ब्रिटेन ने अलिखित संविधान क्यों चुना और भारत ने क्यों नहीं?
ब्रिटेन ने अलिखित संविधान क्यों चुना
हर विचारशील और राजनीतिक रूप से जागरूक व्यक्ति यह सोच सकता है कि ब्रिटेन बिना किसी लिखित संविधान के कैसे काम चलाता है, जबकि भारत और अमेरिका जैसे देशों में, जहाँ लिखित संविधान हैं, वहाँ भी अक्सर संविधान के मुख्य और विवादित प्रावधानों के सही अर्थ को लेकर तीखी बहस होती रहती है। ब्रिटेन के पास कोई एक लिखित या संहिताबद्ध (codified) संविधान नहीं है, क्योंकि वहाँ कभी ऐसी कोई "बड़ी घटना"—जैसे हिंसक क्रांति, सरकार का पूरी तरह से पतन, या विदेशी आक्रमण—नहीं हुई, जिसने देश को अपने बुनियादी कानूनों को शुरू से फिर से लिखने के लिए मजबूर किया हो। इसके बजाय, ब्रिटेन की व्यवस्था असंहिताबद्ध (uncodified) है; इसका मतलब यह है कि इसके नियम किसी एक किताब में नहीं, बल्कि सैकड़ों अलग-अलग दस्तावेजों, परंपराओं और कानूनों में लिखे गए हैं।
ज्यादातर देश किसी बड़े बदलाव या मोड़ के बाद लिखित संविधान बनाते हैं, जैसे कि अमेरिकी क्रांति (1776), फ्रांसीसी क्रांति, या स्वतंत्रता आंदोलन। ब्रिटेन का राजनीतिक विकास धीरे-धीरे हुआ—जिसमें 1688 की 'गौरवपूर्ण क्रांति' (Glorious Revolution) भी शामिल है—जिसके जरिए समय के साथ सत्ता संसद के हाथों में आ गई, और ऐसा राज्य की निरंतरता को तोड़े बिना हुआ। (17वीं सदी में क्रॉमवेल का 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ गवर्नमेंट' एक छोटा सा अपवाद था)।
ब्रिटेन में मुख्य कानूनी सिद्धांत यह है कि संसद सर्वोच्च है। संसद न तो पिछली संसदों के फैसलों से बंधी हो सकती है, और न ही वह भविष्य की संसदों को बांध सकती है। एक स्थायी और सर्वोच्च लिखित संविधान इस विचार के खिलाफ होगा, क्योंकि यह संवैधानिक नियमों को चुने हुए राजनेताओं द्वारा बनाए गए सामान्य कानूनों से ऊपर रख देगा। दूसरे शब्दों में, भारत और अमेरिका के विपरीत—जहाँ संविधान ही संसद और राज्य विधानसभाओं के विभिन्न कानूनों का स्रोत है—ब्रिटेन में मौजूदा संसद सर्वोच्च है और उसे किसी कठोर संविधान के दायरे में नहीं बांधा जाना चाहिए।
चूंकि यहाँ कोई एक मुख्य दस्तावेज नहीं है, इसलिए नियम बदलते समय के साथ जल्दी से खुद को ढाल सकते हैं। संसद किसी भी नए कानून को पारित करके संविधान के किसी भी हिस्से में बदलाव कर सकती है। ब्रिटिश संविधान असल में लिखित है, लेकिन यह किसी एक दस्तावेज़ में नहीं है, बल्कि कई स्रोतों में बिखरा हुआ है—जैसे कि मैग्ना कार्टा (1215), बिल ऑफ़ राइट्स (1689), और ह्यूमन राइट्स एक्ट, 1998। इसके अलावा, कॉमन लॉ (न्यायाधीशों द्वारा बनाए गए नियम और कानूनी मिसालें) और बिना लिखे राजनीतिक रीति-रिवाज (जैसे कि प्रधानमंत्री और कैबिनेट का संसद के प्रति जवाबदेह होना) भी मौजूदा संसदीय व्यवस्था पर प्रभाव डालते हैं।
अमेरिका में रिपब्लिकन और भारत में भाजपा जैसी मजबूत और स्वतंत्र विचारधारा वाली पार्टियां शायद बिना लिखे संविधान को ही पसंद करेंगी, क्योंकि एक सदी पहले तैयार किया गया लिखित संविधान आज की वास्तविकताओं के अनुरूप न भी हो सकता है। यह सच है कि भारतीय संविधान में संशोधन किया जा सकता है—1950 में इसे अपनाए जाने के बाद से अब तक इसमें 106 बार संशोधन हो चुके हैं—लेकिन संविधान संशोधन के हर विधेयक को एक कठिन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसके लिए संसद में 'विशेष बहुमत' की आवश्यकता होती है: यानी प्रत्येक सदन की कुल सदस्य संख्या का 50% से अधिक बहुमत, और प्रत्येक सदन में उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई बहुमत। इसके अलावा, यदि किसी संशोधन का असर राज्यों के आपसी संबंधों पर पड़ता है, तो राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए विधेयक पेश किए जाने से पहले, कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं द्वारा साधारण बहुमत से इसे मंजूरी (अनुसमर्थन) मिलना भी जरूरी होता है।