मार्केट शेयर के हिसाब से भारत की सबसे बड़ी एयरलाइन, इंडिगो ने लगातार तीसरी तिमाही में नुकसान दर्ज किया है। इसकी मुख्य वजह रुपये की गिरती कीमत और ईंधन की कीमतों में भारी बढ़ोतरी है। ईंधन की कीमतें उन कुछ कारकों में से हैं, जिन पर एयरलाइन का कोई नियंत्रण नहीं होता। इसके अलावा, कई अन्य खर्च - जैसे एक्साइज ड्यूटी, एयरपोर्ट चार्ज और रेगुलेटरी फीस - स्टेकहोल्डर्स, खासकर सरकार के फैसलों से प्रभावित होते हैं।
सरकारी नीति में बदलाव से बड़ा फर्क पड़ सकता है। आजादी के बाद से ही, एविएशन सेक्टर को अक्सर एक 'लक्जरी' (विलासितापूर्ण) उद्योग माना जाता रहा है और उसी के हिसाब से इस पर टैक्स लगाए जाते रहे हैं।
लेकिन अब यह सोच पुरानी हो चुकी है। हवाई यात्रा देश में परिवहन के सबसे लोकप्रिय साधनों में से एक बन गई है, जो व्यवसायों, परिवारों और छोटे शहरों को आपस में जोड़ती है। इस सेक्टर में बदलाव तब तेज हुआ, जब कैप्टन जी.आर. गोपीनाथ ने 'एयर डेक्कन' के जरिए कम लागत वाला (लो-कॉस्ट) मॉडल पेश किया। इंटरनेट बुकिंग और डायनेमिक प्राइसिंग ने हवाई यात्रा को आम लोगों की पहुंच के करीब ला दिया।
बाद में, सरकार ने एयरपोर्ट्स के निजीकरण का रास्ता खोला, जिससे इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश को बढ़ावा मिला। आज कई एयरपोर्ट सिर्फ सुविधाएं ही नहीं, बल्कि अपने आप में एक डेस्टिनेशन (गंतव्य) बन गए हैं। यात्री 'यूजर डेवलपमेंट फीस' (UDF) के जरिए खर्च का एक बड़ा हिस्सा चुका रहे हैं। पिछले चार सालों में इन शुल्कों में 160% से लेकर लगभग 300% तक की बढ़ोतरी हुई है। अंतरराष्ट्रीय यात्रियों को तो अक्सर इससे दोगुना शुल्क देना पड़ता है।
एयरलाइंस को UDF का कोई हिस्सा नहीं मिलता, फिर भी इससे हवाई यात्रा का खर्च बढ़ जाता है। एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) पर राज्य स्तर का 'वैल्यू एडेड टैक्स' (VAT) लगता है, जिसकी दरें 2% से 18% तक हो सकती हैं। इसका बोझ अंततः यात्रियों पर ही पड़ता है। इंडिगो का ईंधन बिल इस समस्या को साफ तौर पर दिखाता है। लगभग 11% की सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी, लागत का एक बड़ा हिस्सा है जो मार्केट से नहीं, बल्कि सरकारी नीतियों से जुड़ा है। चूंकि VAT एक्साइज ड्यूटी सहित कुल रकम पर लगाया जाता है, इसलिए कुल ईंधन बिल में एक्साइज ड्यूटी का हिस्सा लगभग 10% हो जाता है। अगर दूसरी तिमाही में इंडिगो के ₹9,967 करोड़ के ईंधन खर्च से एक्साइज ड्यूटी का बोझ हटा दिया जाए, तो कंपनी हर तिमाही में लगभग ₹1,000 करोड़ बचा सकती है।
यह रकम विदेशी मुद्रा के उतार-चढ़ाव के असर को छोड़कर, कंपनी को हुए ₹724 करोड़ के नुकसान से भी ज्यादा है। इसके अलावा, लैंडिंग और पार्किंग चार्ज भी एयरलाइन के संचालन खर्च (ऑपरेटिंग कॉस्ट) को बढ़ा देते हैं। जुलाई में खत्म होने वाले तीन महीनों के दौरान 25 प्रतिशत की कटौती से इंडस्ट्री को लगभग ₹400 करोड़ की बचत हुई, जो लक्षित राहत (टारगेटेड रिलीफ) के असर को दिखाती है।
सरकार भले ही वैश्विक ईंधन की कीमतों को प्रभावित न कर सके, लेकिन वह अपने नियंत्रण में आने वाली लागत को कम कर सकती है। सरकार को उन पुराने नियमों और क्लीयरेंस की शर्तों की भी समीक्षा करनी चाहिए, जो नई एयरलाइनों के लिए बाजार में आना मुश्किल बना देती हैं। भारत हवाई अड्डों के निजीकरण, ईंधन पर लगने वाले टैक्स और यूजर फीस के जरिए एविएशन सेक्टर से कमाई करता है। लेकिन इन उपायों से एयरलाइनों का कामकाज टिकाऊ नहीं बन पाता। एयरलाइंस भारी लागत के दबाव में काम करती रहती हैं, यहाँ तक कि अंत में वे बंद हो जाती हैं। जब तक नीतियां केवल ज्यादा से ज्यादा कमाई करने के बजाय एक टिकाऊ एविएशन इकोसिस्टम बनाने पर केंद्रित नहीं होंगी, तब तक भारत की छवि 'एयरलाइनों के कब्रिस्तान' (graveyard of airlines) वाली ही बनी रहेगी।