
वर्ल्ड | भारत में खुशहाली और विकास को लेकर जारी वैश्विक हैप्पीनेस इंडेक्स (Happiness Index) पर आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि यह सूचकांक पूर्वाग्रह से ग्रसित है और वास्तविकता से मेल नहीं खाता। उनके अनुसार, खुशी केवल आर्थिक स्थिति से तय नहीं होती, बल्कि इसका सीधा संबंध मानसिक संतुलन, आध्यात्मिक शांति और सामाजिक ताने-बाने से होता है।
"भारत में बड़े सुधार, फिर भी रैंकिंग क्यों नीचे?"
रविशंकर ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने गरीबी उन्मूलन, जीवन स्तर सुधार और मानसिक स्वास्थ्य पर महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। फिर भी, हैप्पीनेस इंडेक्स में भारत की रैंकिंग लगातार सवालों के घेरे में रहती है। उन्होंने कहा कि यह सूचकांक केवल पश्चिमी मानकों पर आधारित है और इसमें भारतीय संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों और आध्यात्मिकता को नजरअंदाज किया जाता है।
"खुशी का निर्धारण पैसे से नहीं"
रविशंकर ने इस धारणा को भी खारिज किया कि केवल अमीरी से ही खुशी तय होती है। उन्होंने कहा कि कई अमीर देशों में मानसिक तनाव, अकेलापन और सामाजिक विघटन ज्यादा देखने को मिलता है, जबकि भारत जैसे देशों में समुदाय, परिवार और आध्यात्मिकता के कारण लोग जीवन में संतोष और खुशी महसूस करते हैं।
"ऑक्सफोर्ड इंडेक्स पर सवाल"
उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा तैयार किए जाने वाले कई वैश्विक सूचकांकों पर भी सवाल उठाए और कहा कि ये अक्सर विकसित देशों को ऊंची रैंकिंग देते हैं, जबकि भारत जैसे देशों की वास्तविक प्रगति को नजरअंदाज करते हैं। उन्होंने इस तरह के सूचकांकों की पारदर्शिता और निष्पक्षता की समीक्षा करने की मांग की।
"भारत की खुशी का आधार"
रविशंकर के मुताबिक, भारत में योग, ध्यान, परिवारिक संबंध और आध्यात्मिकता जैसे कारकों के कारण जीवन में संतुलन बना रहता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि खुशी सिर्फ भौतिक संसाधनों से नहीं आती, बल्कि यह एक मानसिक और भावनात्मक स्थिति होती है, जिसे सही वातावरण और सोच से हासिल किया जा सकता है।
"क्या बदलाव जरूरी?"
रविशंकर ने अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अपील की कि वे हैप्पीनेस इंडेक्स जैसे सूचकांकों में नए मानदंड जोड़ें, जो केवल आर्थिक विकास पर केंद्रित न हों, बल्कि मानसिक और सामाजिक संतुलन को भी शामिल करें।





