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नेपाल बाढ़ पर भारत-चीन की मदद की सराहना

Kavita2
2 Sept 2026 4:41 PM IST
नेपाल बाढ़ पर भारत-चीन की मदद की सराहना
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काठमांडू। नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद राहत और बचाव अभियान में सहयोग करने के लिए प्रधानमंत्री बालेन शाह ने बुधवार को भारत और चीन का औपचारिक रूप से आभार जताया। नेपाल की संसद में बोलते हुए उन्होंने कहा कि मुश्किल परिस्थितियों के बीच दोनों पड़ोसी देशों ने समय पर तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई और प्रभावित इलाकों में नुकसान का आकलन करने में महत्वपूर्ण सहयोग दिया। इस भीषण प्राकृतिक आपदा में 1,000 से अधिक लोगों की मौत होने की बात सामने आई है।

रिपोर्ट के मुताबिक प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संसद में बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की स्थिति और राहत अभियान की जानकारी देते हुए भारत और चीन के सहयोग का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दोनों मित्र देशों ने शुरुआत से ही नेपाल की मदद के लिए तकनीकी विशेषज्ञों को भेजा था।

शाह ने कहा, "हमारे मित्र देशों चीन और भारत ने टेक्नीशियन भेजे थे। पहले ही दिन से उन्होंने इलाके में हुए नुकसान का अंदाजा लगाने और वहां तक पहुंचना मुमकिन है या नहीं, यह तय करने के लिए हवाई सर्वे समेत कई तरह की जांच-पड़ताल की।"

प्रधानमंत्री ने बताया कि बाढ़ प्रभावित इलाकों में हालात इतने खराब थे कि राहत एवं बचाव दलों के लिए जमीन पर काम करना बेहद चुनौतीपूर्ण हो गया था। कई स्थानों पर भारी मात्रा में कीचड़ और गाद जमा होने के कारण बड़ी मशीनों को भी आगे बढ़ाना मुश्किल था।

उन्होंने कहा, "यह एक असाधारण स्थिति थी। वहां इतनी ज्यादा कीचड़ और गाद जमा थी कि न सिर्फ खुदाई करने वाली मशीनें (एक्सकेवेटर), बल्कि सेना और आर्म्ड पुलिस फोर्स के जवानों के लिए भी खड़े होने की जगह नहीं थी।"

प्रधानमंत्री के बयान से बाढ़ की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है। नेपाल के कई हिस्सों में बाढ़ ने सड़क, पुल, मकान और दूसरी बुनियादी सुविधाओं को भारी नुकसान पहुंचाया। कई इलाकों का संपर्क प्रभावित होने के कारण राहत दलों को वहां तक पहुंचने में परेशानी का सामना करना पड़ा।

ऐसी परिस्थितियों में हवाई सर्वे राहत अभियान के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ। हवाई सर्वे के माध्यम से उन इलाकों की पहचान करने में मदद मिली जहां जमीन के रास्ते तत्काल पहुंचना संभव नहीं था। साथ ही इससे नुकसान का प्रारंभिक आकलन करने और राहत कार्यों की प्राथमिकता तय करने में भी सहायता मिली।

नेपाल की भौगोलिक स्थिति के कारण प्राकृतिक आपदाओं के दौरान राहत अभियान अक्सर चुनौतीपूर्ण हो जाता है। पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों में सड़क संपर्क टूटने पर बचाव दलों के सामने प्रभावित लोगों तक पहुंचना बड़ी समस्या बन जाती है। इस बार बाढ़ के साथ भारी मात्रा में आई मिट्टी, मलबे और गाद ने मुश्किलें और बढ़ा दीं।

भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से घनिष्ठ संबंध रहे हैं। दोनों देशों की खुली सीमा और व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों के कारण किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा के समय राहत एवं बचाव कार्यों में सहयोग महत्वपूर्ण माना जाता है। वहीं चीन भी नेपाल का प्रमुख पड़ोसी देश है और इस आपदा के दौरान उसने तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई।

प्रधानमंत्री बालेन शाह की ओर से संसद में दोनों देशों का एक साथ धन्यवाद किया जाना इस बात को रेखांकित करता है कि नेपाल ने संकट की घड़ी में मिले अंतरराष्ट्रीय सहयोग को महत्वपूर्ण माना है। उन्होंने विशेष रूप से उन तकनीकी विशेषज्ञों की भूमिका का उल्लेख किया जिन्होंने शुरुआती दौर में प्रभावित क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति समझने में मदद की।

बाढ़ के बाद राहत अभियान का सबसे बड़ा उद्देश्य प्रभावित और फंसे हुए लोगों तक पहुंचना था। लेकिन कई जगहों पर मलबा और गाद इतनी अधिक थी कि सामान्य बचाव उपकरणों का इस्तेमाल भी आसान नहीं था। ऐसी स्थिति में राहत दलों को पहले यह तय करना पड़ा कि कौन से इलाके जमीन के रास्ते पहुंच योग्य हैं और किन क्षेत्रों में वैकल्पिक साधनों की जरूरत पड़ेगी।

सेना और आर्म्ड पुलिस फोर्स के जवानों को भी बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ा। प्रधानमंत्री के मुताबिक कुछ स्थानों पर स्थिति ऐसी थी कि जवानों के लिए ठीक से खड़े होकर काम करना तक संभव नहीं था। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि प्रभावित क्षेत्रों में बचाव कार्य कितने जोखिम भरे रहे।

बाढ़ के कारण बड़ी संख्या में लोगों की मौत के साथ हजारों परिवारों के प्रभावित होने की आशंका है। कई लोगों के घर और आजीविका के साधन बर्बाद हुए हैं। राहत अभियान के बाद सरकार के सामने पुनर्वास और पुनर्निर्माण की बड़ी चुनौती भी खड़ी हो गई है।

आपदा के शुरुआती चरण में जान बचाना और प्रभावित लोगों तक भोजन, पानी, दवाइयां तथा अन्य जरूरी सामग्री पहुंचाना प्राथमिकता होती है। इसके बाद क्षतिग्रस्त सड़कों, पुलों, स्कूलों, स्वास्थ्य केंद्रों और दूसरी सार्वजनिक सुविधाओं को बहाल करने की प्रक्रिया शुरू होती है। नेपाल में भी राहत के बाद पुनर्निर्माण पर विशेष ध्यान देना होगा।

बालेन शाह ने संसद में स्थिति का जिक्र करते हुए यह स्पष्ट किया कि इस आपदा को सामान्य बाढ़ की तरह नहीं देखा जा सकता। उन्होंने इसे असाधारण परिस्थिति बताते हुए राहत दलों के सामने आई कठिनाइयों को सामने रखा।

भारत और चीन से आए तकनीकी विशेषज्ञों की मदद से प्रभावित क्षेत्रों का आकलन करने में नेपाली एजेंसियों को सहयोग मिला। हवाई सर्वे से यह जानकारी जुटाने में मदद मिली कि किन इलाकों में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है और कहां तत्काल राहत पहुंचाने की जरूरत है।

इस आपदा ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए मजबूत पूर्व चेतावनी प्रणाली, बेहतर आपदा प्रबंधन और पड़ोसी देशों के बीच सहयोग की आवश्यकता को सामने रखा है। बड़े पैमाने पर बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाओं के दौरान तकनीकी संसाधन और त्वरित सहायता जान-माल के नुकसान को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

फिलहाल नेपाल में राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण की चुनौती बनी हुई है। प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संसद के मंच से भारत और चीन के समय पर मिले सहयोग की सराहना करते हुए दोनों देशों का आभार जताया है। उनका कहना है कि आपदा के शुरुआती दिनों से मिले तकनीकी सहयोग ने बाढ़ प्रभावित इलाकों की स्थिति समझने और राहत अभियान को आगे बढ़ाने में मदद की।

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