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लाइफ स्टाइल : आज स्मार्टफोन हमारी जिंदगी का ऐसा हिस्सा बन चुका है कि बहुत से लोग सुबह आंख खुलने से लेकर रात को सोने तक मोबाइल अपने पास रखते हैं। कई लोगों की आदत होती है कि रात में फोन चलाते-चलाते सो जाते हैं और फिर मोबाइल को तकिए के नीचे या सिर के बिल्कुल पास रख देते हैं। इसी आदत को लेकर डॉ. तरंग कृष्णा से जुड़ा एक वीडियो चर्चा में रहा है, जिसमें सोते समय मोबाइल को सिर के पास रखने को लेकर सावधान रहने की सलाह दी गई है।
वायरल दावे में इस आदत को लंबे समय में कैंसर के संभावित खतरे से भी जोड़ा गया है। हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है—मौजूदा वैज्ञानिक प्रमाण यह साबित नहीं करते कि तकिए के पास मोबाइल रखकर सोने से सीधे कैंसर हो जाता है। कैंसर एक जटिल बीमारी है और इसके पीछे आनुवंशिक, पर्यावरणीय तथा जीवनशैली से जुड़े कई जोखिम कारक हो सकते हैं।
रात में मोबाइल इस्तेमाल करने का ज्यादा स्थापित नुकसान नींद में बाधा, स्क्रीन की रोशनी और सोने-जागने की प्राकृतिक प्रक्रिया प्रभावित होने से जुड़ा है। इसलिए डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सामान्य सलाह यही रहती है कि सोते समय फोन को शरीर से थोड़ा दूर रखा जाए और रात में स्क्रीन का इस्तेमाल कम किया जाए।
क्या है वह एक गलती?
जिस आदत की चर्चा हो रही है वह है—**रात में मोबाइल फोन को तकिए के नीचे या सिर के बेहद करीब रखकर सोना।**
आज बहुत से लोग फोन को अलार्म के लिए अपने पास रखते हैं। कुछ लोग चार्जिंग पर लगे फोन को भी बेड या तकिए के पास रख देते हैं।
इसके अलावा सोने से ठीक पहले घंटों सोशल मीडिया स्क्रॉल करना, वीडियो देखना या गेम खेलना भी आम हो गया है।
ऐसी स्थिति में समस्या केवल फोन की मौजूदगी नहीं बल्कि रात में लगातार स्क्रीन देखने, नोटिफिकेशन आने और नींद में व्यवधान की भी हो सकती है।
डॉ. तरंग कृष्णा की क्या है चेतावनी?
डॉ. तरंग कृष्णा से जुड़े वायरल वीडियो में सोते समय फोन को तकिए या सिर के पास रखने की आदत से बचने की सलाह दी गई है।
उनकी चेतावनी का केंद्रीय संदेश यह है कि रातभर फोन को शरीर के बहुत करीब रखना अच्छी आदत नहीं है और लोगों को इसे अपने सोने की जगह से दूर रखना चाहिए।
इस तरह की चेतावनी सोशल मीडिया पर इसलिए तेजी से चर्चा में आई क्योंकि करोड़ों लोग रोजाना ऐसा करते हैं।
लेकिन कैंसर जैसे गंभीर विषय पर किसी वायरल वीडियो के दावे को अंतिम वैज्ञानिक निष्कर्ष मान लेना उचित नहीं होगा।
क्या सच में मोबाइल से कैंसर हो सकता है?
यही सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।
अगर कोई यह कहे कि **तकिए के पास मोबाइल रखकर सोने से कैंसर हो जाएगा**, तो मौजूदा वैज्ञानिक प्रमाण इतने स्पष्ट नहीं हैं कि ऐसा निश्चित दावा किया जा सके।
कैंसर के जोखिम और मोबाइल फोन के बीच संबंध पर लंबे समय से शोध होता रहा है। स्मार्टफोन रेडियोफ्रीक्वेंसी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड का उपयोग करते हैं, लेकिन रोजमर्रा के मोबाइल इस्तेमाल से कैंसर होने के सवाल पर वैज्ञानिक प्रमाण निर्णायक नहीं हैं।
इसलिए केवल फोन पास रखकर सोने को कैंसर का स्थापित कारण बताना भ्रामक हो सकता है।
हां, सोने से पहले लगातार फोन इस्तेमाल करने के दूसरे नुकसान ज्यादा स्पष्ट हैं।
रात की रोशनी पर क्या कहता है शोध?
रात में कृत्रिम रोशनी और शरीर की जैविक घड़ी यानी सर्केडियन रिदम के बीच संबंध पर वैज्ञानिकों ने काफी अध्ययन किया है।
शरीर में एक प्राकृतिक घड़ी होती है जो दिन और रात के हिसाब से नींद, हार्मोन और दूसरी जैविक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करती है।
रात में ज्यादा रोशनी के संपर्क में रहने से यह प्राकृतिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
विशेष रूप से लंबे समय तक रात की शिफ्ट में काम करने और लगातार सर्केडियन रिदम बिगड़ने को कुछ शोधों में कैंसर के बढ़े हुए जोखिम से जोड़ा गया है।
इसका मतलब यह नहीं है कि रात में एक बार फोन देखने से कैंसर हो जाएगा। यहां बात लंबे समय तक बनी रहने वाली जीवनशैली और जैविक घड़ी में लगातार व्यवधान की है।
मेलाटोनिन पर पड़ सकता है असर
रात होते ही शरीर मेलाटोनिन नामक हार्मोन बनाता है। यह शरीर को संकेत देता है कि अब आराम और नींद का समय है।
तेज रोशनी और स्क्रीन के संपर्क में रहने से मेलाटोनिन की प्राकृतिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
यही वजह है कि सोने से पहले लंबे समय तक फोन चलाने के बाद कई लोगों को तुरंत नींद नहीं आती।
व्यक्ति बिस्तर पर तो पहुंच जाता है लेकिन दिमाग सक्रिय रहता है। सोशल मीडिया, वीडियो और नोटिफिकेशन इसे और बढ़ा सकते हैं।
अगर यह आदत लंबे समय तक बनी रहे तो नींद की गुणवत्ता खराब हो सकती है।
कैंसर और रात की रोशनी पर शोध क्या बताता है?
2024 में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण में रात में कृत्रिम रोशनी के ज्यादा संपर्क और महिलाओं में स्तन कैंसर के जोखिम के बीच एक मामूली सकारात्मक संबंध पाया गया।
लेकिन शोधकर्ताओं ने दूसरे प्रकार के कैंसर के लिए उपलब्ध आंकड़ों को पर्याप्त नहीं माना।
इसका सीधा अर्थ है कि वैज्ञानिक संकेत जरूर मौजूद हैं, लेकिन हर तरह के कैंसर और रात की रोशनी के बीच कारण-परिणाम संबंध साबित नहीं हुआ है।
इसलिए 'रात में मोबाइल पास रखा और कैंसर हो गया' जैसी सीधी व्याख्या वैज्ञानिक तौर पर सही नहीं होगी।
नाइट शिफ्ट पर प्रमाण ज्यादा मजबूत
रात में फोन इस्तेमाल करने की तुलना में लंबे समय तक नाइट शिफ्ट करने और शरीर की प्राकृतिक घड़ी बिगड़ने पर वैज्ञानिक प्रमाण ज्यादा मजबूत हैं।
अमेरिका के नेशनल टॉक्सिकोलॉजी प्रोग्राम की समीक्षा में लंबे समय तक लगातार नाइट शिफ्ट के कारण होने वाले सर्केडियन व्यवधान और मानव कैंसर के बीच संबंध के लिए मजबूत प्रमाण बताए गए हैं।
विशेष रूप से महिलाओं में स्तन कैंसर को लेकर चिंता अधिक सामने आई है।
लेकिन नाइट शिफ्ट में वर्षों तक काम करना और रात में कुछ देर मोबाइल इस्तेमाल करना एक जैसी एक्सपोजर स्थितियां नहीं हैं। दोनों को सीधे बराबर मानना गलत होगा।
फोन को तकिए के नीचे रखना क्यों ठीक नहीं?
कैंसर के दावे से अलग भी फोन को तकिए के नीचे रखकर सोने से बचने के व्यावहारिक कारण हैं।
सबसे पहले फोन के नोटिफिकेशन, कंपन और स्क्रीन की रोशनी आपकी नींद तोड़ सकते हैं।
दूसरा, अगर फोन चार्जिंग पर लगा है तो उसे तकिए, कंबल या गद्दे के नीचे रखना सुरक्षित आदत नहीं है। इलेक्ट्रॉनिक उपकरण चार्जिंग के दौरान गर्म हो सकते हैं और उन्हें हवा मिलने की जरूरत होती है।
इसलिए फोन को खुली और ठोस सतह पर रखना बेहतर है।
अच्छी नींद क्यों है जरूरी?
अच्छी नींद केवल अगले दिन ताजगी महसूस करने के लिए जरूरी नहीं है। शरीर नींद के दौरान कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं पूरी करता है।
पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण नींद शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है।
अमेरिकन कैंसर सोसायटी के मुताबिक नींद और कैंसर के जोखिम के बीच संबंध पर अभी पर्याप्त स्पष्ट शोध नहीं है। हालांकि लंबे समय तक नींद की समस्या कई दूसरी स्वास्थ्य परेशानियों से जुड़ी हो सकती है।
वयस्कों के लिए सामान्य तौर पर कम से कम सात घंटे की गुणवत्तापूर्ण नींद की सलाह दी जाती है।
सोने से पहले मोबाइल कितनी देर पहले रखें दूर?
एक आसान तरीका यह है कि सोने की तैयारी शुरू होते ही फोन का इस्तेमाल कम कर दिया जाए।
फोन को तकिए के नीचे रखने के बजाय बेड से कुछ दूरी पर टेबल पर रखा जा सकता है।
अगर अलार्म की जरूरत है तो फोन इतनी दूरी पर रखें कि उसकी आवाज सुनाई दे, लेकिन उसे लगातार हाथ में लेने की आदत न बने।
रात में गैर-जरूरी नोटिफिकेशन बंद करने से भी नींद में बार-बार व्यवधान कम किया जा सकता है।
स्क्रीन टाइम कम करने के आसान तरीके
सोने से पहले फोन इस्तेमाल करने की आदत अचानक छोड़ना मुश्किल हो सकता है। इसे धीरे-धीरे कम किया जा सकता है।
सोने से पहले सोशल मीडिया स्क्रॉलिंग की समय सीमा तय करें। फोन में उपलब्ध नाइट मोड या कम ब्राइटनेस विकल्प का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन इन्हें स्क्रीन बंद करने का पूर्ण विकल्प नहीं समझना चाहिए।
बिस्तर को वीडियो देखने या सोशल मीडिया चलाने की जगह बनाने के बजाय नींद से जोड़ना बेहतर है।
सोने से पहले किताब पढ़ना, हल्का संगीत सुनना या रिलैक्सेशन जैसी गतिविधियां फोन पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकती हैं।
कैंसर से बचाव में किन बातों पर ज्यादा ध्यान दें?
कैंसर के जोखिम को कम करने के लिए केवल मोबाइल फोन पर ध्यान केंद्रित करना पर्याप्त नहीं है।
तंबाकू से दूरी, स्वस्थ वजन, नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित भोजन, शराब से बचाव या सीमित सेवन, आवश्यक टीकाकरण और उम्र तथा व्यक्तिगत जोखिम के अनुसार कैंसर स्क्रीनिंग जैसे कदम ज्यादा स्थापित हैं।
अगर शरीर में कोई असामान्य गांठ, बिना कारण वजन घटना, लगातार खून आना, लंबे समय तक खांसी या कोई अन्य असामान्य लक्षण दिखाई दे तो केवल इंटरनेट की जानकारी पर निर्भर रहने के बजाय डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
डर नहीं सावधानी जरूरी
डॉ. तरंग कृष्णा से जुड़ी चेतावनी के बाद सबसे जरूरी बात यह है कि इसे डर पैदा करने के बजाय बेहतर नींद की आदत बनाने के संदेश के रूप में लिया जाए।
**फोन को तकिए के नीचे या सिर के बिल्कुल पास रखकर सोने से बचना अच्छी आदत हो सकती है।** खासकर चार्जिंग करते समय फोन को बिस्तर पर दबाकर नहीं रखना चाहिए।
लेकिन इसके साथ यह दावा करना कि केवल इसी एक गलती से कैंसर हो जाता है, मौजूदा वैज्ञानिक प्रमाणों से साबित नहीं है।
वैज्ञानिक शोध रात की कृत्रिम रोशनी, लंबे समय तक सर्केडियन रिदम बिगड़ने और नाइट-शिफ्ट जैसे कारकों के संभावित कैंसर जोखिम की जांच जरूर कर रहे हैं।
इसलिए बेहतर तरीका यही है—**रात में स्क्रीन टाइम कम करें, पर्याप्त नींद लें और मोबाइल को तकिए से दूर रखें, लेकिन कैंसर को लेकर अपुष्ट दावों से घबराने के बजाय प्रमाणित स्वास्थ्य सलाह पर भरोसा करें।**
वैज्ञानिक तौर पर American Cancer Society भी कहती है कि नींद और कैंसर के जोखिम के बीच स्पष्ट संबंध साबित करने के लिए अभी पर्याप्त शोध नहीं है। वहीं रात में कृत्रिम रोशनी पर 26 अध्ययनों की समीक्षा में स्तन कैंसर के साथ मामूली संबंध मिला, अन्य कैंसर के लिए प्रमाण अपर्याप्त रहे।
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