मौन की शक्ति से सत्य की अनुभूति तक, सद्गुरु की सीख ने खींचा ध्यान
आध्यात्मिक सवालों पर सद्गुरु का जवाब
ज़्यादातर आध्यात्मिक प्रक्रियाएँ साधकों को मौन में जाने के लिए क्यों कहती हैं?
सद्गुरु: अस्तित्व असल में गूँज या ध्वनि का खेल है, ठीक वैसे ही जैसे इंसानी शरीर और मन हैं। शरीर और मन किसी संभावना की बाहरी परत हैं, वे अपने आप में कोई मंज़िल नहीं हैं। ज़्यादातर इंसान अपनी पूरी ज़िंदगी दरवाज़े की दहलीज़ पर ही बैठे रहते हैं, जबकि दरवाज़े का मकसद उसके अंदर जाना होता है। उस चीज़ का अनुभव करने का एक तरीका, जो इस दरवाज़े के पार है, मौन का अभ्यास है।
संस्कृत में, मौन के लिए दो अहम शब्द हैं - 'मौन' और 'निशब्द'। 'मौन' का मतलब है वह चुप्पी जिसे हम आम तौर पर जानते हैं: आप बोलते नहीं हैं। 'निशब्द' का मतलब है ध्वनि से परे जाना और शरीर, मन और पूरी सृष्टि से परे हो जाना।
यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि अस्तित्व ऊर्जा की गूँज है। सृष्टि में हर रूप की एक संबंधित ध्वनि होती है। ध्वनियों का यही जटिल मेल वह है जिसे हम सृष्टि के रूप में अनुभव करते हैं। सभी ध्वनियों का आधार 'निशब्द' है। 'मौन' सृष्टि का एक हिस्सा होने से सृष्टि के स्रोत तक जाने की कोशिश है। अस्तित्व और अनुभव की यह असीम अवस्था ही योग की चाहत है: मिलन।
ध्वनि सतह की चीज़ है; मौन गहराई की चीज़ है। जब किसी के अनुभव में सृष्टि नहीं होती, तो सृष्टि के स्रोत की मौजूदगी बहुत बड़ी होती है। 'निशब्द' का मतलब है शून्यता – कुछ भी न होना। यह सृष्टि, जीवन और मृत्यु से परे की जगह है। कोई 'निशब्द' का अभ्यास नहीं कर सकता; कोई बस 'निशब्द' हो सकता है। मौन का अभ्यास करने और मौन हो जाने में फ़र्क है। अगर आप किसी चीज़ का अभ्यास कर रहे हैं, तो ज़ाहिर है कि आप वह नहीं हैं। होशपूर्वक मौन की चाहत रखने में, मौन हो जाने की संभावना होती है।
ज़्यादातर आध्यात्मिक गुरु क्यों कहते हैं कि सच को असल में बोला नहीं जा सकता, सिर्फ़ अनुभव किया जा सकता है?
सद्गुरु: भाषा हमेशा दो लोगों के बीच होती है। भाषा सिर्फ़ जीवन के द्वैत (दोहरेपन) के बारे में बात कर सकती है। अगर द्वैत नहीं है, तो भाषा भी नहीं है। भाषा जीवन के सभी पहलुओं का बहुत अच्छे से वर्णन कर सकती है, लेकिन वह अस्तित्व की एकता के बारे में कुछ नहीं कह सकती; उसके लिए वह बेकार है। इसलिए अगर आप एकता के बारे में बात करते हैं, तो आप उसे चाहे जैसे भी कहें, भाषा के साथ द्वैत पैदा हो जाता है।
यही वजह है कि - कल्पना को कम करने के लिए - पूर्वी आध्यात्मिक विज्ञान हमेशा नकारात्मक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। अगर हम सकारात्मक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, तो बहुत ज़्यादा कल्पना होने लगेगी। अगर आप 'ईश्वर' या 'ईश्वर का राज्य' कहते हैं, तो लोग अपने दिमाग में तरह-तरह की शानदार चीज़ों की कल्पना करने लगते हैं। इसलिए पूर्वी आध्यात्मिक प्रक्रियाओं में हमेशा नकारात्मक शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। गौतम बुद्ध ने 'निर्वाण' कहा। निर्वाण का मतलब है 'अस्तित्व का न होना'। वे 'अनात्मा' कहते हैं, जिसका मतलब है 'स्वयं का न होना'। हम 'निर्काय' कहते हैं – जिसका मतलब है 'शरीर का न होना'। इस नकारात्मक शब्दावली का इस्तेमाल सच्चाई के जितना हो सके करीब पहुँचने के लिए किया जाता है, क्योंकि आप भाषा का इस्तेमाल चाहे जैसे भी करें, भाषा दोहरेपन (duality) की दुनिया से जुड़ी होती है। भाषा कभी भी उस सब का वर्णन नहीं कर सकती जो है – यानी वह जो सब कुछ समेटे हुए है। आप कुछ भी कहें, भाषा दो चीज़ें बना देती है। दो के बिना भाषा नहीं होती। इसलिए गलत धारणा और कल्पना को कम करने के लिए हमेशा नकारात्मक शब्दों का इस्तेमाल किया जाता था।
मुझे योग-क्रियाओं में ध्यान (फोकस) लगाने में मुश्किल हो रही है। इसमें सुधार हुआ है, लेकिन क्या आप मुझे बता सकते हैं कि मज़बूत फोकस कैसे बनाए रखें और समाधि की गहरी अवस्थाओं का अनुभव कैसे करें?
सद्गुरु: फोकस लाने की कोशिश न करें। किसी चीज़ में शामिल होने की कोशिश करें। अगर आप किसी चीज़ में गहराई से शामिल हैं, तो फोकस अपने आप आ जाता है। जहाँ कोई जुड़ाव नहीं होता, वहाँ अगर आप फोकस लाने की कोशिश करते हैं, तो यह टॉर्चर (यातना) जैसा होगा; फोकस नहीं आएगा।
उदाहरण के लिए, ज़्यादातर बच्चे अपनी पाठ्यपुस्तकों को टॉर्चर जैसा मानते हैं। ऐसा इसलिए नहीं है कि उसमें लिखी बातें दिलचस्प नहीं हैं। एक छोटी सी किताब में कई अद्भुत चीज़ें भरी होती हैं, लेकिन हो सकता है कि उन्हें दिलचस्प तरीके से न लिखा गया हो। यह बस उसे पेश करने के तरीके की वजह से होता है। अगर आप बच्चों को किसी चीज़ में शामिल कर लें, तो आपको उनके फोकस की चिंता करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। वे हर समय पूरी तरह से फोकस्ड रहेंगे। यही बात आप पर भी लागू होती है।
बिना जुड़े या शामिल हुए, अगर आप अपना मानसिक फोकस बनाए रखने की कोशिश करते हैं, तो यह सिर्फ़ टॉर्चर जैसा होगा। इससे भलाई नहीं होगी। आप जिस चीज़ पर फोकस लाने की कोशिश कर रहे हैं, उस पर फोकस करने के बजाय, आपका जीवन एक प्रेम-संबंध (love affair) बन जाना चाहिए। मैंने यह कई बार कहा है, लेकिन हो सकता है कि आप फोकस्ड न रहे हों!
मान लीजिए कि आपको पड़ोस की किसी लड़की से प्यार हो जाता है। क्या मुझे आपको यह बताने की ज़रूरत है कि उस लड़की पर फोकस बनाए रखें? नहीं। वह आपके दिमाग पर छाई रहेगी। तो आपको बस किसी चीज़ से प्यार हो जाना चाहिए। शुरू में, जब आपके हार्मोन तेज़ी से काम करते हैं, तो आपका प्रेम-संबंध शायद सिर्फ़ ऐसी ही चीज़ों में हो सकता है। लेकिन अगर आप अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करके खुद को प्रेरित करते हैं, तो आप अपनी पसंद की किसी भी चीज़ से प्यार कर सकते हैं। फिर ध्यान अपने-आप लग जाता है।