किश्तवाड़। जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले के चिसोटी में पिछले साल आई अचानक बाढ़ की त्रासदी को एक साल पूरा होने जा रहा है, लेकिन 30 परिवारों के लिए यह हादसा आज भी खत्म नहीं हुआ है। हादसे में लापता हुए लोगों के परिवार आज भी किसी पक्की जानकारी, शव की बरामदगी या अंतिम संस्कार के इंतजार में हैं। उनके लिए अपनों की तलाश अब एक ऐसी पीड़ा बन चुकी है, जिसका कोई स्पष्ट अंत नजर नहीं आ रहा।
मचैल माता मंदिर की वार्षिक तीर्थयात्रा के दौरान 14 अगस्त 2025 को चिसोटी में अचानक आई बाढ़ ने भारी तबाही मचाई थी। चिसोटी जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले में मचैल माता मंदिर की ओर जाने वाले मार्ग पर पड़ने वाला आखिरी मोटर-योग्य गांव है। तीर्थयात्रा के कारण उस समय इलाके में बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे। अचानक आई बाढ़ ने कुछ ही समय में कई लोगों को अपनी चपेट में ले लिया और पूरे इलाके में तबाही का मंजर दिखाई दिया।
जम्मू के एक्टिविस्ट रमन कुमार शर्मा को किश्तवाड़ जिला प्रशासन की ओर से सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मिली जानकारी के मुताबिक, इस प्राकृतिक आपदा में 63 लोगों की मौत हुई, जबकि 127 लोग घायल हुए। हालांकि, मृतकों की संख्या के बावजूद कई परिवारों के लिए यह त्रासदी अभी भी अधूरी है, क्योंकि 30 लोग अब तक लापता बताए जा रहे हैं।
30 लोगों का अब तक पता नहीं
प्रशासन से मिली जानकारी के अनुसार, लापता लोगों में 27 तीर्थयात्री और चिसोटी गांव के तीन निवासी शामिल हैं। इन लोगों के परिवारों के पास आज भी अपने प्रियजनों के बारे में कोई निश्चित जानकारी नहीं है। कई मामलों में परिवारों के पास केवल इतना प्रमाण है कि संबंधित व्यक्ति सरकारी रिकॉर्ड में लापता लोगों की सूची में दर्ज है।
परिजनों के लिए सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि उन्हें अपने प्रियजनों का अंतिम दर्शन तक नहीं मिल सका। किसी शव की बरामदगी नहीं होने के कारण अंतिम संस्कार की प्रक्रिया भी संभव नहीं हुई। इस स्थिति ने परिवारों के दुख को और लंबा कर दिया है।
किसी प्राकृतिक आपदा में जब शव बरामद हो जाता है, तो परिवार अंतिम संस्कार और धार्मिक परंपराओं के जरिए अपने प्रियजन को विदाई दे पाता है। लेकिन चिसोटी के इन परिवारों के लिए यह अवसर भी नहीं आया। उनके सामने आज भी अनिश्चितता है कि उनके अपने कहां हैं और वास्तव में उनके साथ क्या हुआ।
तीर्थयात्रा के दौरान मची थी तबाही
14 अगस्त 2025 को चिसोटी में अचानक आई बाढ़ ने मचैल माता मंदिर की यात्रा को भयावह त्रासदी में बदल दिया था। चिसोटी मंदिर तक पहुंचने वाले मार्ग का महत्वपूर्ण पड़ाव होने के कारण तीर्थयात्रियों के लिए काफी अहम स्थान है। वार्षिक यात्रा के दौरान यहां श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है।
अचानक आई बाढ़ की तीव्रता इतनी अधिक थी कि लोगों को संभलने और सुरक्षित स्थानों पर पहुंचने का पर्याप्त मौका नहीं मिल पाया। बाढ़ के पानी और मलबे ने इलाके में भारी नुकसान पहुंचाया। बड़ी संख्या में लोग इसकी चपेट में आए और कई लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी।
घटना के बाद राहत और बचाव दलों ने लापता लोगों की तलाश के लिए अभियान चलाया। प्रभावित क्षेत्र में मलबे और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण तलाशी अभियान चुनौतीपूर्ण रहा। समय बीतने के साथ कई परिवारों को अपने लापता परिजनों के मिलने की उम्मीद कमजोर होती गई, लेकिन आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज 30 लोगों की स्थिति अब भी स्पष्ट नहीं है।
परिवारों के लिए खत्म नहीं हुआ इंतजार
लापता लोगों के परिवारों की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि वे न तो पूरी तरह यह स्वीकार कर पा रहे हैं कि उनके प्रियजन अब इस दुनिया में नहीं हैं और न ही उनके जीवित होने की कोई ठोस उम्मीद उनके पास है। यह अनिश्चितता उन्हें लगातार मानसिक और भावनात्मक तनाव में रखती है।
कई परिवारों के लिए सरकारी सूची में नाम दर्ज होना ही उनके प्रियजन से जुड़ी अंतिम आधिकारिक जानकारी है। न शव मिला, न घटनास्थल से कोई ऐसी वस्तु बरामद हुई जिससे स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो सके। ऐसे में परिवारों के लिए हर गुजरता दिन इंतजार और उम्मीद के बीच बीतता है।
स्थानीय निवासियों पर भी पड़ा असर
चिसोटी में इस हादसे का असर केवल तीर्थयात्रियों के परिवारों तक सीमित नहीं रहा। गांव के तीन स्थानीय निवासी भी अब तक लापता बताए जा रहे हैं। अचानक आई बाढ़ ने स्थानीय समुदाय को भी गहरे सदमे में डाल दिया था।
चिसोटी मचैल माता मंदिर की यात्रा के लिहाज से महत्वपूर्ण गांव है और स्थानीय अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा तीर्थयात्रियों की आवाजाही से जुड़ा रहता है। आपदा ने स्थानीय लोगों के जीवन और क्षेत्र की सामान्य गतिविधियों को भी प्रभावित किया।
प्रशासनिक आंकड़ों ने सामने लाई तस्वीर
RTI के जरिए सामने आए आंकड़े चिसोटी त्रासदी की गंभीरता को स्पष्ट करते हैं। 63 मौतें, 127 घायल और 30 लोग अब भी लापता—ये आंकड़े बताते हैं कि हादसे का असर कितना व्यापक था। खास बात यह है कि लापता लोगों की संख्या अभी भी इतनी अधिक है कि कई परिवारों के लिए आपदा का अध्याय बंद नहीं हो पाया है।
एक साल के करीब समय बीतने के बाद भी लापता लोगों की स्थिति स्पष्ट नहीं होना परिजनों की चिंता को और बढ़ाता है। उनके लिए सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज एक नाम पर्याप्त जवाब नहीं है। वे अपने प्रियजनों के बारे में निश्चित जानकारी चाहते हैं, ताकि वर्षों से चले आ रहे इंतजार को किसी निष्कर्ष तक पहुंचाया जा सके।
यादों में आज भी जिंदा है हादसा
चिसोटी में आई बाढ़ ने जिन परिवारों को अपनों से दूर कर दिया, उनके लिए 14 अगस्त 2025 की घटना आज भी ताजा है। प्राकृतिक आपदा का वह दिन उनके जीवन में ऐसा खालीपन छोड़ गया, जिसे समय भी भर नहीं सका।
30 लापता लोगों के परिवार आज भी इस उम्मीद में हैं कि उन्हें अपने प्रियजनों के बारे में कोई ठोस जानकारी मिलेगी। उनके लिए त्रासदी का अंत तभी होगा, जब उन्हें यह निश्चित रूप से पता चले कि उनके अपने कहां हैं और उनके साथ क्या हुआ।
चिसोटी की बाढ़ ने जहां 63 लोगों की जान ली और 127 लोगों को घायल किया, वहीं 30 परिवारों को ऐसी अनिश्चितता में छोड़ दिया, जिसका कोई स्पष्ट अंत अब तक सामने नहीं आया है। उनके पास न अंतिम विदाई की स्मृति है, न अंतिम संस्कार का अवसर—सिर्फ इंतजार है और सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज एक लापता नाम।