Nurpur मत्स्य विभाग ने पोंग जलाशय (जिसे महाराणा प्रताप सागर के नाम से भी जाना जाता है) में मछली स्टॉक करने का एक अभियान शुरू किया है। इसका लक्ष्य 17 लाख मछली के बीज (बच्चे) छोड़ना है, ताकि उत्पादन बढ़ाया जा सके और जलाशय पर निर्भर लगभग 3,600 मछुआरों के परिवारों की आजीविका को सहारा मिल सके। सोमवार तक 12.95 लाख से अधिक मछली के बीज छोड़े जा चुके थे।
इस अभियान के तहत, विभाग चार प्रजातियों की मछलियों को जलाशय में डालने की योजना बना रहा है — 5 लाख कतला, 1 लाख मोरी, 7.25 लाख रोहू और 3.75 लाख ग्रास कार्प। छोड़े जा रहे मछली के बीजों का आकार 70 मिमी से अधिक है। मत्स्य विभाग के सहायक निदेशक संदीप कुमार ने बताया कि मछली के बीजों की गुणवत्ता और तकनीकी मानकों के पालन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। मत्स्य विभाग के संयुक्त निदेशक पवन कुमार की अध्यक्षता वाली एक समिति इस अभियान की निगरानी कर रही है।
विभाग का फील्ड स्टाफ और स्थानीय मत्स्य सहकारी समितियों के सदस्य व पदाधिकारी मिलकर इस काम को अंजाम दे रहे हैं। संदीप कुमार ने कहा, "जलाशय के किनारे स्थित सिहल और जंबल बस्सी को मछली छोड़ने के स्थानों के रूप में चुना गया है। यह पहल स्थानीय मछुआरा समुदाय के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह जलाशय मछली पकड़ने पर निर्भर हजारों परिवारों की आजीविका का आधार है। हालांकि, इसके दीर्घकालिक फायदे इस बात पर निर्भर करेंगे कि छोड़ी गई मछलियां कितनी जीवित रहती हैं और कितनी बढ़ती हैं, साथ ही पर्यावरण की स्थिति कैसी रहती है और मछली पकड़ने के तरीके कितने टिकाऊ हैं।"
लगभग 24,000 हेक्टेयर में फैला पोंग जलाशय करीब 42 किमी लंबा और 19 किमी चौड़ा है। यह कांगड़ा जिले की निचली पहाड़ियों में मछली पालन का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, जो मछली पकड़ने की गतिविधियों और स्थानीय अर्थव्यवस्था को सहारा देता है। हालांकि, विभाग के आंकड़े बताते हैं कि पिछले दो वर्षों की तुलना में इस बार मछली स्टॉक करने की संख्या में भारी कमी आई है। विभाग ने 2024 में 65 लाख और 2025 में 62.52 लाख मछली के बीज छोड़े थे, जबकि इस साल का लक्ष्य 17 लाख बीज छोड़ने का है। इस भारी गिरावट से सवाल उठता है कि मछली स्टॉक करने के लक्ष्य में कमी के पीछे क्या कारण हैं, और इसका मछली उत्पादन तथा मछुआरों की कमाई पर क्या असर पड़ सकता है। माना जा रहा है कि इस साल मछली स्टॉक करने के लक्ष्य में कमी के पीछे मत्स्य विभाग का घटा हुआ बजट और दो महीने के 'ऑफ-सीज़न' (बंद मौसम) के दौरान मछलियों का प्राकृतिक प्रजनन मुख्य कारण हैं। खबरों के अनुसार, विभाग ने इस साल मछली उत्पादन का लक्ष्य 346.32 मीट्रिक टन तय किया है।
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