Balaghat. बालाघाट। मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के बैगा आदिवासी अंचल में बारिश के मौसम के साथ बीमारी और संक्रमण का खतरा बढ़ गया है। मछुरदा, अडोरी, बोंदारी, कोरका और कुंडेकसा सहित कई बैगा बाहुल्य गांवों में मलेरिया, टायफाइड, डायरिया और त्वचा संक्रमण के मामले सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने अपनी निगरानी बढ़ा दी है। कुछ मासूमों की मौत के बाद स्थिति को लेकर चिंता और बढ़ गई है। प्रभावित गांवों में मेडिकल टीमों को भेजकर ग्रामीणों की जांच, उपचार और स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता का काम शुरू किया गया है।
स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, कुंडेकसा गांव बीमारी से सबसे अधिक प्रभावित बताया जा रहा है। यहां मरीजों की संख्या को देखते हुए सरकारी स्कूल में अस्थायी स्वास्थ्य केंद्र बनाया गया है, जहां स्वास्थ्यकर्मी ग्रामीणों और बच्चों की जांच कर रहे हैं। जरूरत के अनुसार मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराया जा रहा है। विभाग की टीमें प्रभावित गांवों में लगातार दौरा कर रही हैं और लोगों के स्वास्थ्य की निगरानी की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन बारिश के मौसम को देखते हुए सतर्कता बरती जा रही है।
बताया गया है कि प्रभावित क्षेत्रों में बुखार, दस्त, कमजोरी और संक्रमण से जुड़े लक्षण वाले मरीज सामने आए हैं। ग्रामीण इलाकों में बारिश के दौरान दूषित पानी, मच्छरों और साफ-सफाई की कमी से कई तरह की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग द्वारा ग्रामीणों को साफ पानी पीने, आसपास स्वच्छता रखने और बीमारी के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर तत्काल उपचार कराने की सलाह दी जा रही है। इस पूरे स्वास्थ्य संकट के बीच अंधविश्वास भी स्वास्थ्य विभाग के लिए बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है। बताया जा रहा है कि कुछ ग्रामीण परिवार बीमारी को देवी-देवताओं का प्रकोप मानकर अस्पताल जाने के बजाय पहले झाड़-फूंक और पारंपरिक उपचार का सहारा लेते हैं। इससे मरीजों को समय पर चिकित्सकीय उपचार नहीं मिल पाता और उनकी स्थिति गंभीर होने का खतरा बढ़ जाता है। हाल ही में बीमारी दूर करने के नाम पर मुर्गों की बलि दिए जाने की बात भी सामने आई है।
स्वास्थ्यकर्मी ग्रामीणों को लगातार समझा रहे हैं कि बुखार, उल्टी-दस्त, अत्यधिक कमजोरी, शरीर पर संक्रमण या अन्य गंभीर लक्षण दिखाई देने पर घरेलू उपचार या झाड़-फूंक में समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। मरीज को तत्काल नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल ले जाने की सलाह दी जा रही है। विभाग का कहना है कि समय पर इलाज मिलने से गंभीर स्थिति से बचा जा सकता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, प्रभावित क्षेत्रों से अब तक 96 बच्चों को गंभीर हालत में सिविल अस्पताल बैहर और जिला अस्पताल बालाघाट में भर्ती कराया गया। इनमें से 51 बच्चों को उपचार के बाद स्वस्थ होने पर अस्पताल से छुट्टी दी जा चुकी है, जबकि 45 बच्चों का इलाज अभी जारी है। स्वास्थ्य विभाग की टीमें प्रभावित गांवों में लगातार नजर बनाए हुए हैं।
हालांकि, कई मासूमों की मौत की जानकारी सामने आने के बाद क्षेत्र में चिंता का माहौल है। ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच, समय पर उपचार और बीमारी के प्रति जागरूकता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। दुर्गम बैगा क्षेत्रों में स्वास्थ्य अमले की नियमित मौजूदगी और मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाना इस समय बड़ी प्राथमिकता बनी हुई है। पूर्व सांसद कंकर मुंजारे ने भी प्रभावित गांवों का दौरा कर स्थिति का जायजा लिया है। उन्होंने बीमारी की गंभीरता को देखते हुए विशेष टास्क फोर्स गठित करने की मांग की है। साथ ही उन्होंने बीमारी के कारण जान गंवाने वाले बच्चों के परिवारों को मुआवजा देने की मांग भी उठाई है। उनका कहना है कि प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को और मजबूत करने की जरूरत है, ताकि बीमारी पर प्रभावी तरीके से नियंत्रण पाया जा सके।
फिलहाल स्वास्थ्य विभाग का मुख्य फोकस प्रभावित गांवों में मरीजों की पहचान, तत्काल उपचार, गंभीर मरीजों को अस्पताल पहुंचाने और ग्रामीणों को जागरूक करने पर है। मेडिकल टीमें गांव-गांव पहुंचकर स्वास्थ्य जांच कर रही हैं। साथ ही ग्रामीणों को बीमारी के लक्षणों और समय पर इलाज के महत्व के बारे में जानकारी दी जा रही है। बारिश के मौसम में संक्रमण का खतरा अभी बना हुआ है। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग की चुनौती केवल बीमारी पर नियंत्रण करना ही नहीं, बल्कि अंधविश्वास और झाड़-फूंक के कारण होने वाली उपचार में देरी को रोकना भी है। प्रशासन और स्वास्थ्य अमले की कोशिश है कि ग्रामीण समय रहते चिकित्सा सुविधा का लाभ लें और किसी भी गंभीर लक्षण को नजरअंदाज न करें।