नई दिल्ली: भारतीय संस्कृति में शरीर, मन और आत्मा की शुद्धि को सर्वोच्च महत्व दिया जाता है। ऐसे में षट्कर्म योगासन अत्यंत लाभकारी है। इसे करने से न केवल शरीर शुद्ध होता है, बल्कि मन भी शांत और स्वच्छ बनता है।
जब शरीर और मन दोनों शुद्ध होते हैं, तो हमारा ध्यान और एकाग्रता बढ़ती है। इससे हम जीवन में संतुलन व शांति का अनुभव करते हैं। आयुष मंत्रालय ने इसके महत्व पर प्रकाश डाला है। उनके अनुसार, षट्कर्म हठयोग की 6 प्राचीन शुद्धि क्रियाएं हैं। इनका उद्देश्य शरीर के अंदरूनी अंगों की सफाई करना, दोषों (वात, पित्त, कफ) को संतुलित करना और शरीर को प्राणायाम के लिए तैयार करना है। नेति, धौति, बस्ती, नौली, त्राटक और कपालभाति को मिलाकर छह क्रियाएं बनती हैं।
इनके नियमित अभ्यास से पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र और मानसिक स्पष्टता में सुधार होता है। 'नेति' में जल या सूत्र की मदद से नाक के मार्ग की सफाई की जाती है, जिससे साइनस और सांस संबंधी समस्याओं में लाभ मिलता है, जबकि 'धौति' में पेट और आहार नली की सफाई की जाती है। 'बस्ती' में योगिक एनिमा के माध्यम से आंतों की सफाई की जाती है। वहीं, 'नौली' में पेट की मांसपेशियों को घुमाकर पाचन तंत्र को मजबूत बनाया जाता है। 'त्राटक' में बिना पलक झपकाए किसी बिंदु या दीपक की लौ को देखा जाता है, जिससे एकाग्रता बढ़ती है। 'कपालभाति' करने से श्वसन क्रिया मस्तिष्क और श्वसन तंत्र को शुद्ध करने में मदद करती है।
इसके नियमित अभ्यास से शरीर फिट रहता है और मानसिक-आध्यात्मिक स्तर पर भी प्रगति करता है। यह शरीर की आंतरिक सफाई का सबसे प्रभावी तरीका है। साथ ही, यह शरीर से विषाक्त पदार्थों (विजातीय द्रव्यों) को बाहर निकालता है और मन को शांत करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।
योग विशेषज्ञों का कहना है कि इन क्रियाओं को सही तरीके से और विशेषज्ञ की देखरेख में ही करना जरूरी है। गलत विधि से नुकसान भी हो सकता है।
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