
काठमांडू। नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के दौरान सूझबूझ और साहस का परिचय देकर 1,600 से ज्यादा बच्चों और स्कूल कर्मचारियों की जान बचाने वाले प्रिंसिपल राजेंद्र दवाडी की बहादुरी की भारत ने सराहना की है। भारत सरकार ने बाढ़ में बह गए त्रिभुवन त्रिशूली स्कूल के पुनर्निर्माण में सहयोग करने की घोषणा की है। नेपाल में भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव ने प्रिंसिपल से मुलाकात कर उनके साहस और समय पर लिए गए फैसले के लिए उन्हें बधाई दी।
मामला नेपाल के नुवाकोट जिले के बिदुर स्थित त्रिभुवन त्रिशूली स्कूल का है। 26 अगस्त को इलाके में बाढ़ का खतरा तेजी से बढ़ रहा था। हालात की गंभीरता को समझते हुए स्कूल के प्रिंसिपल राजेंद्र दवाडी ने तत्काल निर्णय लिया और स्कूल की घंटी बजाकर छात्रों तथा कर्मचारियों को परिसर से बाहर निकलने का निर्देश दिया।
बताया गया कि दवाडी ने खतरे को देखते हुए किसी औपचारिक निर्देश का इंतजार नहीं किया। उन्होंने छात्रों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए तत्काल स्कूल खाली कराने का फैसला किया। स्कूल में उस समय बड़ी संख्या में विद्यार्थी और कर्मचारी मौजूद थे। सभी को तेजी से सुरक्षित स्थान की ओर भेजा गया।
छात्रों और कर्मचारियों के स्कूल परिसर से निकलने के कुछ ही समय बाद बाढ़ का पानी तेजी से परिसर में घुस गया। पानी का बहाव इतना तेज था कि स्कूल की इमारत भी इसकी चपेट में आ गई और बह गई। यदि स्कूल खाली कराने में कुछ और देर होती तो बड़ी जनहानि हो सकती थी।
प्रिंसिपल की सतर्कता और त्वरित निर्णय के कारण 1,600 से अधिक बच्चों की जान बच गई। घटना के बाद राजेंद्र दवाडी के साहस की व्यापक स्तर पर सराहना हो रही है। संकट के समय उन्होंने जिस तरह बच्चों और कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित की, उसे जिम्मेदार नेतृत्व का उदाहरण माना जा रहा है।
नेपाल में भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव ने बिदुर स्थित स्कूल के प्रिंसिपल राजेंद्र दवाडी से मुलाकात की। उन्होंने बच्चों को सुरक्षित निकालने के लिए प्रिंसिपल द्वारा उठाए गए कदम की प्रशंसा की और उन्हें बधाई दी। इस मुलाकात के बाद राजदूत ने सोशल मीडिया पर भी घटनाक्रम की जानकारी साझा की।
भारत की ओर से स्कूल के पुनर्निर्माण की घोषणा बाढ़ से प्रभावित शिक्षा व्यवस्था को फिर पटरी पर लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। बाढ़ में स्कूल की इमारत बह जाने के बाद छात्रों की पढ़ाई प्रभावित होने का खतरा पैदा हो गया है। नई इमारत बनने से विद्यार्थियों को दोबारा सुरक्षित शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराया जा सकेगा।
त्रिभुवन त्रिशूली स्कूल के पुनर्निर्माण का फैसला भारत और नेपाल के बीच सहयोग की एक और कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। प्राकृतिक आपदाओं के दौरान दोनों पड़ोसी देशों के बीच राहत और पुनर्वास के क्षेत्र में सहयोग महत्वपूर्ण रहा है। मौजूदा बाढ़ के बाद भी प्रभावित क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को दोबारा खड़ा करना बड़ी चुनौती बन गया है।
इस घटना में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका समय पर लिए गए निर्णय की रही। बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं में हालात बहुत तेजी से बदल सकते हैं। कुछ मिनटों की देरी भी बड़े नुकसान का कारण बन सकती है। राजेंद्र दवाडी ने खतरे के संकेत मिलते ही विद्यार्थियों को स्कूल से बाहर निकालकर इसी जोखिम को कम किया।
स्कूल की घंटी बजाना छात्रों और कर्मचारियों को तत्काल सतर्क करने का सबसे तेज तरीका साबित हुआ। घंटी सुनते ही स्कूल परिसर खाली कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। सभी के सुरक्षित बाहर निकल जाने के कुछ ही देर बाद परिसर बाढ़ की चपेट में आ गया।
घटना ने स्कूलों में आपदा प्रबंधन और आपातकालीन तैयारियों की अहमियत भी सामने रखी है। बाढ़, भूकंप, भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक आपदाओं की आशंका वाले क्षेत्रों में स्कूलों के पास स्पष्ट आपातकालीन योजना होना बेहद जरूरी है। शिक्षकों और कर्मचारियों को भी यह पता होना चाहिए कि अचानक खतरा सामने आने पर बच्चों को किस तरह सुरक्षित निकाला जाए।
प्रिंसिपल दवाडी की कार्रवाई ने दिखाया कि आपदा के दौरान स्थानीय स्तर पर मौजूद जिम्मेदार व्यक्ति का फैसला कितनी बड़ी भूमिका निभा सकता है। उन्होंने पहले बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित की और इसके बाद बाढ़ ने स्कूल की पूरी संरचना को अपनी चपेट में ले लिया।
स्कूल की इमारत का नुकसान बड़ा है, लेकिन 1,600 से ज्यादा बच्चों और कर्मचारियों का सुरक्षित बच निकलना सबसे बड़ी राहत मानी जा रही है। भौतिक संरचना का दोबारा निर्माण किया जा सकता है, लेकिन यदि समय पर स्कूल खाली नहीं कराया जाता तो मानवीय क्षति की भरपाई संभव नहीं होती।
भारत सरकार की ओर से स्कूल के पुनर्निर्माण की घोषणा के बाद छात्रों, अभिभावकों और स्थानीय समुदाय को राहत मिलने की उम्मीद है। पुनर्निर्माण के दौरान भविष्य में संभावित प्राकृतिक आपदाओं को ध्यान में रखते हुए सुरक्षित बुनियादी ढांचे पर भी जोर दिए जाने की संभावना है।
नेपाल में आई बाढ़ ने कई क्षेत्रों में भारी तबाही मचाई है। सड़क, पुल, मकान और दूसरी बुनियादी सुविधाओं को नुकसान पहुंचा है। ऐसे हालात में शिक्षा संस्थानों का पुनर्निर्माण भी राहत और पुनर्वास प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
राजदूत नवीन श्रीवास्तव की प्रिंसिपल से मुलाकात ने इस घटना को विशेष पहचान दी है। भारत की ओर से उनकी बहादुरी की सराहना करने के साथ स्कूल को फिर खड़ा करने का भरोसा दिया गया है।
फिलहाल राजेंद्र दवाडी की सूझबूझ और साहस की कहानी नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के बीच उम्मीद की मिसाल बनकर सामने आई है। कुछ ही मिनटों में लिया गया उनका फैसला 1,600 से ज्यादा बच्चों और अन्य लोगों के लिए जीवनरक्षक साबित हुआ। अब भारत के सहयोग से बाढ़ में बह चुके स्कूल के दोबारा खड़े होने की उम्मीद भी जगी है।





