नई दिल्ली : विदेशी अंशदान (विनियमन) कानून में बदलाव से जुड़े FCRA Amendment Bill, 2026 को लेकर केंद्र सरकार अब इसे संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC के पास भेजने के विकल्प पर विचार कर रही है। संसद में विधेयक को आगे बढ़ाने से पहले विस्तृत समीक्षा कराने की दिशा में सरकार के भीतर मंथन चल रहा है। यह कदम ऐसे समय में सामने आया है, जब विपक्षी दलों के साथ कई राज्य स्तरीय नेताओं और सामाजिक संगठनों ने विधेयक के प्रावधानों पर गंभीर आपत्ति जताई है।
सूत्रों के मुताबिक, सोमवार को हुई संसद की बिजनेस एडवाइजरी कमेटी यानी BAC की बैठक में FCRA संशोधन विधेयक और परिसीमन विधेयक को कार्यसूची में शामिल नहीं किया गया। इससे संकेत मिले हैं कि सरकार फिलहाल दोनों महत्वपूर्ण विधेयकों को सदन में तत्काल आगे बढ़ाने के बजाय राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनाने की कोशिश कर रही है। हालांकि सरकार की ओर से विधेयक को JPC के पास भेजने को लेकर अंतिम निर्णय की औपचारिक घोषणा नहीं की गई है।
संसद में जारी गतिरोध को खत्म करने के लिए सरकार की ओर से बातचीत भी तेज की गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ चर्चा के बाद केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात की। इससे पहले रिजिजू विपक्षी नेताओं से भी लगातार संपर्क में रहे हैं। सरकार का प्रयास है कि संसद की कार्यवाही सुचारू रूप से चले और महत्वपूर्ण विधायी कामकाज आगे बढ़ाया जा सके।
हालांकि विपक्ष FCRA विधेयक को सिर्फ संसदीय समिति के पास भेजे जाने के पक्ष में नहीं है। विपक्षी दलों का कहना है कि विधेयक के विवादित प्रावधानों को देखते हुए इसे केवल समीक्षा के लिए JPC को भेजना पर्याप्त नहीं होगा। विपक्ष की मांग है कि सरकार को विधेयक पूरी तरह वापस लेना चाहिए। इसके बाद ही इस मुद्दे पर आगे बातचीत की जा सकती है।
FCRA संशोधन विधेयक 2026 को 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था। विधेयक सामने आने के बाद विभिन्न हितधारकों, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों की ओर से इसका विरोध शुरू हुआ। विरोध करने वालों की प्रमुख आपत्तियां विदेशी फंडिंग से जुड़े नियमों को और सख्त करने तथा FCRA की धारा 15 से संबंधित प्रावधानों को लेकर हैं।
विधेयक को लेकर तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी डीएमके ने भी कड़ा रुख अपनाया है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डीएमके अध्यक्ष एमके स्टालिन ने कहा कि सांसद पी. विल्सन के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की और विधेयक वापस लेने की मांग रखी। प्रतिनिधिमंडल ने मौजूदा कानून की धारा 15 को निरस्त करने की भी मांग की है।
डीएमके का रुख इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि आगामी परिसीमन विधेयक को लेकर केंद्र सरकार को कुछ क्षेत्रीय दलों के समर्थन की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में FCRA विधेयक को लेकर डीएमके समेत अन्य दलों की आपत्तियां सरकार के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
NCP (शरदचंद्र पवार) की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले ने भी विधेयक पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि हर विदेशी फंडिंग को संदेह की नजर से नहीं देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक सरकार को विधेयक वापस लेना चाहिए या फिर इसे संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजकर विस्तृत विचार-विमर्श कराया जाना चाहिए।
मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा और कई प्रमुख ईसाई सामाजिक संगठनों ने भी सरकार से विधेयक को JPC के पास भेजने की अपील की है। इन संगठनों की चिंता मुख्य रूप से विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले संगठनों पर संभावित अतिरिक्त नियंत्रण और नियमों की सख्ती को लेकर है।
विधेयक पर सरकार का अगला कदम अब राजनीतिक सहमति बनाने की क्षमता पर निर्भर करेगा। एक ओर सरकार संसद में विधेयक को आगे बढ़ाने से पहले समीक्षा का विकल्प तलाश रही है, वहीं विपक्ष इसे पूरी तरह वापस लेने की मांग पर कायम है। ऐसे में FCRA संशोधन विधेयक आने वाले दिनों में संसद के भीतर एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना रह सकता है। साथ ही परिसीमन विधेयक को लेकर चल रही राजनीतिक खींचतान के बीच दोनों मुद्दों पर सरकार और विपक्ष के बीच बातचीत का रास्ता कितना निकलता है, इस पर भी नजर रहेगी।
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