जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:  
एक दौर में महाराष्ट्र के अमरावती में रहने वाले फिल्म प्रोड्यूसर रतन खत्री ने सट्‌टे का नया रूप प्रस्तुत किया। उनके खेल के नए तरीके में ताश की गड्‌डी से गुलाम, बेगम, बादशाह के चित्र वाले पत्ते हटा दिए जाते थे केवल इक्के से दस्से तक ताश की गड्‌डी को कई बार शफल करने के बाद एक पत्ता निकाला जाता था, दोबारा शफल करके दूसरा पत्ता और तीनों बार शफल किए पत्तों के जोड़ से विजयी अंक बनता था।
इस खेल को खेलने वालों के लिए इसमें विविध चक्रों के बाद अच्छा-खासा पैसा बनाने का अवसर बनता था। बहरहाल, ताजा खबर यह है कि उन्हीं रतन खत्री के जीवन पर एक निर्माता, बायोपिक बनाने जा रहे हैं। इस खेल का अखिल भारतीय स्वरूप कैसे संचालित किया जाता था यह हमेशा आश्चर्य का विषय रहा है। उस दौर में हर टेलीफोन महकमें के कुछ लोग विजयी अंक की जानकारी देते थे।
रतन खत्री ने अपने खेल में किसी बड़े बुकी को बड़ी हार से बचाने के लिए कभी हेरा-फेरी नहीं की। उन्हें एक बार फिल्म निर्माण का शौक हुआ। उन्होंने उस दौर के सफल फिल्मकार को निर्देशन के लिए मुंहमांगा पैसा देना चाहा परंतु उन्होंने विनम्रता से प्रस्ताव अस्वीकार किया कि वे केवल अपनी निर्माण संस्था के लिए ही निर्देशन करते हैं। बाद में ऋषि कपूर अभिनीत 'रंगीला रतन' नामक फिल्म का निर्माण खत्री ने किया।
खत्री परिवार के एक सदस्य ने अमरावती में अपनी फिल्म वितरण संस्था स्थापित की। उस दौर में बड़े-बड़े क्लबों में आला अफसर ब्रिज खेलते थे। रात 9 बजे के बाद रमी खेली जाती थी, जिसमें सिक्के के बदले प्लास्टिक के टोकन का उपयोग किया जाता था, जिस पर उसका मूल्य लिखा होता था। खेल समाप्त होने के बाद प्लास्टिक के सिक्कों के बदले असली रुपयों का लेन-देन होता था।
अब सवाल यह उठता है कि क्या रतन बायोपिक का नाम रंगीला रतन होगा? दरअसल अनर्जित कमाई का लोभ ही इस तरह के खेलों को जन्म देता रहा है। एक रुपए के नौ रु. बनाना किसे बुरा लगेगा? कुछ लोग फिल्म निर्माण को भी सट्‌टा ही मानते हैं परंतु ऐसा नहीं है। कुछ फिल्मकारों ने अपनी बनाई दस फिल्मों में से 8 सफल फिल्में बनाई हैं। गुरुदत्त ने अलग-अलग प्रकार की फिल्में बनाकर सफलता का अच्छा प्रतिशत कायम रखा।
बिमल रॉय, महबूब खान और राजकपूर भी प्रायः सामाजिक सोद्देश्यता की सफल फिल्में बनाते रहे। आज राजकुमार हिरानी सफलतम फिल्मकार हैं। आनंद.एल.राय और कबीर खान का ट्रेक रिकॉर्ड भी अच्छा है। आदित्य चोपड़ा विभिन्न प्रकार की फिल्में बना रहे हैं। स्थापित सितारों के साथ वे नए कलाकारों को भी अवसर देते हैं। वे दादा साहब फाल्के पुरस्कार के हकदार हैं। आदित्य कभी किसी तरह का राजनीतिक झमेला नहीं पालते।
उनके स्टूडियो में काम करने वालों को सेहत के लिए मुफीद भोजन कम कीमत पर ही दिया जाता है। वे इस क्षेत्र में लाभ-लोभ से मुक्त हैं। चोपड़ा स्टूडियो एक द्वीप की तरह है, जिस पर अपना माथा टकराकर बुराई की लहरें लौट जाती हैं। भोपाल में जन्में हबीब फैसल ने ऋषिकपूर अभिनीत 'दो दुनी चार' के बाद एक असफल फिल्म बनाई थी लेकिन आदित्य ने उन्हें एक और अवसर दिया है, अब वे एक पटकथा लिख रहे हैं।
ज्ञातव्य है कि आदित्य चोपड़ा के लिए उनका अपना सुविधाजनक दफ्तर है लेकिन वे प्राय: दफ्तर के बाहर एक कुर्सी पर बैठते हैं और फैसले लेने में देरी नहीं करते। आदित्य चोपड़ा ने अभी तक ओ.टी.टी मंच को नहीं अपनाया है। सेल्युलाइड से उनकी प्रेम कथा जारी है। विवाह के बाद भी अपनी पत्नी के अभिनय करने की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का वे सम्मान करते हैं।
रंगीला रतन के लिए कलाकारों से बात की जा रही है। अपराध जगत से जुड़े लोगों के जीवन से प्रेरित फिल्में बनना जारी हैं। मारिया पुजो के उपन्यास 'गॉड फादर' से यह सिलसिला चला रहा है। यह भी सच है कि रतन खत्री बायोपिक में प्रेम कहानी शामिल करना कठिन होगा।
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