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आखिर अमरीकी राष्ट्रपति टं्रप लगातार झूठ बोलने के आदी क्यों हैं? ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद भी वह पचासियों बार झूठे दावे करते रहे हैं कि उन्होंने अमुक देशों के बीच युद्धविराम करा दिया। राष्ट्रपति ट्रंप ने उन देशों में भी युद्धविराम के झूठ बोले, जिनके बीच या तो युद्ध ही नहीं हुआ अथवा टं्रप की कोई भूमिका ही नहीं थी। नोबेल पुरस्कार पाने की ऐसी छटपटाहट है कि राष्ट्रपति के पद पर होने के बावजूद टं्रप झूठ बोलने के आदी हो गए हैं। बहरहाल ऐसे देश उनके झूठ का खुद जवाब देंगे, वह हमारा सरोकार नहीं है, लेकिन जब संदर्भ प्रधानमंत्री मोदी और भारत के राष्ट्रीय हितों का है, तो हम निरपेक्ष और खामोश नहीं रह सकते। यह अनिवार्य नहीं है कि प्रधानमंत्री मोदी ऐसे अनाप-शनाप बयानों का जवाब दें। वह अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल और परस्पर सम्मान की विदेश नीति से बंधे हैं, लेकिन विदेश मंत्रालय ने प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति टं्रप के बीच फोन कॉल से अनभिज्ञता जाहिर की है, तो तय है कि दोनों नेताओं के बीच बीते बुधवार को कोई संवाद नहीं हुआ। यदि संवाद नहीं हुआ, तो भारत रूसी तेल और ऊर्जा उत्पाद खरीदना बंद कर देगा, यह निष्कर्ष कैसे संभव है? कमाल है कि राष्ट्रपति टं्रप ‘व्हाइट हाउस’ में पत्रकारों से रू-ब-रू बात कर रहे थे। उसी दौरान उन्होंने खुलासा किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने आज (बुधवार) आश्वासन दिया है कि भारत रूस से तेल खरीद बंद कर देगा। यह तुरंत नहीं हो सकता, थोड़ा समय लगेगा। जल्द ही यह प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। राष्ट्रपति टं्रप ने इसे रूस पर यूक्रेन युद्ध रोकने का दबाव बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम बताया। गुरुवार को भारत ने यह झूठा दावा खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि दोनों नेताओं के बीच फोन पर कोई बातचीत नहीं हुई। ऐसे ही करीब 50 झूठे दावे ट्रंप ने भारत-पाक संघर्षविराम के मद्देनजर किए थे, जिन्हें प्रधानमंत्री मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में एक विशेष चर्चा के दौरान, परोक्ष रूप से, खारिज कर दिया था। भारतीय प्रधानमंत्री इस भाषा का इस्तेमाल नहीं कर सकते कि टं्रप ने झूठ बोला है या टं्रप झूठा है। भारत के प्रधानमंत्री और मंत्रियों के कुछ निश्चित कूटनीतिक संस्कार हैं। विपक्ष चाहे तो खुशफहमी में रह सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी राष्ट्रपति टं्रप से डरे हुए हैं। बहरहाल विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने रूसी तेल को भारत के 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा-जरूरतों के मद्देनजर ‘राष्ट्रीय हित’ की बात कही और उसे सर्वोच्च प्राथमिकता और प्रतिबद्धता करार दिया। ध्यान रहे कि अमरीकी राष्ट्रपति ने भारत पर 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ , जुर्माने के तौर पर, थोपा था, क्योंकि हम रूस से तेल खरीदते हैं। अमरीकी राष्ट्रपति ने यहां तक आरोपित किया था कि तेल खरीद कर भारत रूस की युद्ध लडऩे की ताकत को, परोक्ष रूप से, बढ़ा रहा है।
बहरहाल एक यूरोपीय थिंक टैंक ‘सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर’ (सीआरईए) की एक रपट के मुताबिक, भारत ने सितंबर में रूस से 2.5 अरब यूरो, यानी 2.91 अरब डॉलर, का कच्चा तेल खरीदा था। दरअसल भारत ने रूसी जीवाश्म ईंधन की कुल 3.6 अरब यूरो की खरीद की थी। उसमें कच्चा तेल, कोयला और अन्य तेल उत्पाद आदि शामिल थे। भारत का रूस से कच्चे तेल का आयात करीब 1.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन रहा है, जो बीते महीनों की तुलना में 9 फीसदी कम था, लेकिन इसके मायने ये नहीं हैं कि भारत रूस से तेल की खरीद कम करते हुए बिलकुल ही बंद कर देगा। रूस भारत का भरोसेमंद दोस्त रहा है। अमरीकी राष्ट्रपति प्रधानमंत्री मोदी को ‘महान इंसान, महान प्रधानमंत्री, माई डियर फ्रेंड’ संबोधित करते हुए नहीं अघाते, लेकिन भारत की पीठ में छुरा घोंपने से भी बाज नहीं आते। रूस ने कभी ऐसा ‘दोगला व्यवहार’ नहीं किया। बेशक भारत दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है, लिहाजा आयातक भी है। रूसी तेल का चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा खरीददार भारत ही है। भारत-रूस की आपसी साझेदारी जारी रहेगी, यह विश्वास भारत ने एक बार फिर दिलाया है। ट्रंप की यह कोशिश रहती है कि वे भारत पर दबाव बनाएं ताकि भारत अपने बाजारों को उसके लिए खोल दे, तमाम टैरिफ के बाद भी ट्रंप अपने इरादों में सफल नहीं हो पाए हैं, जिसकी वजह से वे इस तरह के बयान देते हैं,ताकि अतिरिक्त दबाव बनाया जा सके। ट्रंप दुनिया के ऐसे नेता है जिनके बयानों को समझना बहुत मुश्किल है। वे अकसर इस तरह के गैरजिम्मेदाराना बयान देते हैं, जिनका कोई साक्ष्य उनके पास नहीं होता है। गौरतलब है कि ट्रंप कभी भी अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सकते और न ही भारत पर उनका दबाव बनाने का सपना पूरा होगा। हर बार भारत अपनी कूटनीति से ट्रंप के मंसूबों को मात देता आया है।
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