधाओं का लाभ छोटे और सीमांत किसानों तक भी पहुंचे।
ग्रामीण क्षेत्रों में दस्तावेज, भूमि रिकॉर्ड, बैंक शाखाओं तक पहुंच और वित्तीय जानकारी जैसे मुद्दे किसानों के लिए चुनौती बन सकते हैं।
इसलिए बैंकिंग संस्थानों और प्रशासन के सामने कृषि ऋण को सरल और सुलभ बनाने की जिम्मेदारी भी रहती है।
SLBC करता है बैंकिंग गतिविधियों की समीक्षा
स्टेट लेवल बैंकर्स कमेटी राज्य में बैंकिंग क्षेत्र से जुड़ी विभिन्न गतिविधियों की नियमित समीक्षा करती है। इसमें कृषि, छोटे उद्योग, शिक्षा, आवास और अन्य प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में ऋण वितरण की स्थिति शामिल होती है।
कृषि ऋण से जुड़े आंकड़े सरकार और बैंकों को यह समझने में मदद करते हैं कि किन क्षेत्रों में कर्ज की मांग बढ़ रही है और किन इलाकों में बैंकिंग नेटवर्क को मजबूत करने की जरूरत है।
कर्नाटक में पिछले पांच वर्षों में फसल ऋण में करीब 45 प्रतिशत की वृद्धि कृषि वित्तपोषण के बढ़ते आकार को दर्शाती है। केनरा बैंक इस मामले में सबसे आगे है, जबकि कर्नाटक ग्रामीण बैंक, कर्नाटक स्टेट को-ऑपरेटिव एपेक्स बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा और SBI भी किसानों को फसल ऋण उपलब्ध कराने वाले प्रमुख संस्थानों में शामिल हैं।