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ग्लेशियर झीलें बढ़ा रहीं खतरा सिक्किम में नेपाल जैसी आपदा से निपटने की तैयारी
Ratna Netam
2 Sept 2026 3:51 PM IST

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गंगटोक। नेपाल में हाल में आई विनाशकारी हिमनदीय बाढ़ ने पूरे हिमालयी क्षेत्र में खतरे की नई घंटी बजा दी है। पड़ोसी देश में हुई तबाही के बाद अब भारत में भी ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलों से अचानक आने वाली बाढ़ यानी **ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF)** के खतरे को लेकर निगरानी तेज कर दी गई है। सबसे ज्यादा चिंता सिक्किम को लेकर है, जहां बड़ी संख्या में ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं और इनमें कई को उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। सिक्किम सरकार ने संवेदनशील झीलों की वैज्ञानिक निगरानी के साथ संभावित आपदा से निपटने की तैयारियां तेज कर दी हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर भी खतरा छोटा नहीं है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक भारतीय हिमालयी क्षेत्र में करीब **189 से 200 उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों** की पहचान की गई है। वहीं सिक्किम में NDMA के आकलन में 40 हाई-हैजर्ड झीलें शामिल हैं, जिनमें 16 को सबसे अधिक जोखिम वाली Category-A में रखा गया है।
सिक्किम में सात बेहद संवेदनशील झीलों पर विशेष नजर
सिक्किम में खतरे का आकलन केवल उपग्रह तस्वीरों तक सीमित नहीं रखा गया है। वैज्ञानिक टीमें दुर्गम ऊंचाई वाले क्षेत्रों तक पहुंचकर झीलों की गहराई, पानी की मात्रा, आसपास की चट्टानों और ढलानों की स्थिति तथा संभावित बाढ़ के रास्तों का अध्ययन कर रही हैं।
कुछ हालिया रिपोर्टों में **सात अत्यधिक संवेदनशील झीलों** पर विशेष जोखिम और संभावित बाढ़ परिदृश्यों का जिक्र किया गया है। वहीं व्यापक सरकारी वर्गीकरण में राज्य की 40 हाई-हैजर्ड झीलों और उनमें शामिल 16 Category-A झीलों पर निगरानी की जा रही है। इसलिए ‘सात हाई रिस्क जोन’ को सिक्किम की कुल जोखिम सूची नहीं समझना चाहिए।
सिक्किम के राज्य राहत आयुक्त रिनजिंग चेवांग के मुताबिक राज्य में 400 से ज्यादा छोटी-बड़ी ग्लेशियल झीलें हैं और 16 अत्यधिक संवेदनशील झीलों की लगातार निगरानी की जा रही है। इनमें से 13 उत्तर सिक्किम और तीन पश्चिम सिक्किम में स्थित हैं।
Shako Chho को लेकर सबसे ज्यादा चिंता
उत्तर सिक्किम की **Shako Chho** झील को मौजूदा अध्ययन में सबसे संवेदनशील ग्लेशियल झीलों में माना गया है। सिक्किम सरकार के वैज्ञानिक अध्ययन के बाद इस झील में मौजूद पानी की मात्रा कम करने की योजना तैयार की गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक Shako Chho में लगभग 27 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी मौजूद है। प्रस्तावित योजना में सौर ऊर्जा से चलने वाले पंपों की मदद से झील के जलस्तर को करीब 20 मीटर कम करने का लक्ष्य रखा गया है। इस प्रक्रिया में दो से तीन साल लग सकते हैं। इसके लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट SSDMA के माध्यम से NDMA को भेजी गई है।
इसके पीछे मकसद साफ है। झील में पानी की मात्रा जितनी नियंत्रित होगी, किसी हिमस्खलन, चट्टान गिरने या दूसरी प्राकृतिक घटना के कारण अचानक भारी मात्रा में पानी बाहर निकलने की स्थिति में नुकसान की क्षमता उतनी कम हो सकती है।
आखिर GLOF क्या होता है?
हिमालय के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ग्लेशियरों के पीछे हटने से कई स्थानों पर पानी जमा होकर झील का रूप ले लेता है। इनमें से कई झीलें ठोस बांध के बजाय बर्फ, पत्थर और मलबे से बने प्राकृतिक मोरेन से घिरी होती हैं।
अगर किसी कारण से यह प्राकृतिक दीवार टूट जाए तो झील में जमा लाखों-करोड़ों घन मीटर पानी अचानक नीचे की घाटियों की ओर दौड़ सकता है। इसी घटना को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF कहा जाता है।
इसके ट्रिगर कई हो सकते हैं। भारी बारिश, भूकंप, हिमस्खलन, चट्टान या बर्फ का विशाल हिस्सा झील में गिरना और ग्लेशियर का तेजी से पिघलना झील को अस्थिर कर सकता है। पानी के साथ चट्टान, बर्फ और मलबा जुड़ जाने पर नीचे पहुंचने वाली बाढ़ और ज्यादा विनाशकारी बन सकती है।
नेपाल की तबाही ने क्यों बढ़ाई भारत की चिंता?
नेपाल में अगस्त के आखिर में हुई विनाशकारी घटना के बाद भारत की आपदा प्रबंधन एजेंसियों ने भी हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद जोखिम पर ध्यान बढ़ाया है। NDMA ने नेपाल की घटना का विस्तृत अध्ययन करने की योजना बनाई है ताकि यह समझा जा सके कि इस तरह की आपदाओं के कारण और प्रभाव क्या थे और भारत में जोखिम कम करने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालय एक युवा और भूगर्भीय रूप से संवेदनशील पर्वत श्रृंखला है। यहां भूकंप, भूस्खलन, भारी बारिश, हिमस्खलन और ग्लेशियल झीलों का खतरा कई बार एक-दूसरे से जुड़कर बड़ी आपदा पैदा कर सकता है।
यानी खतरा केवल झील का बांध टूटने तक सीमित नहीं है। पहाड़ का हिस्सा या बर्फ का विशाल टुकड़ा झील में गिरने से भी ऐसी लहर पैदा हो सकती है जो प्राकृतिक बांध को पार कर जाए और नीचे विनाशकारी बाढ़ का रूप ले ले।
2023 में सिक्किम देख चुका है तबाही
सिक्किम के लिए यह खतरा केवल वैज्ञानिक अनुमान नहीं है। अक्टूबर 2023 में **South Lhonak Lake** से जुड़ी GLOF घटना ने तीस्ता नदी घाटी में भारी तबाही मचाई थी। बाढ़ ने सड़क, पुल, घर और जलविद्युत परियोजनाओं सहित बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाया था।
उस आपदा के बाद सिक्किम ने ग्लेशियल झीलों की निगरानी और शुरुआती चेतावनी व्यवस्था पर ज्यादा जोर देना शुरू किया। अब नेपाल की ताजा आपदा ने इस तैयारी की अहमियत और बढ़ा दी है।
झीलों पर लगाए जा रहे सेंसर
सिक्किम में संवेदनशील ग्लेशियल झीलों पर सेंसर और ऑटोमेटेड वेदर स्टेशन लगाने का काम किया जा रहा है। इन उपकरणों की मदद से पानी के स्तर और मौसम में होने वाले बदलावों की जानकारी हासिल की जा सकती है।
राज्य राहत आयुक्त के मुताबिक अधिकतर संवेदनशील झीलों पर सेंसर लगाए गए हैं। उत्तर सिक्किम में कई जगह **Early Warning System और Automated Weather Stations** लगाए गए हैं ताकि जलस्तर में असामान्य बढ़ोतरी होने पर समय रहते जानकारी मिल सके।
अगर किसी संभावित खतरे का पता पर्याप्त समय पहले चल जाए तो नीचे की घाटियों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने का मौका मिल सकता है।
स्वदेशी तकनीक से होगी निगरानी
भारत ने ग्लेशियल झीलों की निगरानी के लिए स्वदेशी तकनीक पर भी काम तेज किया है। जून 2026 में C-DAC ने सिक्किम के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग को स्वदेशी ग्लेशियल लेक मॉनिटरिंग टेक्नोलॉजी सौंपी।
इसके साथ सिक्किम देश का पहला राज्य बना जिसे एंड-टू-एंड स्वदेशी ऑटोनॉमस ग्लेशियल लेक प्रोफाइलिंग और रिस्क असेसमेंट क्षमता स्वतंत्र रूप से संचालित करने की सुविधा मिली। तकनीक की मदद से ऊंचाई वाले दुर्गम क्षेत्रों की झीलों के बारे में वैज्ञानिक डेटा जुटाने और खतरे का आकलन करने में मदद मिलेगी।
वैज्ञानिकों ने किया हाई रिस्क झीलों का सर्वे
23 जुलाई से 8 अगस्त 2026 के बीच सिक्किम के मंगन जिले में हाई रिस्क ग्लेशियल झीलों का व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन किया गया। इसमें सिक्किम सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अलावा SSDMA, सेंट्रल वाटर कमीशन, सिक्किम यूनिवर्सिटी, C-DAC और दूसरी एजेंसियों के विशेषज्ञ शामिल हुए। भारतीय सेना और ITBP ने भी अभियान में सहयोग किया।
वैज्ञानिकों ने झीलों की गहराई, भूगर्भीय स्थिति, पानी के प्रवाह, आसपास की जमीन और मौसम से जुड़े आंकड़े जुटाए। इस डेटा का इस्तेमाल संभावित GLOF की मॉडलिंग और प्रत्येक झील के लिए अलग-अलग आपदा न्यूनीकरण योजना बनाने में किया जाएगा।
भारत में करीब 200 हाई रिस्क झीलों पर नजर
सिक्किम अकेला राज्य नहीं है जहां GLOF का खतरा मौजूद है। राष्ट्रीय GLOF जोखिम प्रबंधन कार्यक्रम के तहत सिक्किम के साथ अरुणाचल प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के अलावा जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख जैसे हिमालयी क्षेत्रों में भी जोखिम का आकलन और निगरानी की जा रही है।
सरकारी सर्वे से जुड़े आंकड़ों के अनुसार भारतीय हिमालय में करीब 7,500 ग्लेशियल झीलें हैं और लगभग 200 को उच्च जोखिम वाली श्रेणी में माना जा रहा है।
इसलिए नेपाल जैसी घटना की आशंका को किसी एक राज्य तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता।
जलवायु परिवर्तन क्यों बढ़ा रहा खतरा?
विशेषज्ञों के अनुसार बढ़ते तापमान के कारण हिमालयी ग्लेशियरों में बदलाव हो रहा है। ग्लेशियर पीछे हटते हैं तो नई झीलें बन सकती हैं और पहले से मौजूद झीलों का आकार बढ़ सकता है। इससे अस्थिर ग्लेशियल झीलों की संख्या और उनमें मौजूद पानी की मात्रा बढ़ने की आशंका रहती है।
इसके साथ चरम बारिश, अस्थिर ढलान, भूकंप और हिमस्खलन जैसे कारक जुड़ जाएं तो खतरा कई गुना बढ़ सकता है।
क्या भारत में नेपाल जैसी तबाही तय है?
इस सवाल का जवाब **नहीं** है। हाई रिस्क झील की पहचान होने का अर्थ यह नहीं कि वह निश्चित रूप से फटने वाली है। वैज्ञानिक वर्गीकरण का उद्देश्य उन झीलों की पहचान करना है जिनकी निगरानी और सुरक्षा उपायों को प्राथमिकता देने की जरूरत है।
सिक्किम के अधिकारियों ने भी कहा है कि मौजूदा अध्ययनों के आधार पर राज्य की पहचानी गई झीलों के खतरे को सीधे नेपाल की हालिया आपदा के बराबर नहीं माना जा सकता। इसके बावजूद राज्य की भूकंपीय संवेदनशीलता और कठिन हिमालयी भूभाग को देखते हुए तैयारी बेहद जरूरी है।
नेपाल की त्रासदी ने भारत के लिए एक स्पष्ट चेतावनी जरूर दी है। सेंसर, सैटेलाइट निगरानी, शुरुआती चेतावनी प्रणाली, झीलों का जलस्तर नियंत्रित करने और नीचे रहने वाली आबादी के लिए निकासी योजना पर तेजी से काम करना होगा।
सिक्किम ने इसकी तैयारी शुरू कर दी है। अब सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि वैज्ञानिक निगरानी से मिलने वाली चेतावनी समय पर प्रशासन और घाटियों में रहने वाले लोगों तक पहुंचे। हिमालय में ऐसी प्राकृतिक घटनाओं को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन बेहतर निगरानी और समय पर चेतावनी से जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
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