Lifestyle लाइफ स्टाइल :‘फूटी कौड़ी भी न देने’ मुहावरा हिंदी भाषा में लंबे समय से प्रचलन में है और आज भी इसका इस्तेमाल किसी चीज की बेहद कम या बिल्कुल भी कीमत न होने के अर्थ में किया जाता है। आम बोलचाल में यह मुहावरा तब प्रयोग किया जाता है जब किसी व्यक्ति या वस्तु को बिल्कुल भी महत्व या मूल्य नहीं दिया जा रहा हो। हालांकि बहुत कम लोग जानते हैं कि इस मुहावरे की जड़ें पुराने समय की मुद्रा व्यवस्था से जुड़ी हुई हैं।
पुराने समय में आज की तरह डिजिटल पेमेंट या नोटों का चलन नहीं था। उस दौर में लेन-देन के लिए अलग-अलग प्रकार की वस्तुओं का उपयोग किया जाता था, जिनमें कौड़ियों का भी महत्वपूर्ण स्थान था। कौड़ी समुद्र में पाए जाने वाले छोटे शंख जैसे आकार के प्राकृतिक वस्तु होते थे, जिन्हें प्राचीन समय में मुद्रा के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। इनका उपयोग सामान्य व्यापार से लेकर छोटे-मोटे लेन-देन तक में होता था।
धीरे-धीरे जब मुद्रा प्रणाली विकसित हुई तो धातु के सिक्कों का प्रचलन बढ़ने लगा, लेकिन तब तक कौड़ी का उपयोग कई क्षेत्रों में बना रहा। कौड़ी का भी एक निश्चित मूल्य होता था, लेकिन जब कोई कौड़ी टूट जाती थी या उसमें छेद हो जाता था, तो वह उपयोग के लायक नहीं रहती थी। ऐसी खराब या टूटी हुई कौड़ी को ‘फूटी कौड़ी’ कहा जाने लगा। इसका कोई बाजार मूल्य नहीं होता था और इसे बेकार माना जाता था।
इसी स्थिति से यह मुहावरा बना कि किसी चीज की कीमत इतनी कम है कि वह एक फूटी कौड़ी के बराबर भी नहीं है। समय के साथ यह कहावत भाषा में शामिल हो गई और इसका प्रयोग उन स्थितियों में होने लगा जहां किसी वस्तु, व्यक्ति या कार्य को बिल्कुल भी महत्व नहीं दिया जाता।
आज के समय में यह मुहावरा सिर्फ भाषा का हिस्सा बनकर रह गया है, लेकिन इसके पीछे छिपा इतिहास प्राचीन भारतीय मुद्रा व्यवस्था और व्यापारिक प्रणाली की झलक दिखाता है। यह बताता है कि कैसे साधारण सी वस्तुएं भी उस समय अर्थव्यवस्था का हिस्सा थीं और भाषा में उनके निशान आज भी मौजूद हैं।