NHM कर्मचारी की सेवा समाप्ति पर हाईकोर्ट ने लगाई रोक

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Update: 2026-05-16 13:02 GMT
Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के अंतर्गत कार्यरत एकाउंटेंट हरनारायण कुम्भकार की सेवा समाप्ति के आदेश को निरस्त करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना कारण बताओ नोटिस और बिना सुनवाई का अवसर दिए किसी कर्मचारी की सेवा समाप्त करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। यह मामला राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, जिला कोरबा से जुड़ा है, जहां
याचिकाकर्ता
हरनारायण कुम्भकार एकाउंटेंट के पद पर कार्यरत थे। उनकी सेवाएं मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, कोरबा द्वारा 6 मई 2026 को समाप्त कर दी गई थीं। इस आदेश को चुनौती देते हुए उन्होंने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की थी।
मामले की सुनवाई जस्टिस बी.डी. गुरु की एकलपीठ में हुई। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्रीकांत कौशिक ने अदालत में पक्ष रखते हुए कहा कि सेवा समाप्ति से पहले न तो कोई कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और न ही उन्हें अपनी बात रखने का अवसर दिया गया। उन्होंने यह भी दलील दी कि एनएचएम की मानव संसाधन नीति-2018 के अनुसार किसी भी कर्मचारी की सेवा समाप्त करने से पहले उसे सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है।
याचिकाकर्ता पक्ष ने अपने तर्क के समर्थन में पूर्व में दिए गए न्यायिक निर्णयों का हवाला भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया। वहीं दूसरी ओर राज्य शासन और एनएचएम की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने सेवा समाप्ति आदेश का समर्थन करते हुए कहा कि संबंधित कर्मचारी को पहले कार्य सुधार के लिए नोटिस दिया गया था, लेकिन अपेक्षित सुधार नहीं हुआ, जिसके बाद सक्षम प्राधिकारी ने यह कार्रवाई की। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने रिकॉर्ड और दस्तावेजों का अवलोकन किया। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता को प्रभावी रूप से सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया और न ही आवश्यक प्रक्रिया का पालन किया गया। अदालत ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन माना।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में 6 मई 2026 को जारी सेवा समाप्ति आदेश को निरस्त करते हुए याचिका स्वीकार कर ली। इस फैसले को कर्मचारी अधिकारों और प्रशासनिक प्रक्रिया के पालन के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस निर्णय के बाद यह स्पष्ट किया गया है कि किसी भी सरकारी या संविदा कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई करते समय उचित प्रक्रिया, नोटिस और सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है, अन्यथा ऐसी कार्रवाई न्यायालय में टिक नहीं पाएगी।
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