पटना। नाबालिग बच्चों की सुरक्षा और उनसे जुड़ी शिकायतों के त्वरित समाधान के लिए राज्य के सभी पुलिस थानों में अब बाल सहायता डेस्क यानी ‘चाइल्ड हेल्प डेस्क’ स्थापित किया जाएगा। इस नई व्यवस्था की शुरुआत गांधी जयंती के अवसर पर 2 अक्टूबर से की जाएगी। पुलिस मुख्यालय ने सभी जिलों के एसएसपी और एसपी को अपने-अपने क्षेत्र के थानों में व्यवस्था लागू कराने के निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही 5 अक्टूबर तक अनुपालन रिपोर्ट भी मांगी गई है।

अपराध अनुसंधान विभाग (कमजोर वर्ग) की पहल के तहत बाल सहायता डेस्क को इस तरह विकसित किया जाएगा कि नाबालिग बच्चे और उनके अभिभावक बिना किसी परेशानी के वहां पहुंच सकें। डेस्क का उद्देश्य बच्चों से संबंधित शिकायतों को संवेदनशील तरीके से सुनना, उनकी समस्याओं पर तत्काल कार्रवाई करना और जरूरत के अनुसार संबंधित विभागों तथा संस्थाओं से समन्वय स्थापित करना होगा।

पुलिस मुख्यालय ने स्पष्ट किया है कि बाल सहायता डेस्क थाने में ऐसे स्थान पर बनाया जाए जहां बच्चों और उनके परिजनों की पहुंच आसान हो। बच्चों को थाने के सामान्य माहौल से डर या असहजता महसूस न हो, इसके लिए डेस्क की व्यवस्था बाल-अनुकूल रखने पर जोर दिया गया है।

लड़कियों के लिए महिला पुलिसकर्मी

बाल सहायता डेस्क पर नाबालिग लड़कियों से जुड़ी शिकायतों को संवेदनशील तरीके से सुनने के लिए महिला पुलिसकर्मियों की भी प्रतिनियुक्ति की जाएगी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई बच्ची अपनी समस्या बताने में असहज महसूस न करे।

कई मामलों में बच्चे डर, सामाजिक दबाव या संकोच की वजह से अपनी बात खुलकर नहीं बता पाते। खासकर यौन अपराध, उत्पीड़न, घरेलू हिंसा या अन्य संवेदनशील मामलों में पीड़ित बच्चे से बातचीत करने के लिए विशेष सावधानी की जरूरत होती है। इसी को ध्यान में रखते हुए महिला पुलिसकर्मियों की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया है।

महिला पुलिसकर्मी नाबालिग लड़कियों की शिकायतों को सुनने के साथ जरूरत पड़ने पर आगे की कानूनी और सहायता प्रक्रिया में भी सहयोग करेंगी।

2 अक्टूबर से शुरू होगी व्यवस्था

पुलिस मुख्यालय की योजना के मुताबिक राज्यभर में 2 अक्टूबर से बाल सहायता डेस्क काम करना शुरू कर देंगे। सभी जिलों के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को इसके लिए आवश्यक तैयारी समय पर पूरी करने के निर्देश दिए गए हैं।

थानों में जगह निर्धारित करने, पुलिसकर्मियों की जिम्मेदारी तय करने और बच्चों से जुड़े मामलों में आवश्यक प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी संबंधित जिला पुलिस की होगी।

मुख्यालय ने केवल निर्देश जारी करने तक व्यवस्था सीमित नहीं रखी है। जिलों से 5 अक्टूबर तक अनुपालन रिपोर्ट भी मांगी गई है। इससे यह पता लगाया जाएगा कि कितने थानों में बाल सहायता डेस्क शुरू हो चुके हैं और निर्धारित व्यवस्था का पालन किया जा रहा है या नहीं।

बच्चों की शिकायतों का त्वरित निस्तारण

अपराध अनुसंधान विभाग (कमजोर वर्ग) के अनुसार इस पहल का मुख्य उद्देश्य नाबालिग बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और उनकी शिकायतों का जल्द से जल्द समाधान करना है।

बच्चों से जुड़े मामलों में देरी कई बार समस्या को और गंभीर बना सकती है। लापता बच्चे, बाल श्रम, बाल विवाह, शोषण, हिंसा, उत्पीड़न और अन्य अपराधों से संबंधित शिकायतों में शुरुआती कार्रवाई महत्वपूर्ण होती है।

ऐसे मामलों के लिए थाने में अलग सहायता डेस्क होने से शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाने में मदद मिल सकती है।

आसानी से पहुंच सकेंगे बच्चे और अभिभावक

बाल सहायता डेस्क को थाने के किसी ऐसे हिस्से में स्थापित करने का निर्देश दिया गया है जहां बच्चों और उनके अभिभावकों को पहुंचने में कठिनाई न हो। इसका उद्देश्य थाने में आने वाले बच्चों को अनावश्यक रूप से पुलिस की सामान्य पूछताछ या अन्य गतिविधियों के बीच जाने से बचाना भी है।

बच्चों के लिए थाने का माहौल कई बार डर पैदा करने वाला हो सकता है। इसलिए बाल सहायता डेस्क को अपेक्षाकृत सहज वातावरण में संचालित करने की योजना है।

डेस्क पर आने वाले बच्चे और उनके अभिभावक अपनी समस्या सीधे संबंधित पुलिसकर्मी को बता सकेंगे। इसके बाद शिकायत की प्रकृति के आधार पर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।

संवेदनशील मामलों में विशेष सावधानी

बच्चों से जुड़े अपराधों की जांच और शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया सामान्य मामलों से अलग संवेदनशीलता की मांग करती है। खासकर यौन अपराधों से जुड़े मामलों में पीड़ित बच्चे की पहचान और निजता की सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण होती है।

ऐसे मामलों में बच्चे से बार-बार पूछताछ से बचने, उसकी पहचान सार्वजनिक नहीं करने और बातचीत के दौरान उसके हितों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता होती है।

बाल सहायता डेस्क के माध्यम से पुलिसकर्मियों को बच्चों की शिकायतों के लिए एक स्पष्ट संपर्क केंद्र उपलब्ध होगा। इससे शिकायतकर्ता को थाने में अलग-अलग अधिकारियों के पास जाने की जरूरत कम हो सकती है।

दूसरे विभागों से भी होगा समन्वय

बच्चों से जुड़े सभी मामलों का समाधान केवल पुलिस स्तर पर संभव नहीं होता। कई मामलों में बाल कल्याण समिति, जिला बाल संरक्षण इकाई, चिकित्सा विभाग और अन्य संबंधित संस्थाओं की भूमिका भी जरूरी होती है।

यदि किसी बच्चे को तत्काल संरक्षण, चिकित्सा सहायता, काउंसलिंग या सुरक्षित आश्रय की जरूरत होती है तो पुलिस को संबंधित एजेंसियों से समन्वय करना पड़ता है।

बाल सहायता डेस्क ऐसी परिस्थितियों में एक समन्वय केंद्र के रूप में भी काम कर सकता है। इससे बच्चे को आवश्यक सहायता तक जल्दी पहुंचाने में मदद मिलेगी।

लापता बच्चों के मामलों में भी अहम भूमिका

लापता नाबालिगों से संबंधित शिकायतें पुलिस के लिए बेहद संवेदनशील होती हैं। ऐसे मामलों में समय पर सूचना दर्ज करना और बच्चे की तलाश शुरू करना महत्वपूर्ण होता है।

बाल सहायता डेस्क बनने के बाद अभिभावक सीधे वहां संपर्क कर सकेंगे। इससे संबंधित पुलिसकर्मियों को मामले की जानकारी तत्काल मिल सकेगी और आवश्यक प्रक्रिया शुरू करने में मदद मिलेगी।

इसी तरह बाल श्रम, बाल विवाह या बच्चों के साथ दुर्व्यवहार की सूचना मिलने पर भी डेस्क संबंधित विभागों के साथ मिलकर आगे की कार्रवाई में भूमिका निभा सकता है।

सभी जिलों को निर्देश

पुलिस मुख्यालय ने सभी एसएसपी और एसपी को निर्देश दिया है कि वे अपने क्षेत्र के प्रत्येक थाने में इस व्यवस्था को लागू कराएं। जिला स्तर पर वरिष्ठ अधिकारी इसकी निगरानी करेंगे।

निर्देशों का पालन हुआ या नहीं, इसकी जानकारी अनुपालन रिपोर्ट के जरिए मुख्यालय तक पहुंचेगी। इसके लिए 5 अक्टूबर की समयसीमा निर्धारित की गई है।

यह व्यवस्था केवल बड़े शहरों या जिला मुख्यालय के थानों तक सीमित नहीं रहेगी। निर्देश राज्य के सभी पुलिस थानों के लिए है, जिससे ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों को भी इसका लाभ मिल सके।

बच्चों के अनुकूल पुलिसिंग पर जोर

बाल सहायता डेस्क की शुरुआत बच्चों के प्रति संवेदनशील पुलिसिंग की दिशा में महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है। पुलिस थाने में अलग सहायता केंद्र उपलब्ध होने से बच्चों और उनके परिवारों को शिकायत दर्ज कराने में सुविधा मिल सकती है।

इस व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि थानों में डेस्क केवल औपचारिक रूप से स्थापित न हों, बल्कि वहां प्रशिक्षित और संवेदनशील पुलिसकर्मियों की नियमित उपलब्धता भी सुनिश्चित की जाए।

साथ ही बच्चों से जुड़े मामलों में संबंधित कानूनों, गोपनीयता और बाल संरक्षण के निर्धारित मानकों का पालन भी महत्वपूर्ण होगा।

2 अक्टूबर से शुरू होने वाली इस व्यवस्था के जरिए पुलिस मुख्यालय का लक्ष्य बच्चों की शिकायतों के लिए प्रत्येक थाने में एक स्पष्ट और आसानी से उपलब्ध संपर्क केंद्र तैयार करना है। वहीं 5 अक्टूबर तक मांगी गई अनुपालन रिपोर्ट से यह पता चलेगा कि जिलों में निर्देशों को किस स्तर तक लागू किया गया है।

नई व्यवस्था लागू होने के बाद राज्य के सभी पुलिस थानों में नाबालिगों और उनके अभिभावकों को अपनी शिकायत रखने के लिए अलग बाल सहायता डेस्क उपलब्ध होगा। विशेष रूप से नाबालिग लड़कियों के मामलों में महिला पुलिसकर्मियों की तैनाती से शिकायतों को अधिक संवेदनशील तरीके से संभालने की कोशिश की जाएगी।

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