नई दिल्ली/ढाका। भारत के पूर्वी पड़ोसी बांग्लादेश में कट्टरपंथी संगठनों की गतिविधियों, आतंकवादी नेटवर्क के दोबारा सक्रिय होने की रिपोर्ट और सीमा पार हथियार-नशीले पदार्थों की तस्करी ने भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। अगस्त 2026 में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट ने भी बांग्लादेश में अल-कायदा इन द इंडियन सबकॉन्टिनेंट यानी AQIS के नेटवर्क विस्तार की कोशिशों को लेकर चेतावनी दी। वहीं प्रतिबंधित जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB) और उससे जुड़े संगठनों की गतिविधियों को देखते हुए भारत-बांग्लादेश सीमा पर सुरक्षा और खुफिया समन्वय बढ़ाया जा रहा है।
हालांकि इन घटनाओं के आधार पर पूरे बांग्लादेश को भारत के लिए 'सुरक्षा खतरा' कहना सही नहीं होगा। दोनों देशों की सीमा सुरक्षा एजेंसियां अभी भी आतंकवाद, तस्करी और अवैध सीमा पार गतिविधियों को रोकने के लिए सहयोग कर रही हैं। जून 2026 में BSF और बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) ने संयुक्त गश्त, निगरानी और रियल-टाइम सूचना साझा करने की व्यवस्था मजबूत करने पर सहमति जताई थी।
UN रिपोर्ट में AQIS को लेकर चेतावनी
भारत की सुरक्षा चिंताओं को सबसे गंभीर आधार अगस्त में आई संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की निगरानी टीम की रिपोर्ट से मिला है।
10 अगस्त को जारी रिपोर्ट के मुताबिक अल-कायदा से जुड़ा **AQIS बांग्लादेश में सक्रिय सेल स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।** संगठन बड़े केंद्रीकृत नेटवर्क के बजाय छोटे और अलग-अलग सेल के जरिए अपनी गतिविधियां बढ़ाने की रणनीति अपना रहा है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि AQIS पूरे क्षेत्र में लॉजिस्टिक और वित्तीय नेटवर्क विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है।
यह भारत के लिए इसलिए चिंता का विषय है क्योंकि बांग्लादेश की सीमा सीधे पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम से लगती है। अगर कोई अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठन बांग्लादेश में मजबूत नेटवर्क बनाने में सफल होता है तो उसके संभावित प्रभाव को लेकर भारतीय सुरक्षा एजेंसियों का सतर्क होना स्वाभाविक है।
Neo-JMB की गतिविधियां फिर चर्चा में
बांग्लादेश में **Neo-JMB** की गतिविधियां भी हाल में फिर सामने आई हैं। यह प्रतिबंधित जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश से निकला संगठन है, जिसे इस्लामिक स्टेट की विचारधारा से प्रभावित माना जाता है।
हाल में बांग्लादेश में संदिग्ध आतंकियों की गिरफ्तारी और विस्फोटक बरामद होने की घटनाओं ने इस नेटवर्क को फिर चर्चा में ला दिया है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक अगस्त में ढाका के सावर इलाके से मोहम्मद आरिफ नाम के एक संदिग्ध Neo-JMB सदस्य को गिरफ्तार किया गया। उसके पास से कथित तौर पर पाइप बम, हथियार और बम बनाने की सामग्री बरामद हुई। जांचकर्ताओं ने संदिग्धों द्वारा डिजिटल प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल की भी बात कही है।
रिपोर्ट में बांग्लादेश की Anti-Terrorism Unit के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया कि जुलाई 2026 तक अलग-अलग प्रतिबंधित संगठनों के **311 संदिग्ध सदस्य फरार** थे। इनमें JMB, Neo-JMB, Ansar Al Islam और HuJI-B जैसे संगठनों से जुड़े लोग शामिल बताए गए।
भारत में भी JMB नेटवर्क की जांच
बांग्लादेश स्थित या वहां से निकले कट्टरपंथी संगठनों के भारतीय संपर्कों की जांच कोई नई बात नहीं है।
जून 2026 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने JMB से जुड़े बताए गए संगठन **Imam Mahmuder Kafila (IMK)** के कथित नेटवर्क के मामले में 11 लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था।
NIA की जांच के मुताबिक आरोपी पश्चिम बंगाल के साथ असम और त्रिपुरा सहित पूर्वोत्तर भारत में संगठन की कट्टरपंथी विचारधारा फैलाने की कथित साजिश में शामिल थे। जांच एजेंसी ने गुप्त बैठकों, डिजिटल प्लेटफॉर्म, कट्टरपंथी साहित्य और युवाओं को प्रभावित करने की कोशिशों का आरोप लगाया है।
इन आरोपों पर अंतिम फैसला अदालत में होना बाकी है, लेकिन मामला बताता है कि भारतीय एजेंसियां बांग्लादेश से जुड़े चरमपंथी नेटवर्क के संभावित विस्तार को गंभीरता से देख रही हैं।
बंगाल सीमा पर बढ़ाया गया समन्वय
अगस्त में खुफिया इनपुट के बाद पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में पुलिस और BSF के बीच समन्वय बढ़ाए जाने की खबर सामने आई।
रिपोर्ट के मुताबिक सीमा से जुड़े पुलिस थानों को BSF की सीमा चौकियों के साथ नियमित संपर्क रखने को कहा गया। गांवों में संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी जुटाने और स्थानीय स्तर पर खुफिया नेटवर्क मजबूत करने पर भी जोर दिया गया।
इसका सबसे बड़ा कारण भारत-बांग्लादेश सीमा की भौगोलिक स्थिति है।
भारत और बांग्लादेश के बीच लगभग **4,096.7 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा** है। इसमें पश्चिम बंगाल का हिस्सा सबसे बड़ा है, जबकि असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम भी बांग्लादेश से जुड़े हैं। गृह मंत्रालय की 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक इस सीमा के लगभग 3,232 किलोमीटर हिस्से पर भौतिक फेंसिंग की जा चुकी थी।
खुली नहीं लेकिन बेहद जटिल है सीमा
भारत-बांग्लादेश सीमा नेपाल के साथ भारत की खुली सीमा जैसी नहीं है। यहां BSF की तैनाती और फेंसिंग मौजूद है। इसके बावजूद पूरी सीमा को अभेद्य बनाना आसान नहीं है।
नदियां, पहाड़, घाटियां, निचले इलाके और सीमा के बिल्कुल पास मौजूद आबादी सुरक्षा व्यवस्था को जटिल बनाती है। कई नदी क्षेत्रों में स्थायी बाड़ लगाना संभव नहीं है।
इसी कारण भारत सरकार तकनीकी निगरानी पर भी जोर दे रही है। गृह मंत्रालय के मुताबिक सीमा पर हैंड हेल्ड थर्मल इमेजर, नाइट विजन डिवाइस, UAV, CCTV/PTZ कैमरे और इन्फ्रारेड सेंसर जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। असम के धुबरी क्षेत्र में Comprehensive Integrated Border Management System का भी इस्तेमाल किया गया है।
हथियारों की तस्करी भी बड़ी चुनौती
सुरक्षा का दूसरा बड़ा पहलू हथियार और दूसरे प्रतिबंधित सामान की तस्करी है।
भारत-बांग्लादेश सीमा पर सिर्फ आतंकवादी घुसपैठ की आशंका नहीं होती। हथियार, नशीले पदार्थ, नकली मुद्रा, सोना और अन्य प्रतिबंधित सामान की तस्करी भी दोनों देशों के लिए चुनौती बनी हुई है।
जून 2026 में नई दिल्ली में हुई BSF-BGB की 57वीं महानिदेशक स्तर की बैठक में भी **हथियारों, नशीले पदार्थों, नकली मुद्रा, सोने और अन्य सामान की सीमा पार तस्करी** को प्रमुख मुद्दों में शामिल किया गया था।
दोनों देशों ने ऐसे नेटवर्क के खिलाफ संयुक्त कार्रवाई बढ़ाने और सूचनाओं के आदान-प्रदान को मजबूत करने पर सहमति जताई।
इससे साफ होता है कि सीमा पार अपराध केवल भारत की चिंता नहीं है। बांग्लादेश की सुरक्षा एजेंसियां भी इसे चुनौती मानती हैं।
पूर्वोत्तर भारत क्यों सबसे संवेदनशील?
अगर बांग्लादेश में किसी चरमपंथी नेटवर्क का विस्तार होता है तो भारत के लिए पश्चिम बंगाल के साथ पूर्वोत्तर राज्य सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा क्षेत्र बन जाते हैं।
त्रिपुरा लगभग तीन तरफ से बांग्लादेश से घिरा हुआ है। मेघालय, असम और मिजोरम की भी बांग्लादेश के साथ लंबी सीमा है।
इन राज्यों में घने जंगल, पहाड़ी इलाके और नदी क्षेत्र निगरानी को मुश्किल बनाते हैं। इसलिए सुरक्षा एजेंसियों के लिए केवल सीमा पर फेंसिंग पर्याप्त नहीं है। स्थानीय खुफिया नेटवर्क, डिजिटल निगरानी और दोनों देशों की एजेंसियों के बीच सहयोग भी उतना ही जरूरी है।
NIA द्वारा जून में दाखिल आरोपपत्र में कथित नेटवर्क के असम और त्रिपुरा तक विस्तार की बात सामने आना इसी कारण महत्वपूर्ण माना गया।
सोशल मीडिया और ऑनलाइन कट्टरपंथ नई चुनौती
आतंकी नेटवर्क का स्वरूप भी बदल रहा है। अब हर संगठन को बड़े प्रशिक्षण शिविर या सार्वजनिक नेटवर्क की जरूरत नहीं होती।
एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप, बंद ऑनलाइन समूह और सोशल मीडिया के जरिए विचारधारा फैलाना सुरक्षा एजेंसियों के सामने नई चुनौती है।
UN की AQIS संबंधी रिपोर्ट में भी छोटे और बिखरे हुए सेल तथा लॉजिस्टिक और वित्तीय नेटवर्क विकसित करने की रणनीति की तरफ इशारा किया गया है।
यानी सुरक्षा एजेंसियों के लिए खतरे की पहचान अब केवल सीमा पर किसी हथियारबंद व्यक्ति को रोकने तक सीमित नहीं रह गई है। डिजिटल कट्टरपंथ और ऑनलाइन भर्ती की निगरानी भी आतंकवाद विरोधी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।
तो क्या बांग्लादेश भारत के लिए नया सुरक्षा खतरा बन चुका है?
इस सवाल का जवाब सीधा 'हां' या 'नहीं' में देना मौजूदा तथ्यों को जरूरत से ज्यादा सरल बना देगा।
बांग्लादेश में AQIS के संभावित विस्तार को लेकर UN की चेतावनी, Neo-JMB की कथित गतिविधियां और भारत में JMB से जुड़े नेटवर्क की NIA जांच **वास्तविक सुरक्षा चिंताएं** हैं। इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
लेकिन दूसरी तरफ यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि भारत और बांग्लादेश की सीमा सुरक्षा एजेंसियों के बीच औपचारिक सहयोग जारी है।
जून में BSF और BGB ने सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने, संयुक्त गश्त बढ़ाने, रियल-टाइम सूचना साझा करने और सीमा पार आपराधिक नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई तेज करने की प्रतिबद्धता दोहराई थी।
इसलिए खतरे को **बांग्लादेश देश या वहां के आम नागरिकों से जोड़ने के बजाय सक्रिय चरमपंथी संगठनों, हथियार तस्करी नेटवर्क और सीमा पार अपराध से जोड़कर देखना ज्यादा सटीक होगा।**
भारत के लिए आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना होगी कि बांग्लादेश में सक्रिय या उभरते कट्टरपंथी नेटवर्क भारतीय सीमा का इस्तेमाल घुसपैठ, हथियार तस्करी, भर्ती या पूर्वोत्तर और पश्चिम बंगाल में नेटवर्क बनाने के लिए न कर सकें।
यही वजह है कि फेंसिंग और BSF की तैनाती के साथ खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान, तकनीकी निगरानी और बांग्लादेश की सुरक्षा एजेंसियों के साथ आतंकवाद विरोधी सहयोग भारत की रणनीति के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से बने रहेंगे।